और अगर ये लोग ख़ुदा और रसूल पर और जो कुछ उनपर नाज़िल किया गया है ईमान रखते हैं तो हरगिज़ (उनको अपना) दोस्त न बनाते मगर उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
أَوْلِيَاءَ (औलिया): मित्र, सहायक, संरक्षक।
فَاسِقُونَ (फ़ासिक़ून): अवज्ञाकारी, आज्ञा से बाहर निकलने वाले, पापी।
व्याख्या:
यदि ये यहूदी वास्तव में अल्लाह पर, उसके नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर, और उन पर उतारी गई चीज़ (क़ुरआन) पर ईमान रखते होते, तो वे कभी भी मुशरिकों (बहुदेववादियों) को अपना मित्र और सहायक नहीं बनाते। क्योंकि ईमान की माँग यह है कि ईमानवाला अल्लाह और उसके नबी की आज्ञा का पालन करे, और अल्लाह ने स्पष्ट रूप से काफ़िरों को मित्र बनाने से मना किया है। लेकिन इनमें से अधिकांश लोग अल्लाह की आज्ञा से बाहर निकल चुके हैं, उनके दिलों में ईमान की मिठास नहीं है, इसीलिए उन्होंने ईमानवालों को छोड़कर काफ़िरों को अपना सहारा बनाया। उनका यह कृत्य इस बात का प्रमाण है कि उनका ईमान अधूरा और कमज़ोर था, या वे ईमान के दावे में झूठे थे।
शिक्षाएँ और लाभ:
सच्चा ईमान व्यक्ति को अल्लाह की आज्ञाओं का पालन करने पर मजबूर करता है, और अल्लाह की अवज्ञा से रोकता है।
काफ़िरों को मित्र बनाना ईमान के विपरीत है, और यह उन लोगों की निशानी है जिनका ईमान कमज़ोर है।
ईमान और अल्लाह की अवज्ञा एक साथ नहीं रह सकते; जो अल्लाह की अवज्ञा करता है, उसका ईमान अधूरा है।
यह आयत हमें सिखाती है कि मुसलमानों को अपने भाईचारे को मजबूत करना चाहिए और ग़ैर-मुस्लिमों से मित्रता में सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि उनके प्रभाव में आकर अपने धर्म से विचलित न हों।
अल्लाह की आज्ञा का पालन करने वाले ही सच्चे ईमानवाले हैं, और जो उसकी अवज्ञा करते हैं, वे फ़ासिक़ (अवज्ञाकारी) कहलाते हैं।
(ऐ रसूल) तुम उन (यहूदियों) में से बहुतेरों को देखोगे कि कुफ्फ़ार से दोस्ती रखते हैं जो सामान पहले से उन लोगों ने ख़ुद अपने वास्ते दुरूस्त किया है किस क़दर बुरा है (जिसका नतीजा ये है) कि (दुनिया में भी) ख़ुदा उन पर गज़बनाक हुआ और (आख़ेरत में भी) हमेशा अज़ाब ही में रहेंगे
(ऐ रसूल) ईमान लाने वालों का दुशमन सबसे बढ़के यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमानदारों का दोस्ती में सबसे बढ़के क़रीब उन लोगों को पाओगे जो अपने को नसारा कहते हैं क्योंकि इन (नसारा) में से यक़ीनी बहुत से आमिल और आबिद हैं और इस सबब से (भी) कि ये लोग हरगिज़ शेख़ी नहीं करते
और तू देखता है कि जब यह लोग (इस कुरान) को सुनते हैं जो हमारे रसूल पर नाज़िल किया गया है तो उनकी ऑंखों से बेसाख्ता (छलक कर) ऑंसू जारी हो जातें है क्योंकि उन्होंने (अम्र) हक़ को पहचान लिया है (और) अर्ज़ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले हम तो ईमान ला चुके तो (रसूल की) तसदीक़ करने वालों के साथ हमें भी लिख रख
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