अल-जासिया · 25/37
अनुवाद उच्चारण — अल-जासिया
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ مَّا كَانَ حُجَّتَهُمْ إِلَّا أَن قَالُوا ائْتُوا بِآبَائِنَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ۝٢٥
Wa izaa tutlaa `alaihim aayaatuna baiyinaatim maa kaana hujjatahum illaaa an qaalu`too bi aabaaa`inaaa in kuntum saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनके सामने हमारी खुली खुली आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनकी कट हुज्जती बस यही होती है कि वह कहते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (जिला कर) ले तो आओ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ: हमारी स्पष्ट आयतें (जो सत्य को उजागर करती हैं)
  • حُجَّتَهُمْ: उनकी दलील या सबूत
  • ائْتُوا بِآبَائِنَا: हमारे बाप-दादाओं को ले आओ (यानी उन्हें ज़िंदा करके दिखाओ)

तफ़सीर (व्याख्या):

जब इन मुशरिकों (बहुदेववादियों) के सामने हमारी स्पष्ट आयतें पढ़ी जाती हैं, जो क़ियामत और पुनरुत्थान (आख़िरत) का प्रमाण देती हैं, तो वे उन्हें मानने के बजाय कोई ठोस दलील पेश नहीं करते। उनके पास कोई तर्क नहीं होता, सिवाय इसके कि वे मज़ाक़ और हठधर्मी के तौर पर कहते हैं: "अगर तुम सच्चे हो, तो हमारे पूर्वजों को ज़िंदा करके लाओ!"

यह उनकी बेबसी और सत्य से भागने की कोशिश है। वे जानते हैं कि पुनरुत्थान का वादा सच्चा है, लेकिन अपने घमंड और अहंकार के कारण इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। वे ऐसी चीज़ की माँग करते हैं जो उनके लिए परीक्षा (इम्तिहान) का हिस्सा नहीं है, क्योंकि दुनिया में पुनरुत्थान का दिखाया जाना सिर्फ़ आख़िरत के लिए है। अल्लाह ने क़ुरआन और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़रिए सच्चाई को स्पष्ट कर दिया है, और यही उनके लिए काफ़ी है।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों! यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई के सामने हठधर्मी और बहानेबाज़ी नहीं करनी चाहिए। अल्लाह ने हमें क़ुरआन जैसी रोशनी दी है, जो हर युग में ज़िंदा है। हमें चाहिए कि हम उस पर अमल करें और आख़िरत के दिन के लिए तैयारी करें। याद रखिए, पुनरुत्थान का वादा सच्चा है, और उस दिन हर कोई अपने कर्मों का फल पाएगा। आइए, हम अपने दिलों को ईमान की रोशनी से रोशन करें और अल्लाह की आयतों पर ग़ौर करें, ताकि हम उन लोगों में से न हों जो सच्चाई को देखकर भी उसे ठुकरा देते हैं। अल्लाह हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 23-27 — अल-जासिया

23أَفَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ وَأَضَلَّهُ اللَّهُ عَلَىٰ عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمْعِهِ وَقَلْبِهِ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِ غِشَاوَةً فَمَن يَهْدِيهِ مِن بَعْدِ اللَّهِ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
भला तुमने उस शख़्श को भी देखा है जिसने अपनी नफसियानी ख़वाहिशों को माबूद बना रखा है और (उसकी हालत) समझ बूझ कर ख़ुदा ने उसे गुमराही में छोड़ दिया है और उसके कान और दिल पर अलामत मुक़र्रर कर दी है (कि ये ईमान न लाएगा) और उसकी ऑंख पर पर्दा डाल दिया है फिर ख़ुदा के बाद उसकी हिदायत कौन कर सकता है तो क्या तुम लोग (इतना भी) ग़ौर नहीं करते
24وَقَالُوا مَا هِيَ إِلَّا حَيَاتُنَا الدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا يُهْلِكُنَا إِلَّا الدَّهْرُ ۚ وَمَا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَظُنُّونَ
और वह लोग कहते हैं कि हमारी ज़िन्दगी तो बस दुनिया ही की है (यहीं) मरते हैं और (यहीं) जीते हैं और हमको बस ज़माना ही (जिलाता) मारता है और उनको इसकी कुछ ख़बर तो है नहीं ये लोग तो बस अटकल की बातें करते हैं
25وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ مَّا كَانَ حُجَّتَهُمْ إِلَّا أَن قَالُوا ائْتُوا بِآبَائِنَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और जब उनके सामने हमारी खुली खुली आयतें पढ़ी जाती हैं तो उनकी कट हुज्जती बस यही होती है कि वह कहते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो हमारे बाप दादाओं को (जिला कर) ले तो आओ
26قُلِ اللَّهُ يُحْيِيكُمْ ثُمَّ يُمِيتُكُمْ ثُمَّ يَجْمَعُكُمْ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ لَا رَيْبَ فِيهِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा ही तुमको ज़िन्दा (पैदा) करता है और वही तुमको मारता है फिर वही तुमको क़यामत के दिन जिस (के होने) में किसी तरह का शक़ नहीं जमा करेगा मगर अक्सर लोग नहीं जानते
27وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ يَوْمَئِذٍ يَخْسَرُ الْمُبْطِلُونَ
और सारे आसमान व ज़मीन की बादशाहत ख़ास ख़ुदा की है और जिस रोज़ क़यामत बरपा होगी उस रोज़ अहले बातिल बड़े घाटे में रहेंगे
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अनुवाद — अल-जासिया 25

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Tuesday, August 18, 2026

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