अल-माइदा · 80/120
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-माइदा
تَرَىٰ كَثِيرًا مِّنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ لَبِئْسَ مَا قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنفُسُهُمْ أَن سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَفِي الْعَذَابِ هُمْ خَالِدُونَ ۝٨٠
Taraa kaseeram minhum yatawallawnal lazeena kafaroo; labi`sa maa qaddamat lahum anfusuhum an sakhital laahu `alaihim wa fil `azaabi hum khaalidoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम उन (यहूदियों) में से बहुतेरों को देखोगे कि कुफ्फ़ार से दोस्ती रखते हैं जो सामान पहले से उन लोगों ने ख़ुद अपने वास्ते दुरूस्त किया है किस क़दर बुरा है (जिसका नतीजा ये है) कि (दुनिया में भी) ख़ुदा उन पर गज़बनाक हुआ और (आख़ेरत में भी) हमेशा अज़ाब ही में रहेंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَرَىٰ — आप देखते हैं
  • يَتَوَلَّوْنَ — वे मित्र बनाते हैं, संबंध जोड़ते हैं
  • لَبِئْسَ — निश्चय ही बहुत बुरा है
  • قَدَّمَتْ — आगे भेजा (अपने आचरण से)
  • سَخِطَ اللَّهُ — अल्लाह का क्रोधित होना
  • خَالِدُونَ — सदैव रहने वाले

व्याख्या:

हे नबी! आप देखते हैं कि इन यहूदियों में से बहुत से लोग काफ़िरों (मक्का के मुशरिकों) से मित्रता करते हैं और उनका साथ देते हैं। वे आपके विरुद्ध और एकेश्वरवादियों के विरुद्ध उन काफ़िरों की सहायता करते हैं, उन्हें आपसे लड़ने के लिए उकसाते हैं। यह उनका कृत्य अत्यंत बुरा है — उन्होंने अपने हाथों अपने लिए वह चीज़ आगे भेजी है जो उनके लिए विनाशकारी सिद्ध हुई। इस मित्रता और शत्रुता के कारण अल्लाह का क्रोध उन पर उतरा, और अंतिम परिणाम यह है कि वे सदैव के लिए अल्लाह की यातना में रहेंगे, जिससे वे कभी बाहर नहीं निकल सकेंगे। यह उनके उस कर्म का परिणाम है जो उन्होंने अपने जीवन में किया — काफ़िरों से मोहब्बत और अल्लाह के नबी से दुश्मनी।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. मित्रता का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है — जिससे हम मित्रता करते हैं, वह हमारे धर्म और आख़िरत पर गहरा प्रभाव डालता है। काफ़िरों से मित्रता करना अल्लाह के क्रोध का कारण बन सकता है।
  2. कर्मों का परिणाम अवश्यंभावी है — मनुष्य जो कुछ भी इस दुनिया में करता है, वह अपने लिए आगे भेजता है। अच्छे कर्म अच्छा परिणाम लाते हैं और बुरे कर्म बुरा परिणाम।
  3. अल्लाह की नाराज़गी से बचना चाहिए — अल्लाह की सन्तुष्टि सबसे बड़ी सफलता है और उसका क्रोध सबसे बड़ी असफलता। मोमिन को हमेशा वही काम करना चाहिए जिससे अल्लाह प्रसन्न हो।
  4. धर्म में स्पष्टता आवश्यक है — मुसलमान को अपने धर्म के मामले में स्पष्ट और दृढ़ होना चाहिए। दुश्मनों से मित्रता और उनकी सहायता करना ईमान के विपरीत है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि — सच्चा मुसलमान वह है जो अल्लाह और उसके रसूल से प्रेम करे, और उन लोगों से दुश्मनी रखे जो अल्लाह और उसके रसूल के दुश्मन हैं। यही ईमान की निशानी है।


📜 आयत 78-82 — सूरा अल-माइदा

78لُعِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن بَنِي إِسْرَائِيلَ عَلَىٰ لِسَانِ دَاوُودَ وَعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ ۚ ذَٰلِكَ بِمَا عَصَوا وَّكَانُوا يَعْتَدُونَ
बनी इसराईल में से जो लोग काफ़िर थे उन पर दाऊद और मरियम के बेटे ईसा की ज़बानी लानत की गयी ये (लानत उन पर पड़ी तो सिर्फ) इस वजह से कि (एक तो) उन लोगों ने नाफ़रमानी की और (फिर हर मामले में) हद से बढ़ जाते थे
79كَانُوا لَا يَتَنَاهَوْنَ عَن مُّنكَرٍ فَعَلُوهُ ۚ لَبِئْسَ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ
और किसी बुरे काम से जिसको उन लोगों ने किया बाज़ न आते थे (बल्कि उस पर बावजूद नसीहत अड़े रहते) जो काम ये लोग करते थे क्या ही बुरा था
80تَرَىٰ كَثِيرًا مِّنْهُمْ يَتَوَلَّوْنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ لَبِئْسَ مَا قَدَّمَتْ لَهُمْ أَنفُسُهُمْ أَن سَخِطَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَفِي الْعَذَابِ هُمْ خَالِدُونَ
(ऐ रसूल) तुम उन (यहूदियों) में से बहुतेरों को देखोगे कि कुफ्फ़ार से दोस्ती रखते हैं जो सामान पहले से उन लोगों ने ख़ुद अपने वास्ते दुरूस्त किया है किस क़दर बुरा है (जिसका नतीजा ये है) कि (दुनिया में भी) ख़ुदा उन पर गज़बनाक हुआ और (आख़ेरत में भी) हमेशा अज़ाब ही में रहेंगे
81وَلَوْ كَانُوا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالنَّبِيِّ وَمَا أُنزِلَ إِلَيْهِ مَا اتَّخَذُوهُمْ أَوْلِيَاءَ وَلَٰكِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
और अगर ये लोग ख़ुदा और रसूल पर और जो कुछ उनपर नाज़िल किया गया है ईमान रखते हैं तो हरगिज़ (उनको अपना) दोस्त न बनाते मगर उनमें के बहुतेरे तो बदचलन हैं
82۞ لَتَجِدَنَّ أَشَدَّ النَّاسِ عَدَاوَةً لِّلَّذِينَ آمَنُوا الْيَهُودَ وَالَّذِينَ أَشْرَكُوا ۖ وَلَتَجِدَنَّ أَقْرَبَهُم مَّوَدَّةً لِّلَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ قَالُوا إِنَّا نَصَارَىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّ مِنْهُمْ قِسِّيسِينَ وَرُهْبَانًا وَأَنَّهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ
(ऐ रसूल) ईमान लाने वालों का दुशमन सबसे बढ़के यहूदियों और मुशरिकों को पाओगे और ईमानदारों का दोस्ती में सबसे बढ़के क़रीब उन लोगों को पाओगे जो अपने को नसारा कहते हैं क्योंकि इन (नसारा) में से यक़ीनी बहुत से आमिल और आबिद हैं और इस सबब से (भी) कि ये लोग हरगिज़ शेख़ी नहीं करते
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीअवतरण स्थान
80आयत

अनुवाद — अल-माइदा 80

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Wednesday, September 30, 2026

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