अल-माइदा · 113/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
قَالُوا نُرِيدُ أَن نَّأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَن قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ ۝١١٣
Qaaloo nureedu an naakula minhaa wa tatam`inna quloo bunaa wa na`lama an qad sadaqtana wa nakoona `alaihaa minash shaahideen
📖 हिंदी अर्थ
वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है कि इसमें से (बरतकन) कुछ खाएँ और हमारे दिल को (आपकी रिसालत का पूरा पूरा) इत्मेनान हो जाए और यक़ीन कर लें कि आपने हमसे (जो कुछ कहा था) सच फरमाया था और हम लोग इस पर गवाह रहें
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَأْكُلَ مِنْهَا: उस (मेज़) में से खाएँ — यहाँ खाने का उद्देश्य भूख मिटाना नहीं, बल्कि बरकत हासिल करना है।
  • تَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا: हमारे दिलों को सुकून और इत्मिनान मिले।
  • صَدَقْتَنَا: आपने हमें सच बताया (आपकी नबुव्वत का सच्चा होना)।
  • الشَّاهِدِينَ: गवाह बनने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

हवारियों (ईसा अलैहिस्सलाम के विश्वासपात्र साथियों) ने अल्लाह से यह दुआ करने के लिए कहा कि आसमान से एक मेज़ (खाने की दस्तरख़्वान) उतारी जाए। उन्होंने कहा: "हम चाहते हैं कि हम उसमें से खाएँ — और यह खाना भूख की वजह से नहीं, बल्कि बरकत और अल्लाह की क़ुदरत को देखने के लिए हो।" उनका दूसरा मक़सद यह था कि इस मेज़ को देखकर उनके दिलों को पूरा सुकून और इत्मिनान मिले, और उनका ईमान और यक़ीन मज़बूत हो जाए। तीसरा उद्देश्य यह था कि वे इस चमत्कार को देखकर निश्चित रूप से जान लें कि ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं और उन्होंने जो कुछ भी अल्लाह की तरफ़ से बताया है, वह सब सच है। चौथा मक़सद यह था कि वे इस आयत (निशानी) के गवाह बनें — यानी वे उन लोगों के सामने गवाही दें जो वहाँ मौजूद नहीं थे, कि अल्लाह की क़ुदरत और ईसा अलैहिस्सलाम की सच्चाई का यह प्रत्यक्ष प्रमाण हमने अपनी आँखों से देखा।

यह उनके ईमान की कमज़ोरी नहीं थी, बल्कि यक़ीन की मज़ीद तरक़्क़ी और दिल के इत्मिनान की ख़्वाहिश थी, ताकि उनका ईमान दलील और मशाहिदा (प्रत्यक्ष देखने) पर क़ायम हो जाए।

फ़ायदे (सबक़):

  1. मोमिन को चाहिए कि वह अल्लाह से दुआ में दुनिया और आख़िरत की भलाई माँगे, और दिल के इत्मिनान की दुआ करे — क्योंकि दिल का सुकून ही असली सुकून है।
  2. ईमान में इज़ाफ़ा और यक़ीन की मज़बूती के लिए अल्लाह के निशानों को देखना और उन पर ग़ौर करना बहुत बड़ा ज़रिया है।
  3. सच्चे ईमान की निशानी यह है कि इंसान अल्लाह की क़ुदरत और उसके रसूलों की सच्चाई पर गवाह बने और दूसरों तक यह पैग़ाम पहुँचाए।
  4. अल्लाह से माँगने में कोई शर्म नहीं है, बल्कि यह ईमान की ताक़त है कि बंदा अपने रब से अपनी ज़रूरतें बयान करे — चाहे वह दिल के इत्मिनान की ज़रूरत ही क्यों न हो।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि दीन में यक़ीन की मंज़िलें होती हैं — पहले इल्म (जानना), फिर ऐन-उल-यक़ीन (देखकर यक़ीन) — और हर मंज़िल पर चढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 111-115 — अल-माइदा

111وَإِذْ أَوْحَيْتُ إِلَى الْحَوَارِيِّينَ أَنْ آمِنُوا بِي وَبِرَسُولِي قَالُوا آمَنَّا وَاشْهَدْ بِأَنَّنَا مُسْلِمُونَ
और जब मैने हवारियों से इलहाम किया कि मुझ पर और मेरे रसूल पर ईमान लाओ तो अर्ज़ करने लगे हम ईमान लाए और तू गवाह रहना कि हम तेरे फरमाबरदार बन्दे हैं
112إِذْ قَالَ الْحَوَارِيُّونَ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ هَلْ يَسْتَطِيعُ رَبُّكَ أَن يُنَزِّلَ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِّنَ السَّمَاءِ ۖ قَالَ اتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
(वह वक्त याद करो) जब हवारियों ने ईसा से अर्ज़ की कि ऐ मरियम के बेटे ईसा क्या आप का ख़ुदा उस पर क़ादिर है कि हम पर आसमान से (नेअमत की) एक ख्वान नाज़िल फरमाए ईसा ने कहा अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा से डरो (ऐसी फरमाइश जिसमें इम्तेहान मालूम हो न करो)
113قَالُوا نُرِيدُ أَن نَّأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَن قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ
वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है कि इसमें से (बरतकन) कुछ खाएँ और हमारे दिल को (आपकी रिसालत का पूरा पूरा) इत्मेनान हो जाए और यक़ीन कर लें कि आपने हमसे (जो कुछ कहा था) सच फरमाया था और हम लोग इस पर गवाह रहें
114قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَنزِلْ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِّنَ السَّمَاءِ تَكُونُ لَنَا عِيدًا لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا وَآيَةً مِّنكَ ۖ وَارْزُقْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
(तब) मरियम के बेटे ईसा ने (बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की ख़ुदा वन्दा ऐ हमारे पालने वाले हम पर आसमान से एक ख्वान (नेअमत) नाज़िल फरमा कि वह दिन हम लोगों के लिए हमारे अगलों के लिए और हमारे पिछलों के लिए ईद का करार पाए (और हमारे हक़ में) तेरी तरफ से एक बड़ी निशानी हो और तू हमें रोज़ी दे और तू सब रोज़ी देने वालो से बेहतर है
115قَالَ اللَّهُ إِنِّي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْ ۖ فَمَن يَكْفُرْ بَعْدُ مِنكُمْ فَإِنِّي أُعَذِّبُهُ عَذَابًا لَّا أُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِّنَ الْعَالَمِينَ
खुदा ने फरमाया मै ख्वान तो तुम पर ज़रुर नाज़िल करुगाँ (मगर याद रहे कि) फिर तुममें से जो भी शख़्श उसके बाद काफ़िर हुआ तो मै उसको यक़ीन ऐसे सख्त अज़ाब की सज़ा दूँगा कि सारी ख़ुदायी में किसी एक पर भी वैसा (सख्त) अज़ाब न करुगाँ
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीRevelation
113आयत

अनुवाद — अल-माइदा 113

सूरा अल-माइदा आयत 113 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है…

सूरा आयत 113/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 111–115. हिंदी अर्थ: اردو.




पवित्र क़ुरआन


Tuesday, August 18, 2026

अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए