Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- نَأْكُلَ مِنْهَا: उस (मेज़) में से खाएँ — यहाँ खाने का उद्देश्य भूख मिटाना नहीं, बल्कि बरकत हासिल करना है।
- تَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا: हमारे दिलों को सुकून और इत्मिनान मिले।
- صَدَقْتَنَا: आपने हमें सच बताया (आपकी नबुव्वत का सच्चा होना)।
- الشَّاهِدِينَ: गवाह बनने वाले।
तफ़सीर (व्याख्या):
हवारियों (ईसा अलैहिस्सलाम के विश्वासपात्र साथियों) ने अल्लाह से यह दुआ करने के लिए कहा कि आसमान से एक मेज़ (खाने की दस्तरख़्वान) उतारी जाए। उन्होंने कहा: "हम चाहते हैं कि हम उसमें से खाएँ — और यह खाना भूख की वजह से नहीं, बल्कि बरकत और अल्लाह की क़ुदरत को देखने के लिए हो।" उनका दूसरा मक़सद यह था कि इस मेज़ को देखकर उनके दिलों को पूरा सुकून और इत्मिनान मिले, और उनका ईमान और यक़ीन मज़बूत हो जाए। तीसरा उद्देश्य यह था कि वे इस चमत्कार को देखकर निश्चित रूप से जान लें कि ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं और उन्होंने जो कुछ भी अल्लाह की तरफ़ से बताया है, वह सब सच है। चौथा मक़सद यह था कि वे इस आयत (निशानी) के गवाह बनें — यानी वे उन लोगों के सामने गवाही दें जो वहाँ मौजूद नहीं थे, कि अल्लाह की क़ुदरत और ईसा अलैहिस्सलाम की सच्चाई का यह प्रत्यक्ष प्रमाण हमने अपनी आँखों से देखा।
यह उनके ईमान की कमज़ोरी नहीं थी, बल्कि यक़ीन की मज़ीद तरक़्क़ी और दिल के इत्मिनान की ख़्वाहिश थी, ताकि उनका ईमान दलील और मशाहिदा (प्रत्यक्ष देखने) पर क़ायम हो जाए।
फ़ायदे (सबक़):
- मोमिन को चाहिए कि वह अल्लाह से दुआ में दुनिया और आख़िरत की भलाई माँगे, और दिल के इत्मिनान की दुआ करे — क्योंकि दिल का सुकून ही असली सुकून है।
- ईमान में इज़ाफ़ा और यक़ीन की मज़बूती के लिए अल्लाह के निशानों को देखना और उन पर ग़ौर करना बहुत बड़ा ज़रिया है।
- सच्चे ईमान की निशानी यह है कि इंसान अल्लाह की क़ुदरत और उसके रसूलों की सच्चाई पर गवाह बने और दूसरों तक यह पैग़ाम पहुँचाए।
- अल्लाह से माँगने में कोई शर्म नहीं है, बल्कि यह ईमान की ताक़त है कि बंदा अपने रब से अपनी ज़रूरतें बयान करे — चाहे वह दिल के इत्मिनान की ज़रूरत ही क्यों न हो।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दीन में यक़ीन की मंज़िलें होती हैं — पहले इल्म (जानना), फिर ऐन-उल-यक़ीन (देखकर यक़ीन) — और हर मंज़िल पर चढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।
📜 आयत 111-115 — सूरा अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 113
सूरा अल-माइदा आयत 113 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है…सूरा आयत 113/120 — सूरा अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-माइदा सुनें, सूरा अल-माइदा अनुवाद, सूरा अल-माइदा mp3, सूरा अल-माइदा pdf. आयत 111–115. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-माइदा
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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