अल-माइदा · 23/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
قَالَ رَجُلَانِ مِنَ الَّذِينَ يَخَافُونَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمَا ادْخُلُوا عَلَيْهِمُ الْبَابَ فَإِذَا دَخَلْتُمُوهُ فَإِنَّكُمْ غَالِبُونَ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَتَوَكَّلُوا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۝٢٣
Qaala rajulaani minal lazeena yakhaafoona an`amal laahu `alaihimad khuloo `alaihimul baab, fa izaa dakhaltumoohu fa innakum ghaaliboon; wa `alal laahi fatawakkalooo in kuntum mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
(मगर) वह आदमी (यूशा कालिब) जो ख़ुदा का ख़ौफ़ रखते थे और जिनपर ख़ुदा ने ख़ास अपना फ़ज़ल (करम) किया था बेधड़क बोल उठे कि (अरे) उनपर हमला करके (बैतुल मुक़दस के फाटक में तो घुस पड़ो फिर देखो तो यह ऐसे बोदे हैं कि) इधर तुम फाटक में घुसे और (ये सब भाग खड़े हुए और) तुम्हारी जीत हो गयी और अगर सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही पर भरोसा रखो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَخَافُونَ: जो अल्लाह से डरते हैं और उसका भय रखते हैं।
  • أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمَا: अल्लाह ने उन दोनों पर कृपा की, यानी उन्हें ईमान और दृढ़ता का सौभाग्य प्रदान किया।
  • الْبَابَ: शहर का दरवाज़ा, जो उन ज़ालिमों (जबरदस्त) के क़िले का प्रवेश द्वार था।
  • غَالِبُونَ: विजयी और प्रभावी होने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस ऐतिहासिक घटना का वर्णन करती है जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम बनी इसराइल को अल्लाह के आदेश से उस पवित्र भूमि (बैतुल-मुक़द्दस) में प्रवेश करने का निर्देश दिया, जो उनके लिए निर्धारित की गई थी। लेकिन वहाँ के शासक अत्याचारी और जबरदस्त थे, जिससे बनी इसराइल डर गए और उन्होंने प्रवेश करने से इनकार कर दिया। उस समय दो ऐसे व्यक्ति, जो अल्लाह से डरने वाले थे और जिन पर अल्लाह ने अपनी विशेष कृपा की थी — उन्हें ईमान की मज़बूती और साहस प्रदान किया था — ने अपनी क़ौम को समझाया और कहा: "तुम उन ज़ालिमों के शहर के दरवाज़े से प्रवेश करो, क्योंकि जब तुम उस दरवाज़े में दाख़िल हो जाओगे, तो अल्लाह की मदद से तुम ही विजयी रहोगे।" उन्होंने यह भी कहा कि यह केवल शाब्दिक दावा नहीं है, बल्कि इसके लिए अल्लाह पर पूरा भरोसा (तवक्कुल) करना आवश्यक है, क्योंकि सच्चा ईमान अल्लाह पर भरोसा करने का ही दूसरा नाम है।

इन दोनों ने अपनी बात में दो महत्वपूर्ण बातें सिखाईं: पहली, कि जीत का रास्ता अल्लाह के आदेश का पालन करने में है, चाहे बाहरी हालात कितने भी भयावह क्यों न हों; और दूसरी, कि मुसलमान को ज़रूरी क़दम उठाने (अख़्ज़ बिल-अस्बाब) के साथ-साथ अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना चाहिए। यही वह सुन्नत (अल्लाह की व्यवस्था) है जिसके अनुसार अल्लाह उन लोगों की मदद करता है जो ईमान के साथ साहस और अमल करते हैं।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम अल्लाह के आदेशों पर चलते हैं और उस पर भरोसा करते हैं, तो अल्लाह हमें वह ताक़त और विजय देता है जिसका हमने कभी सोचा भी नहीं होता। डर और कायरता कभी किसी क़ौम को ऊपर नहीं उठा सकती; सच्ची कामयाबी उन्हीं को मिलती है जो अल्लाह पर तवक्कुल करते हुए साहस के साथ आगे बढ़ते हैं। याद रखिए, अल्लाह का वादा सच्चा है — जो लोग ईमान लाते हैं और अल्लाह पर भरोसा करते हैं, अल्लाह उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता। आइए, हम भी अपनी ज़िंदगी के हर मोड़ पर अल्लाह पर भरोसा करें और उसके आदेशों का पालन करने में कभी संकोच न करें, क्योंकि यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है।



