अल-माइदा · 115/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
قَالَ اللَّهُ إِنِّي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْ ۖ فَمَن يَكْفُرْ بَعْدُ مِنكُمْ فَإِنِّي أُعَذِّبُهُ عَذَابًا لَّا أُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِّنَ الْعَالَمِينَ ۝١١٥
Waalal laahu innee munaz ziluhaa `alaikum faman yakfur ba`du minkum fa inneee u`azzibuhoo `azaabal laaa u`azzibuhooo ahadam minal `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
खुदा ने फरमाया मै ख्वान तो तुम पर ज़रुर नाज़िल करुगाँ (मगर याद रहे कि) फिर तुममें से जो भी शख़्श उसके बाद काफ़िर हुआ तो मै उसको यक़ीन ऐसे सख्त अज़ाब की सज़ा दूँगा कि सारी ख़ुदायी में किसी एक पर भी वैसा (सख्त) अज़ाब न करुगाँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मुनज़्ज़िलुहा: मैं इसे उतारने वाला हूँ।
  • यक्फुर: कुफ़्र करे, इनकार करे।
  • आलमीन: संसारों के लोग (अपने समय के सभी लोग)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की प्रार्थना स्वीकार करते हुए फ़रमाया: "मैं यह माइदा (भोजन की थाली) तुम पर उतारने वाला हूँ।" यह अल्लाह की क़ुदरत का एक महान चमत्कार था, जो उनके सच्चे नबी होने की पुष्टि करता था। लेकिन साथ ही अल्लाह ने एक सख़्त चेतावनी भी दी कि इस चमत्कार के बाद जो कोई भी कुफ़्र करेगा—अर्थात अल्लाह की वहदानियत (एकता) या हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की नबुव्वत का इनकार करेगा—तो अल्लाह उसे ऐसा अज़ाब देगा जो उसने पूरे संसार के किसी को नहीं दिया होगा। यह अज़ाब इसलिए होगा क्योंकि उसने इतना स्पष्ट चमत्कार देखने के बाद भी जानबूझकर सत्य को ठुकराया, यह सिर्फ़ हठधर्मी और ज़िद पर आधारित कुफ़्र था।

इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह ने अपना वादा पूरा किया और माइदा (भोजन की थाली) उतारी, जैसा कि क़ुरआन और हदीस की रिवायात से साबित है। यह चमत्कार उन लोगों के लिए एक परीक्षा थी—जो ईमान लाए वे सफल हुए, और जिन्होंने इनकार किया वे अल्लाह के सख़्त अज़ाब के हक़दार बने।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह की क़ुदरत और वादे की सच्चाई: यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह अपने नबियों की प्रार्थना सुनता है और अपने वादे को पूरा करता है। जब अल्लाह किसी बात का वादा करता है, तो वह अवश्य पूरा होता है—चाहे वह दुनिया में हो या आख़िरत में।
  2. चमत्कार देखने के बाद भी इनकार करना बहुत बड़ा गुनाह है: जब इंसान के सामने सत्य स्पष्ट हो जाए और फिर भी वह उसे ठुकराए, तो यह अल्लाह की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण बनता है। यह हमें सिखाता है कि सत्य को स्वीकार करने में देरी न करें और अपनी ज़िद को छोड़ दें।
  3. अल्लाह का अज़ाब न्यायपूर्ण है: अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि जो स्पष्ट सत्य को जानबूझकर ठुकराता है, उसे उसकी हठधर्मिता की सज़ा मिलती है। यह हमें अल्लाह के इंसाफ़ की याद दिलाता है और उसके अज़ाब से डरने की तरग़ीब देता है।
  4. नबियों की दुआ की अहमियत: हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी उम्मत के लिए दुआ की, और अल्लाह ने उसे क़बूल किया। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने लिए और अपनी उम्मत के लिए दुआ करनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह अपने नेक बंदों की दुआएँ क़बूल करता है।
  5. ईमान की नेमत की क़द्र: यह आयत हमें अपने ईमान की नेमत की क़द्र करना सिखाती है। जब अल्लाह हमें सत्य समझने की तौफ़ीक़ देता है, तो हमें उस पर साबित क़दम रहना चाहिए और उसे खोने से बचना चाहिए, क्योंकि ईमान के बाद कुफ़्र का अंजाम बहुत भयानक है।


