काफ · 27/45
अनुवाद उच्चारण — सूरा काफ
۞ قَالَ قَرِينُهُ رَبَّنَا مَا أَطْغَيْتُهُ وَلَٰكِن كَانَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ ۝٢٧
Qaala qareenuhoo Rabbanaa maaa atghaituhoo wa laakin kaana fee dalaahim ba`eed
📖 हिंदी अर्थ
(उस वक्त) उसका साथी (शैतान) कहेगा परवरदिगार हमने इसको गुमराह नहीं किया था बल्कि ये तो ख़ुद सख्त गुमराही में मुब्तिला था

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • क़रीन: साथी, यहाँ अर्थ है वह शैतान जो इंसान के साथ हमेशा रहता है।
  • अत्ग़ैतुहु: मैंने उसे भटकाया या सरकश नहीं बनाया।
  • ज़लाल बईद: सत्य से बहुत दूर की गुमराही।

तफ़सीर:

जब अल्लाह तआला काफ़िरों से पूछेगा कि तुमने मेरी इबादत क्यों नहीं की, तो वह अपने बहाने बनाने लगेगा और अपने साथी शैतान को दोषी ठहराएगा। उस समय वह शैतान, जो दुनिया में उसका हमेशा साथी रहा और उसे बुराई की तरफ उकसाता रहा, अल्लाह के सामने उससे बराअत (बरी होने) का इज़हार करते हुए कहेगा: "ऐ हमारे रब! मैंने उसे अपनी तरफ से गुमराह नहीं किया, न ही मैंने उसे ज़बरदस्ती बुराई पर मजबूर किया। मैंने तो उसे सिर्फ बुलाया था, लेकिन उसने खुद अपनी इच्छा से मेरी बात मान ली और सच्चाई को ठुकरा दिया। वह अपनी ही गुमराही में इतना दूर निकल गया कि हक़ की आवाज़ उसके कानों तक पहुँची, फिर भी उसने उसे कबूल नहीं किया।"

यह शैतान का बयान उस काफ़िर के लिए और अधिक रुसवाई का सबब बनेगा, क्योंकि उसका अपना साथी भी उससे किनारा कर लेगा। यह अल्लाह की रहमत और अदल का नमूना है कि वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि इंसान खुद अपने कर्मों से अपना अंजाम तय करता है। शैतान सिर्फ वसवसा (बुरा ख्याल) डालता है, लेकिन इंसान के पास अक्ल और इख्तियार है कि वह उसे माने या न माने। जो लोग अल्लाह की याद से दूर रहते हैं, वही शैतान के निशाने पर आते हैं और धीरे-धीरे सच्चाई से इतना दूर हो जाते हैं कि फिर उन्हें हक़ नज़र नहीं आता।

यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपनी गलतियों का दोष किसी और पर न डालें, बल्कि अपने अमल की जिम्मेदारी खुद उठाएँ। अल्लाह ने हर इंसान को समझने की ताकत दी है और सही रास्ता भी दिखाया है। जो लोग कुरआन और सुन्नत को पकड़ते हैं, वे शैतान के वसवसों से महफूज़ रहते हैं। याद रखिए, शैतान का असर उसी पर होता है जो खुद उसकी तरफ झुकता है। अल्लाह से दुआ है कि वह हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे और शैतान के शर से हमारी हिफाज़त फरमाए। आमीन।



📜 आयत 25-29 — सूरा काफ

25مَّنَّاعٍ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ مُّرِيبٍ
जो (वाजिब हुकूक से) माल में बुख्ल करने वाला हद से बढ़ने वाला (दीन में) शक़ करने वाला था
26الَّذِي جَعَلَ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَأَلْقِيَاهُ فِي الْعَذَابِ الشَّدِيدِ
जिसने ख़ुदा के साथ दूसरे माबूद बना रखे थे तो अब तुम दोनों इसको सख्त अज़ाब में डाल ही दो
27۞ قَالَ قَرِينُهُ رَبَّنَا مَا أَطْغَيْتُهُ وَلَٰكِن كَانَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ
(उस वक्त) उसका साथी (शैतान) कहेगा परवरदिगार हमने इसको गुमराह नहीं किया था बल्कि ये तो ख़ुद सख्त गुमराही में मुब्तिला था
28قَالَ لَا تَخْتَصِمُوا لَدَيَّ وَقَدْ قَدَّمْتُ إِلَيْكُم بِالْوَعِيدِ
इस पर ख़ुदा फ़रमाएगा हमारे सामने झगड़े न करो मैं तो तुम लोगों को पहले ही (अज़ाब से) डरा चुका था
29مَا يُبَدَّلُ الْقَوْلُ لَدَيَّ وَمَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
मेरे यहाँ बात बदला नहीं करती और न मैं बन्दों पर (ज़र्रा बराबर) ज़ुल्म करने वाला हूँ
काफकुरान सूची
45आयत
मक्कीअवतरण स्थान
27आयत

अनुवाद — काफ 27

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Friday, October 2, 2026

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