📜 आयत 21-25 — अल-माइदा

21يَا قَوْمِ ادْخُلُوا الْأَرْضَ الْمُقَدَّسَةَ الَّتِي كَتَبَ اللَّهُ لَكُمْ وَلَا تَرْتَدُّوا عَلَىٰ أَدْبَارِكُمْ فَتَنقَلِبُوا خَاسِرِينَ
ऐ मेरी क़ौम (शाम) की उस मुक़द्दस ज़मीन में जाओ जहॉ ख़ुदा ने तुम्हारी तक़दीर में (हुकूमत) लिख दी है और दुशमन के मुक़ाबले पीठ न फेरो (क्योंकि) इसमें तो तुम ख़ुद उलटा घाटा उठाओगे
22قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِنَّ فِيهَا قَوْمًا جَبَّارِينَ وَإِنَّا لَن نَّدْخُلَهَا حَتَّىٰ يَخْرُجُوا مِنْهَا فَإِن يَخْرُجُوا مِنْهَا فَإِنَّا دَاخِلُونَ
वह लोग कहने लगे कि ऐ मूसा इस मुल्क में तो बड़े ज़बरदस्त (सरकश) लोग रहते हैं और जब तक वह लोग इसमें से निकल न जाएं हम तो उसमें कभी पॉव भी न रखेंगे हॉ अगर वह लोग ख़ुद इसमें से निकल जाएं तो अलबत्ता हम ज़रूर जाएंगे
23قَالَ رَجُلَانِ مِنَ الَّذِينَ يَخَافُونَ أَنْعَمَ اللَّهُ عَلَيْهِمَا ادْخُلُوا عَلَيْهِمُ الْبَابَ فَإِذَا دَخَلْتُمُوهُ فَإِنَّكُمْ غَالِبُونَ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَتَوَكَّلُوا إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
(मगर) वह आदमी (यूशा कालिब) जो ख़ुदा का ख़ौफ़ रखते थे और जिनपर ख़ुदा ने ख़ास अपना फ़ज़ल (करम) किया था बेधड़क बोल उठे कि (अरे) उनपर हमला करके (बैतुल मुक़दस के फाटक में तो घुस पड़ो फिर देखो तो यह ऐसे बोदे हैं कि) इधर तुम फाटक में घुसे और (ये सब भाग खड़े हुए और) तुम्हारी जीत हो गयी और अगर सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही पर भरोसा रखो
24قَالُوا يَا مُوسَىٰ إِنَّا لَن نَّدْخُلَهَا أَبَدًا مَّا دَامُوا فِيهَا ۖ فَاذْهَبْ أَنتَ وَرَبُّكَ فَقَاتِلَا إِنَّا هَاهُنَا قَاعِدُونَ
वह कहने लगे एक मूसा (चाहे जो कुछ हो) जब तक वह लोग इसमें हैं हम तो उसमें हरगिज़ (लाख बरस) पॉव न रखेंगे हॉ तुम जाओ और तुम्हारा ख़ुदा जाए ओर दोनों (जाकर) लड़ो हम तो यहीं जमे बैठे हैं
25قَالَ رَبِّ إِنِّي لَا أَمْلِكُ إِلَّا نَفْسِي وَأَخِي ۖ فَافْرُقْ بَيْنَنَا وَبَيْنَ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ
तब मूसा ने अर्ज़ की ख़ुदावन्दा तू ख़ूब वाक़िफ़ है कि अपनी ज़ाते ख़ास और अपने भाई के सिवा किसी पर मेरा क़ाबू नहीं बस अब हमारे और उन नाफ़रमान लोगों के दरमियान जुदाई डाल दे
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अनुवाद — अल-माइदा 23

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Tuesday, August 18, 2026

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