Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- تَنقِمُونَ – तुम बुरा मानते हो, आपत्ति करते हो, या हम पर कोई दोष लगाते हो।
- آمَنَّا – हम ईमान लाए।
- فَاسِقُونَ – अवज्ञाकारी, आज्ञा से निकल जाने वाले, पापी।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ नबी! आप उन अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से कह दीजिए जो आपका मज़ाक उड़ाते हैं और आप पर आक्षेप लगाते हैं: “क्या तुम हम पर कोई ऐब या दोष लगाते हो? हमारा एकमात्र ‘दोष’ यही है कि हम अल्लाह पर ईमान लाए, उस किताब (क़ुरआन) पर ईमान लाए जो हमारी ओर उतारी गई, और उन किताबों पर भी ईमान लाए जो हमसे पहले (तौरात, इंजील आदि) उतारी गईं। और हम यह भी मानते हैं कि तुममें से अधिकतर लोग अल्लाह की आज्ञा से निकलकर अवज्ञाकारी और पापी हो गए हैं।”
यानी तुम हमारे ईमान को ही बुरा मानते हो, जबकि यह ईमान हमारे लिए सम्मान और गौरव की बात है, न कि कोई दोष। हमने सभी सच्चे दीन को अपनाया है और उन सब रसूलों पर ईमान रखा है जिन्हें अल्लाह ने भेजा। तुम्हारा हम पर यह आक्षेप दरअसल तुम्हारे अपने हठ और सत्य से विमुख होने का प्रमाण है, क्योंकि तुम हमारे सीधे रास्ते पर चलने से नाराज़ हो, जबकि तुममें से अधिकतर लोग स्वयं अल्लाह की अवज्ञा में डूबे हुए हो।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- इस आयत से हमें सीख मिलती है कि सच्चे मुसलमान को अपने ईमान पर गर्व होना चाहिए और विरोधियों के तानों से विचलित नहीं होना चाहिए। जब हमारा काम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा पर हो, तो दुनिया की निंदा का कोई असर नहीं होता।
- यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों की आलोचना का उत्तर शालीनता और तर्क से देना चाहिए, गुस्से या जवाबी हमले से नहीं। नबी ﷺ को निर्देश दिया गया कि वे स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति बयान करें।
- ईमान का अर्थ है अल्लाह पर, उसकी सभी किताबों पर और उसके सभी रसूलों पर विश्वास करना। यही वह पुल है जो सभी अंबिया की शिक्षाओं को जोड़ता है, और यही इस्लाम की सुंदरता है कि वह किसी एक किताब या रसूल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी रिसालत पर ईमान रखता है।
- आयत में अहले-किताब की अधिकतर लोगों को फ़ासिक़ (अवज्ञाकारी) बताना एक चेतावनी है कि केवल नाम या वंश से कोई सम्मान नहीं मिलता, बल्कि अल्लाह की आज्ञा का पालन ही सच्ची कामयाबी है। यह हमें अपने आचरण को सुधारने की प्रेरणा देता है।
- यह आयत मुसलमानों को धैर्य और स्पष्टवादिता सिखाती है—सत्य को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए, चाहे सुनने वाले नाराज़ ही क्यों न हों।
📜 आयत 57-61 — सूरा अल-माइदा
अनुवाद — अल-माइदा 59
सूरा अल-माइदा आयत 59 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल अहले किताब से कहो कि) आख़िर तुम हमसे…सूरा आयत 59/120 — सूरा अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-माइदा सुनें, सूरा अल-माइदा अनुवाद, सूरा अल-माइदा mp3, सूरा अल-माइदा pdf. आयत 57–61. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अल-माइदा
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


