अल-माइदा · 59/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ هَلْ تَنقِمُونَ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلُ وَأَنَّ أَكْثَرَكُمْ فَاسِقُونَ ۝٥٩
Qul yaaa Ahlal Kitaabi hal tanqimoona minnaaa illaaa an aamannaa billaahi wa maaa unzila ilainaa wa maa unzila min qablu wa annna aksarakum faasiqoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल अहले किताब से कहो कि) आख़िर तुम हमसे इसके सिवा और क्या ऐब लगा सकते हो कि हम ख़ुदा पर और जो (किताब) हमारे पास भेजी गयी है और जो हमसे पहले भेजी गयी ईमान लाए हैं और ये तुममें के अक्सर बदकार हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَنقِمُونَ – तुम बुरा मानते हो, आपत्ति करते हो, या हम पर कोई दोष लगाते हो।
  • آمَنَّا – हम ईमान लाए।
  • فَاسِقُونَ – अवज्ञाकारी, आज्ञा से निकल जाने वाले, पापी।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप उन अहले-किताब (यहूदियों और ईसाइयों) से कह दीजिए जो आपका मज़ाक उड़ाते हैं और आप पर आक्षेप लगाते हैं: “क्या तुम हम पर कोई ऐब या दोष लगाते हो? हमारा एकमात्र ‘दोष’ यही है कि हम अल्लाह पर ईमान लाए, उस किताब (क़ुरआन) पर ईमान लाए जो हमारी ओर उतारी गई, और उन किताबों पर भी ईमान लाए जो हमसे पहले (तौरात, इंजील आदि) उतारी गईं। और हम यह भी मानते हैं कि तुममें से अधिकतर लोग अल्लाह की आज्ञा से निकलकर अवज्ञाकारी और पापी हो गए हैं।”

यानी तुम हमारे ईमान को ही बुरा मानते हो, जबकि यह ईमान हमारे लिए सम्मान और गौरव की बात है, न कि कोई दोष। हमने सभी सच्चे दीन को अपनाया है और उन सब रसूलों पर ईमान रखा है जिन्हें अल्लाह ने भेजा। तुम्हारा हम पर यह आक्षेप दरअसल तुम्हारे अपने हठ और सत्य से विमुख होने का प्रमाण है, क्योंकि तुम हमारे सीधे रास्ते पर चलने से नाराज़ हो, जबकि तुममें से अधिकतर लोग स्वयं अल्लाह की अवज्ञा में डूबे हुए हो।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि सच्चे मुसलमान को अपने ईमान पर गर्व होना चाहिए और विरोधियों के तानों से विचलित नहीं होना चाहिए। जब हमारा काम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा पर हो, तो दुनिया की निंदा का कोई असर नहीं होता।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि दूसरों की आलोचना का उत्तर शालीनता और तर्क से देना चाहिए, गुस्से या जवाबी हमले से नहीं। नबी ﷺ को निर्देश दिया गया कि वे स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति बयान करें।
  3. ईमान का अर्थ है अल्लाह पर, उसकी सभी किताबों पर और उसके सभी रसूलों पर विश्वास करना। यही वह पुल है जो सभी अंबिया की शिक्षाओं को जोड़ता है, और यही इस्लाम की सुंदरता है कि वह किसी एक किताब या रसूल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी रिसालत पर ईमान रखता है।
  4. आयत में अहले-किताब की अधिकतर लोगों को फ़ासिक़ (अवज्ञाकारी) बताना एक चेतावनी है कि केवल नाम या वंश से कोई सम्मान नहीं मिलता, बल्कि अल्लाह की आज्ञा का पालन ही सच्ची कामयाबी है। यह हमें अपने आचरण को सुधारने की प्रेरणा देता है।
  5. यह आयत मुसलमानों को धैर्य और स्पष्टवादिता सिखाती है—सत्य को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए, चाहे सुनने वाले नाराज़ ही क्यों न हों।


📜 आयत 57-61 — अल-माइदा

57يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
58وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते
59قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ هَلْ تَنقِمُونَ مِنَّا إِلَّا أَنْ آمَنَّا بِاللَّهِ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْنَا وَمَا أُنزِلَ مِن قَبْلُ وَأَنَّ أَكْثَرَكُمْ فَاسِقُونَ
(ऐ रसूल अहले किताब से कहो कि) आख़िर तुम हमसे इसके सिवा और क्या ऐब लगा सकते हो कि हम ख़ुदा पर और जो (किताब) हमारे पास भेजी गयी है और जो हमसे पहले भेजी गयी ईमान लाए हैं और ये तुममें के अक्सर बदकार हैं
60قُلْ هَلْ أُنَبِّئُكُم بِشَرٍّ مِّن ذَٰلِكَ مَثُوبَةً عِندَ اللَّهِ ۚ مَن لَّعَنَهُ اللَّهُ وَغَضِبَ عَلَيْهِ وَجَعَلَ مِنْهُمُ الْقِرَدَةَ وَالْخَنَازِيرَ وَعَبَدَ الطَّاغُوتَ ۚ أُولَٰئِكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضَلُّ عَن سَوَاءِ السَّبِيلِ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तुम्हें ख़ुदा के नज़दीक सज़ा में इससे कहीं बदतर ऐब बता दूं (अच्छा लो सुनो) जिसपर ख़ुदा ने लानत की हो और उस पर ग़ज़ब ढाया हो और उनमें से किसी को (मसख़ करके) बन्दर और (किसी को) सूअर बना दिया हो और (ख़ुदा को छोड़कर) शैतान की परस्तिश की हो पस ये लोग दरजे में कहीं बदतर और राहे रास्त से भटक के सबसे ज्यादा दूर जा पहुंचे हैं
61وَإِذَا جَاءُوكُمْ قَالُوا آمَنَّا وَقَد دَّخَلُوا بِالْكُفْرِ وَهُمْ قَدْ خَرَجُوا بِهِ ۚ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا كَانُوا يَكْتُمُونَ
और (मुसलमानों) जब ये लोग तुम्हारे पास आ जाते हैं तो कहते हैं कि हम तो ईमान लाए हैं हालॉकि वह कुफ़्र ही को साथ लेकर आए और फिर निकले भी तो साथ लिए हुए और जो नेफ़ाक़ वह छुपाए हुए थे ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है
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अनुवाद — अल-माइदा 59

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Tuesday, August 18, 2026

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