أَقِيمُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को उसके नियमों, शर्तों और अदब के साथ पूर्ण रूप से स्थापित करना।
وَاتَّقُوهُ: उस (अल्लाह) से डरना, यानी उसके आदेशों का पालन करना और उसकी मनाही से बचना।
تُحْشَرُونَ: तुम सब इकट्ठे किए जाओगे (क़ियामत के दिन)।
तफ़सीर (व्याख्या):
इस आयत में अल्लाह तआला ने अपने पैग़म्बरों (अलैहिमुस्सलाम) के ज़रिए और उनके अनुयायियों को यह आदेश दिया है कि वे नमाज़ को पूरी तरह से क़ायम करें—यानी उसे समय पर, उसके सभी रुक्न (अर्कान) और शर्तों के साथ, खुशू (विनम्रता) और खुज़ू (ध्यान) के साथ अदा करें। साथ ही, उन्हें तक़वा (अल्लाह का डर) अपनाने का हुक्म दिया गया है, जिसका मतलब है कि अल्लाह के हर आदेश का पालन किया जाए और हर उस चीज़ से बचा जाए जिससे उसने रोका है। यही सच्चा तक़वा है।
फिर अल्लाह तआला ने यह बताया कि वही अकेला है जिसकी ओर सभी प्राणियों को क़ियामत के दिन इकट्ठा किया जाएगा। उस दिन हर व्यक्ति को उसके अच्छे और बुरे कर्मों का पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा। यह इकट्ठा होना अल्लाह की क़ुदरत (शक्ति) का प्रमाण है और यह भी प्रमाण है कि अंतिम फैसला सिर्फ उसी का है। इसलिए नमाज़ और तक़वा ही वे साधन हैं जो इंसान को उस दिन की मुश्किलों से बचा सकते हैं।
फ़ायदे (लाभ):
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि नमाज़ और तक़वा (अल्लाह का डर) दो ऐसी चीज़ें हैं जो एक मुसलमान की ज़िंदगी को सीधा रखती हैं। नमाज़ इंसान को बुराई से रोकती है और तक़वा उसे अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) के करीब ले जाता है।
यह आयत हमें याद दिलाती है कि यह दुनिया हमेशा नहीं रहेगी; एक दिन हम सबको अल्लाह के सामने हाज़िर होना है। यह विश्वास इंसान को ज़िम्मेदार बनाता है और उसे अच्छे कामों की ओर प्रेरित करता है।
इसमें इस बात की तसल्ली (सांत्वना) है कि अल्लाह न्याय करने वाला है; जो भी अच्छा काम करेगा उसे उसका बदला मिलेगा, और जो बुरा करेगा उसे उसकी सज़ा मिलेगी। यह इंसान को निराशा से बचाता है और उसे अच्छाई पर स्थिर रहने की ताक़त देता है।
नमाज़ और तक़वा ही वे ज़रिए हैं जिनसे इंसान अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रहमत (दया) को अपनी ओर आकर्षित करता है, और यही दुनिया और आख़िरत की कामयाबी की कुंजी है।
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि क्या हम लोग ख़ुदा को छोड़कर उन (माबूदों) से मुनाज़ात (दुआ) करे जो न तो हमें नफ़ा पहुंचा सकते हैं न हमारा कुछ बिगाड़ ही सकते हैं- और जब ख़ुदा हमारी हिदायत कर चुका) उसके बाद उल्टे पावँ कुफ्र की तरफ उस शख़्श की तरह फिर जाएं जिसे शैतानों ने जंगल में भटका दिया हो और वह हैरान (परेशान) हो (कि कहा जाए क्या करें) और उसके कुछ रफीक़ हो कि उसे राहे रास्त (सीधे रास्ते) की तरफ पुकारते रह जाएं कि (उधर) हमारे पास आओ और वह एक न सुने (ऐ रसूल) तुम कह दो कि हिदायत तो बस ख़ुदा की हिदायत है और हमें तो हुक्म ही दिया गया है कि हम सारे जहॉन के परवरदिगार ख़ुदा के फरमाबरदार हैं
(ऐ रसूल) उस वक्त क़ा याद करो) जब इबराहीम ने अपने (मुंह बोले) बाप आज़र से कहा क्या तुम बुतों को ख़ुदा मानते हो-मै तो तुमको और तुम्हारी क़ौम को खुली गुमराही में देखता हूँ
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।