अल-हाक़्का · 35/52
अनुवाद उच्चारण — अल-हाक़्का
فَلَيْسَ لَهُ الْيَوْمَ هَاهُنَا حَمِيمٌ ۝٣٥
Falaysa lahul yawma haahunaa hameem
📖 हिंदी अर्थ
और न पीप के सिवा (उसके लिए) कुछ खाना है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • हमीम (حميم): निकट का रिश्तेदार, सच्चा मित्र, या वह व्यक्ति जो दिल से किसी का हितैषी हो और मुसीबत के समय काम आए।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस व्यक्ति की दयनीय स्थिति का वर्णन कर रही है जिसने दुनिया में अल्लाह का हुक्म नहीं माना, उसके रसूलों को झुठलाया और अपनी ज़िंदगी में केवल अपनी इच्छाओं और लालसाओं की पूजा की। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि आज क़ियामत के दिन, इस काफ़िर और मुजरिम के लिए यहाँ कोई सच्चा दोस्त, कोई निकट का रिश्तेदार या कोई मददगार नहीं होगा जो उसके काम आ सके, उसे अज़ाब से बचा सके, या उसकी सिफ़ारिश कर सके। दुनिया में जिन रिश्तेदारों और दोस्तों पर उसे नाज़ था, जिनके लिए उसने अल्लाह के हुक्मों की परवाह नहीं की, वे सब आज उससे बेज़ार हैं और कोई भी उसके पास खड़ा होकर उसकी मदद नहीं कर सकता।

यह वह दिन होगा जब हर इंसान केवल अपने आमाल (कर्मों) के साथ अकेला होगा। वहाँ न तो कोई रिश्तेदारी काम आएगी और न ही दोस्ती, बल्कि केवल ईमान और नेक अमल ही काम आएंगे। यह उन लोगों के लिए बहुत बड़ी नसीहत है जो दुनिया के रिश्तों और मोहब्बतों पर भरोसा करके आख़िरत को भूल जाते हैं।

दावती पहलू (उपदेशात्मक संदेश):

यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी ज़िंदगी में किन चीज़ों को सबसे ज़्यादा अहमियत दे रहे हैं। क्या हम उन रिश्तों और दोस्तों पर भरोसा कर रहे हैं जो एक दिन हमें अकेला छोड़ देंगे, या हम उस अल्लाह से जुड़ रहे हैं जो हर हाल में हमारा साथी है? याद रखिए, अगर हम आज अल्लाह के दोस्त बन जाएँ, उसके हुक्मों पर चलें और उसके रसूल ﷺ की सुन्नत को अपनाएँ, तो क़ियामत के दिन हमें कोई डर नहीं होगा। अल्लाह के नबी ﷺ ने फ़रमाया कि सात प्रकार के लोगों को अल्लाह अपने साये में रखेगा जिस दिन उसके साये के अलावा कोई साया नहीं होगा, और उनमें से एक वह व्यक्ति भी है जो सिर्फ़ अल्लाह के लिए दोस्ती करता है। तो आइए, हम अपने रिश्तों को अल्लाह की रज़ा के लिए बनाएँ, ताकि वे रिश्ते आख़िरत में भी हमारे काम आएँ, और हम उस दिन की रुसवाई और अज़ाब से बच जाएँ। अल्लाह हमें सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 33-37 — अल-हाक़्का

33إِنَّهُ كَانَ لَا يُؤْمِنُ بِاللَّهِ الْعَظِيمِ
(क्यों कि) ये न तो बुज़ुर्ग ख़ुदा ही पर ईमान लाता था और न मोहताज के खिलाने पर आमादा (लोगों को) करता था
34وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ الْمِسْكِينِ
तो आज न उसका कोई ग़मख्वार है
35فَلَيْسَ لَهُ الْيَوْمَ هَاهُنَا حَمِيمٌ
और न पीप के सिवा (उसके लिए) कुछ खाना है
36وَلَا طَعَامٌ إِلَّا مِنْ غِسْلِينٍ
जिसको गुनेहगारों के सिवा कोई नहीं खाएगा
37لَّا يَأْكُلُهُ إِلَّا الْخَاطِئُونَ
तो मुझे उन चीज़ों की क़सम है
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अनुवाद — अल-हाक़्का 35

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Tuesday, August 18, 2026

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