अन-नज्म · 19/62
अनुवाद उच्चारण — अन-नज्म
أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ ۝١٩
Afara`aytumul laata wal `uzzaa
📖 हिंदी अर्थ
तो भला तुम लोगों ने लात व उज्ज़ा और तीसरे पिछले मनात को देखा
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَفَرَأَيْتُمُ – क्या तुमने देखा / क्या तुमने ग़ौर किया?
  • اللَّات – यह एक मूर्ति थी जिसे क़ुरैश और सक़ीफ़ क़बीले के लोग पूजते थे। यह ताइफ़ में स्थित थी।
  • الْعُزَّى – यह एक और मूर्ति थी जो ग़तफ़ान क़बीले के लोगों की पूज्य थी। यह एक पेड़ (सुमुरा) था जिसकी वे पूजा करते थे।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में मुशरिकीन-ए-क़ुरैश को संबोधित करते हुए उनसे एक सवाल पूछ रहे हैं, जो उनकी बुद्धि को झकझोर देने वाला है। अल्लाह फ़रमाता है: “क्या तुमने कभी अपनी इन मूर्तियों — लात और उज़्ज़ा — को ध्यान से देखा?” यानी ज़रा सोचो, क्या इन मूर्तियों में कोई शक्ति है? क्या ये किसी को नुक़सान पहुँचा सकती हैं या किसी को फ़ायदा दे सकती हैं? क्या ये सुनती हैं, देखती हैं, या किसी काम की हैं?

यह सवाल उन्हें उनके अंधे अंधविश्वास से बाहर निकालने के लिए है। अल्लाह उन्हें बताना चाहता है कि ये मूर्तियाँ तो बस पत्थर और लकड़ी के टुकड़े हैं — न इनमें जान है, न सुनने की शक्ति, न देखने की क्षमता, न किसी को नुक़सान पहुँचाने की ताक़त। फिर तुम इन्हें अल्लाह का शरीक कैसे बनाते हो? ये तो ख़ुद तुम्हारी बनाई हुई चीज़ें हैं, तुम्हारे हाथों की बनाई मूर्तियाँ हैं, फिर इन्हें पूजना कैसी बुद्धिमानी है?

यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब मुशरिकीन ने यह कहा था कि ये मूर्तियाँ अल्लाह की बेटियाँ हैं। अल्लाह ने उनके इस झूठे और बेतुके दावे का खंडन किया और उन्हें सोचने पर मजबूर किया। अल्लाह उनसे कह रहा है: “ज़रा इन मूर्तियों को देखो जिन्हें तुम पूजते हो — क्या ये तुम्हारी कोई भलाई कर सकती हैं? क्या ये तुम्हें रिज़्क़ दे सकती हैं? क्या ये तुम्हारी मदद कर सकती हैं? बिल्कुल नहीं। फिर तुम इन्हें अल्लाह के साथ क्यों जोड़ रहे हो?”

यह सवाल सिर्फ उस समय के मुशरिकीन के लिए नहीं है, बल्कि हर उस इंसान के लिए है जो अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत करता है — चाहे वह मूर्ति हो, पत्थर हो, किसी इंसान की क़ब्र हो, या कोई और चीज़। अल्लाह हर इंसान से पूछता है: “क्या तुमने उन चीज़ों को देखा जिन्हें तुम पूजते हो? क्या उनमें कोई शक्ति है? क्या वे तुम्हारी सुन सकती हैं?” जवाब हमेशा यही होगा कि नहीं। तो फिर इबादत सिर्फ उसी की होनी चाहिए जो सब कुछ सुनता है, सब कुछ देखता है, और हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है — वही अल्लाह है।

यह आयत हमें तौहीद (एकेश्वरवाद) की ओर बुलाती है और शिर्क (बहुदेववाद) की बेहूदगी को उजागर करती है। यह हमें सिखाती है कि इंसान को अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करना चाहिए और सोचना चाहिए कि क्या सच में ये चीज़ें पूजा के लायक हैं? क्या इनमें कोई ख़ूबी है? बिल्कुल नहीं। सिर्फ अल्लाह ही इबादत के लायक है, क्योंकि वही पैदा करने वाला, पालने वाला, रिज़्क़ देने वाला, और हर चीज़ पर क़ुदरत रखने वाला है।

🎧 सुनें

📜 आयत 17-21 — अन-नज्म

17مَا زَاغَ الْبَصَرُ وَمَا طَغَىٰ
(उस वक्त भी) उनकी ऑंख न तो और तरफ़ माएल हुई और न हद से आगे बढ़ी
18لَقَدْ رَأَىٰ مِنْ آيَاتِ رَبِّهِ الْكُبْرَىٰ
और उन्होने यक़ीनन अपने परवरदिगार (की क़ुदरत) की बड़ी बड़ी निशानियाँ देखीं
19أَفَرَأَيْتُمُ اللَّاتَ وَالْعُزَّىٰ
तो भला तुम लोगों ने लात व उज्ज़ा और तीसरे पिछले मनात को देखा
20وَمَنَاةَ الثَّالِثَةَ الْأُخْرَىٰ
(भला ये ख़ुदा हो सकते हैं)
21أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الْأُنثَىٰ
क्या तुम्हारे तो बेटे हैं और उसके लिए बेटियाँ
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अनुवाद — अन-नज्म 19

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Tuesday, August 18, 2026

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