अल-अनआम · 79/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ ۝٧٩
Innnee wajjahtu wajhiya lillazee fataras samaawaati wal arda haneefanw wa maaa ana minal mushrikeen
📖 हिंदी अर्थ
(ये हरगिज़ नहीं हो सकते) मैने तो बातिल से कतराकर उसकी तरफ से मुँह कर लिया है जिसने बहुतेरे आसमान और ज़मीन पैदा किए और मैं मुशरेकीन से नहीं हूँ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • वज्जहतु: मैंने मुख किया, अपनी नियत और इबादत को एकाग्र किया।
  • फ़तरा: पैदा किया, बनाया (बिना किसी पूर्व नमूने के)।
  • हनीफ़न: एकेश्वरवाद की ओर झुका हुआ, शिर्क से बिल्कुल अलग, सीधे मार्ग पर चलने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह महान वाणी है हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की, जो उन्होंने अपनी क़ौम के सामने उस समय कही जब उन्होंने सितारों, चाँद और सूरज की पूजा को निरर्थक और मिथ्या सिद्ध कर दिया था। वे कहते हैं: "मैंने अपना मुख, अपनी नियत, अपनी इबादत और अपना पूरा वजूद उस हस्ती की ओर कर दिया है जिसने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है—बिना किसी सानी और बिना किसी मिसाल के। मैं शिर्क से हटकर पूर्ण एकेश्वरवाद (तौहीद) की ओर झुका हुआ हूँ, और मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अल्लाह के साथ किसी और को साझीदार बनाते हैं।"

यह घोषणा केवल एक ऐतिहासिक बयान नहीं है, बल्कि हर उस इंसान के लिए एक आदर्श है जो सच्चाई की तलाश में है। इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने जीवन के हर पड़ाव पर यही सबक सिखाया कि जो चीज़ें बदलती हैं, डूबती हैं, या ग़ायब हो जाती हैं, वे पूजा के योग्य नहीं हो सकतीं। सच्चा ख़ुदा वही है जो हर चीज़ का ख़ालिक़ (रचयिता) है, जो कभी नहीं बदलता और जिसकी कुदरत से यह पूरा निज़ाम चल रहा है।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है: हमारा रुख़ भी उसी अल्लाह की ओर होना चाहिए जिसने हमें पैदा किया, हमें रिज़्क़ दिया और हमें इस धरती पर अपना ख़लीफ़ा बनाया। जब हम अपने दिल को शिर्क की गंदगी से पाक करके सिर्फ़ अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित कर देते हैं, तो हमें एक अजीब सुकून और इत्मिनान मिलता है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई तक पहुँचाता है।

याद रखिए, यह घोषणा सिर्फ़ इब्राहीम अलैहिस्सलाम की नहीं थी, बल्कि हर मुसलमान की पहचान है। हमें भी दिल से कहना चाहिए: "मैंने अपना मुख उस ज़ात की ओर किया जिसने आसमान और ज़मीन पैदा किए, मैं शिर्क से अलग होकर तौहीद पर क़ायम हूँ, और मैं मुशरिकों में से नहीं हूँ।" यही वह कलिमा है जो हमें जहान के झूठे ख़ुदाओं से आज़ाद करती है और हमें सच्चे मालिक से जोड़ती है। जिसने इस सच्चाई को अपना लिया, उसने कामयाबी हासिल कर ली, और जो इससे मुँह मोड़ेगा, वह घाटे में रहेगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 77-81 — अल-अनआम

77فَلَمَّا رَأَى الْقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هَٰذَا رَبِّي ۖ فَلَمَّا أَفَلَ قَالَ لَئِن لَّمْ يَهْدِنِي رَبِّي لَأَكُونَنَّ مِنَ الْقَوْمِ الضَّالِّينَ
फिर जब चाँद को जगमगाता हुआ देखा तो बोल उठे (क्या) यही मेरा ख़ुदा है फिर जब वह भी ग़ुरुब हो गया तो कहने लगे कि अगर (कहीं) मेरा (असली) परवरदिगार मेरी हिदायत न करता तो मैं ज़रुर गुमराह लोगों में हो जाता
78فَلَمَّا رَأَى الشَّمْسَ بَازِغَةً قَالَ هَٰذَا رَبِّي هَٰذَا أَكْبَرُ ۖ فَلَمَّا أَفَلَتْ قَالَ يَا قَوْمِ إِنِّي بَرِيءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ
फिर जब आफताब को दमकता हुआ देखा तो कहने लगे (क्या) यही मेरा ख़ुदा है ये तो सबसे बड़ा (भी) है फिर जब ये भी ग़ुरुब हो गया तो कहने लगे ऐ मेरी क़ौम जिन जिन चीज़ों को तुम लोग (ख़ुदा का) शरीक बनाते हो उनसे मैं बेज़ार हूँ
79إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ये हरगिज़ नहीं हो सकते) मैने तो बातिल से कतराकर उसकी तरफ से मुँह कर लिया है जिसने बहुतेरे आसमान और ज़मीन पैदा किए और मैं मुशरेकीन से नहीं हूँ
80وَحَاجَّهُ قَوْمُهُ ۚ قَالَ أَتُحَاجُّونِّي فِي اللَّهِ وَقَدْ هَدَانِ ۚ وَلَا أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِ إِلَّا أَن يَشَاءَ رَبِّي شَيْئًا ۗ وَسِعَ رَبِّي كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۗ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ
और उनकी क़ौम के लोग उनसे हुज्जत करने लगे तो इबराहीम ने कहा था क्या तुम मुझसे ख़ुदा के बारे में हुज्जत करते हो हालॉकि वह यक़ीनी मेरी हिदायत कर चुका और तुम मे जिन बुतों को उसका शरीक मानते हो मै उनसे डरता (वरता) नहीं (वह मेरा कुछ नहीं कर सकते) मगर हॉ मेरा ख़ुदा खुद (करना) चाहे तो अलबत्ता कर सकता है मेरा परवरदिगार तो बाएतबार इल्म के सब पर हावी है तो क्या उस पर भी तुम नसीहत नहीं मानते
81وَكَيْفَ أَخَافُ مَا أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِاللَّهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا ۚ فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
और जिन्हें तुम ख़ुदा का शरीक बताते हो मै उन से क्यों डरुँ जब तुम इस बात से नहीं डरते कि तुमने ख़ुदा का शरीक ऐसी चीज़ों को बनाया है जिनकी ख़ुदा ने कोई सनद तुम पर नहीं नाज़िल की फिर अगर तुम जानते हो तो (भला बताओ तो सही कि) हम दोनों फरीक़ (गिरोह) में अमन क़ायम रखने का ज्यादा हक़दार कौन है
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अनुवाद — अल-अनआम 79

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Tuesday, August 18, 2026

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