अल-हश्र · 6/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ۝٦
Wa maaa afaaa`al laahu `alaaa Rasoolihee minhum famaaa awjaftum `alaihi min khailiinw wa laa rikaabinw wa laakinnal laaha yusallitu Rusulahoo `alaa many yashaaa`; wallaahu `alaa kulli shai`in Qadeer
📖 हिंदी अर्थ
(तो) जो माल ख़ुदा ने अपने रसूल को उन लोगों से बे लड़े दिलवा दिया उसमें तुम्हार हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फरमाता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अफ़ाअ (أَفَاءَ): लौटाना, देना, या माल को फ़ई (बिना युद्ध के मिलने वाला धन) के रूप में प्रदान करना।
  • औजफ़्तुम (أَوْجَفْتُمْ): तेज़ी से दौड़ाना, घोड़े या ऊँट को तेज़ चलाना।
  • ख़ैल (خَيْل): घोड़े।
  • रिकाब (رِكَاب): ऊँट, विशेष रूप से सवारी के ऊँट।
  • युसल्लितु (يُسَلِّطُ): अधिकार देना, शक्ति प्रदान करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत बनी नज़ीर (मदीना के यहूदी क़बीले) के माल के बारे में है, जो बिना किसी युद्ध के अल्लाह के रसूल (ﷺ) को मिला। जब यहूदियों ने धोखा किया और संधि तोड़ी, तो अल्लाह ने उनके दिलों में भय डाल दिया और उन्होंने अपने घर-बार और माल छोड़कर जाना स्वीकार किया। यह माल (फ़ई) मुसलमानों को बिना किसी कठिनाई के मिला — न घोड़े दौड़ाने पड़े, न ऊँट हाँकने पड़े, न कोई जंग लड़नी पड़ी।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और जो माल अल्लाह ने अपने रसूल को उन (बनी नज़ीर) से दिया (फ़ई के रूप में), तो तुमने उसके लिए न घोड़े दौड़ाए और न ऊँट, बल्कि अल्लाह अपने रसूलों को जिस पर चाहता है अधिकार दे देता है। और अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है।"

इस आयत में अल्लाह तआला ने सिखाया कि विजय और धन केवल ताकत या साधनों से नहीं मिलते, बल्कि अल्लाह की इच्छा और शक्ति से मिलते हैं। जब अल्लाह चाहता है, वह अपने नबी को बिना किसी लड़ाई के दुश्मनों पर विजय दे देता है। यह अल्लाह की क़ुदरत की निशानी है कि उसने अपने रसूल (ﷺ) को बनी नज़ीर के माल पर इस तरह क़ाबू दिया कि मुसलमानों को कोई मशक़्कत नहीं उठानी पड़ी।

यह माल विशेष रूप से रसूल (ﷺ) के लिए था, क्योंकि यह बिना युद्ध के मिला था। रसूल (ﷺ) ने इसे अपनी मर्ज़ी के अनुसार ख़र्च किया — मुहाजिरों (प्रवासियों) की ज़रूरतों को पूरा किया, क्योंकि वे अपना सब कुछ छोड़कर आए थे।

इस आयत से हमें कई सबक मिलते हैं:

  1. अल्लाह पर भरोसा: जीत और कामयाबी केवल साधनों से नहीं, बल्कि अल्लाह की मदद से मिलती है। जब अल्लाह किसी काम को करना चाहता है, तो वह आसान कर देता है।
  2. रसूल (ﷺ) की विशेष स्थिति: यह आयत रसूल (ﷺ) के सम्मान और अल्लाह की ओर से उनकी विशेष मदद को दर्शाती है। अल्लाह ने उन्हें ऐसी फ़तह दी जिसमें कोई खून नहीं बहा।
  3. अल्लाह की क़ुदरत: अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है — वह जिसे चाहे इज़्ज़त दे, जिसे चाहे ज़िल्लत। वह बिना किसी साधन के भी अपने बंदों की मदद कर सकता है।
  4. मुसलमानों के लिए ख़ुशख़बरी: यह आयत मुसलमानों को यह विश्वास दिलाती है कि जब वे अल्लाह के रास्ते में हों, तो अल्लाह उन्हें ऐसे तरीकों से मदद देता है जिनकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होती।

आज भी जब हम इस आयत को पढ़ते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि हमारी कामयाबी अल्लाह के हाथ में है। अगर हम अल्लाह के दीन की मदद करेंगे, तो अल्लाह हमारी मदद करेगा — चाहे साधन कम हों, चाहे ताकत कम हो। अल्लाह की शक्ति असीमित है, और वह हर मुश्किल को आसान कर सकता है। हमें अपने कामों में अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और यह यकीन रखना चाहिए कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है।

🎧 सुनें

📜 आयत 4-8 — अल-हश्र

4ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَاقُّوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۖ وَمَن يُشَاقِّ اللَّهَ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
ये इसलिए कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की और जिसने ख़ुदा की मुख़ालेफ़त की तो (याद रहे कि) ख़ुदा बड़ा सख्त अज़ाब देने वाला है
5مَا قَطَعْتُم مِّن لِّينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَائِمَةً عَلَىٰ أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِقِينَ
(मोमिनों) खजूर का दरख्त जो तुमने काट डाला या जूँ का तँ से उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो ख़ुदा ही के हुक्म से और मतलब ये था कि वह नाफरमानों को रूसवा करे
6وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(तो) जो माल ख़ुदा ने अपने रसूल को उन लोगों से बे लड़े दिलवा दिया उसमें तुम्हार हक़ नहीं क्योंकि तुमने उसके लिए कुछ दौड़ धूप तो की ही नहीं, न घोड़ों से न ऊँटों से, मगर ख़ुदा अपने पैग़म्बरों को जिस पर चाहता है ग़लबा अता फरमाता है और ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
7مَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنكُمْ ۚ وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
तो जो माल ख़ुदा ने अपने रसूल को देहात वालों से बे लड़े दिलवाया है वह ख़ास ख़ुदा और उसके रसूल और (रसूल के) क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों और परदेसियों का है ताकि जो लोग तुममें से दौलतमन्द हैं हिर फिर कर दौलत उन्हीं में न रहे, हाँ जो तुमको रसूल दें दें वह ले लिया करो और जिससे मना करें उससे बाज़ रहो और ख़ुदा से डरते रहो बेशक ख़ुदा सख्त अज़ाब देने वाला है
8لِلْفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا وَيَنصُرُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ
(इस माल में) उन मुफलिस मुहाजिरों का हिस्सा भी है जो अपने घरों से और मालों से निकाले (और अलग किए) गए (और) ख़ुदा के फ़ज़ल व ख़ुशनूदी के तलबगार हैं और ख़ुदा की और उसके रसूल की मदद करते हैं यही लोग सच्चे ईमानदार हैं और (उनका भी हिस्सा है)
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अनुवाद — अल-हश्र 6

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Tuesday, August 18, 2026

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