📜 आयत 113-117 — अल-माइदा

113قَالُوا نُرِيدُ أَن نَّأْكُلَ مِنْهَا وَتَطْمَئِنَّ قُلُوبُنَا وَنَعْلَمَ أَن قَدْ صَدَقْتَنَا وَنَكُونَ عَلَيْهَا مِنَ الشَّاهِدِينَ
वह अर्ज़ करने लगे हम तो फक़त ये चाहते है कि इसमें से (बरतकन) कुछ खाएँ और हमारे दिल को (आपकी रिसालत का पूरा पूरा) इत्मेनान हो जाए और यक़ीन कर लें कि आपने हमसे (जो कुछ कहा था) सच फरमाया था और हम लोग इस पर गवाह रहें
114قَالَ عِيسَى ابْنُ مَرْيَمَ اللَّهُمَّ رَبَّنَا أَنزِلْ عَلَيْنَا مَائِدَةً مِّنَ السَّمَاءِ تَكُونُ لَنَا عِيدًا لِّأَوَّلِنَا وَآخِرِنَا وَآيَةً مِّنكَ ۖ وَارْزُقْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
(तब) मरियम के बेटे ईसा ने (बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की ख़ुदा वन्दा ऐ हमारे पालने वाले हम पर आसमान से एक ख्वान (नेअमत) नाज़िल फरमा कि वह दिन हम लोगों के लिए हमारे अगलों के लिए और हमारे पिछलों के लिए ईद का करार पाए (और हमारे हक़ में) तेरी तरफ से एक बड़ी निशानी हो और तू हमें रोज़ी दे और तू सब रोज़ी देने वालो से बेहतर है
115قَالَ اللَّهُ إِنِّي مُنَزِّلُهَا عَلَيْكُمْ ۖ فَمَن يَكْفُرْ بَعْدُ مِنكُمْ فَإِنِّي أُعَذِّبُهُ عَذَابًا لَّا أُعَذِّبُهُ أَحَدًا مِّنَ الْعَالَمِينَ
खुदा ने फरमाया मै ख्वान तो तुम पर ज़रुर नाज़िल करुगाँ (मगर याद रहे कि) फिर तुममें से जो भी शख़्श उसके बाद काफ़िर हुआ तो मै उसको यक़ीन ऐसे सख्त अज़ाब की सज़ा दूँगा कि सारी ख़ुदायी में किसी एक पर भी वैसा (सख्त) अज़ाब न करुगाँ
116وَإِذْ قَالَ اللَّهُ يَا عِيسَى ابْنَ مَرْيَمَ أَأَنتَ قُلْتَ لِلنَّاسِ اتَّخِذُونِي وَأُمِّيَ إِلَٰهَيْنِ مِن دُونِ اللَّهِ ۖ قَالَ سُبْحَانَكَ مَا يَكُونُ لِي أَنْ أَقُولَ مَا لَيْسَ لِي بِحَقٍّ ۚ إِن كُنتُ قُلْتُهُ فَقَدْ عَلِمْتَهُ ۚ تَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِي وَلَا أَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِكَ ۚ إِنَّكَ أَنتَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
और (वह वक्त भी याद करो) जब क़यामत में ईसा से ख़ुदा फरमाएग कि (क्यों) ऐ मरियम के बेटे ईसा क्या तुमने लोगों से ये कह दिया था कि ख़ुदा को छोड़कर मुझ को और मेरी माँ को ख़ुदा बना लो ईसा अर्ज़ करेगें सुबहान अल्लाह मेरी तो ये मजाल न थी कि मै ऐसी बात मुँह से निकालूं जिसका मुझे कोई हक़ न हो (अच्छा) अगर मैने कहा होगा तो तुझको ज़रुर मालूम ही होगा क्योंकि तू मेरे दिल की (सब बात) जानता है हाँ अलबत्ता मै तेरे जी की बात नहीं जानता (क्योंकि) इसमें तो शक़ ही नहीं कि तू ही ग़ैब की बातें ख़ूब जानता है
117مَا قُلْتُ لَهُمْ إِلَّا مَا أَمَرْتَنِي بِهِ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ رَبِّي وَرَبَّكُمْ ۚ وَكُنتُ عَلَيْهِمْ شَهِيدًا مَّا دُمْتُ فِيهِمْ ۖ فَلَمَّا تَوَفَّيْتَنِي كُنتَ أَنتَ الرَّقِيبَ عَلَيْهِمْ ۚ وَأَنتَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
तूने मुझे जो कुछ हुक्म दिया उसके सिवा तो मैने उनसे कुछ भी नहीं कहा यही कि ख़ुदा ही की इबादत करो जो मेरा और तुम्हारा सबका पालने वाला है और जब तक मैं उनमें रहा उन की देखभाल करता रहा फिर जब तूने मुझे (दुनिया से) उठा लिया तो तू ही उनका निगेहबान था और तू तो ख़ुद हर चीज़ का गवाह (मौजूद) है
अल-माइदाकुरान सूची
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अनुवाद — अल-माइदा 115

सूरा अल-माइदा आयत 115 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : खुदा ने फरमाया मै ख्वान तो तुम पर ज़रुर नाज़िल…

सूरा आयत 115/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 113–117. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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