अल-आराफ · 164/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ ۝١٦٤
Wa iz qaalat ummatum minhum lima ta`izoona qaw manil laahu muhlikuhum aw mu`azzibuhum `azaaban shadeedan qaaloo ma`ziratan ilaa Rabbikum wa la`allahum tattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनमें से एक जमाअत ने (उन लोगों में से जो शुम्बे के दिन शिकार को मना करते थे) कहा कि जिन्हें ख़ुदा हलाक़ करना या सख्त अज़ाब में मुब्तिला करना चाहता है उन्हें (बेफायदे) क्यो नसीहत करते हो तो वह कहने लगे कि फक़त तुम्हारे परवरदिगार में (अपने को) इल्ज़ाम से बचाने के लिए यायद इसलिए कि ये लोग परहेज़गारी एख्तियार करें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُمَّةٌ: एक समुदाय या गिरोह।
  • تَعِظُونَ: तुम नसीहत देते हो।
  • مُهْلِكُهُمْ: उन्हें विनष्ट करने वाला।
  • مُعَذِّبُهُمْ: उन्हें यातना देने वाला।
  • مَعْذِرَةً: बहाना, सफ़ाई पेश करने के लिए।
  • يَتَّقُونَ: वे डरें (अल्लाह से) और बचें।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! उस समय को याद करो जब उनमें से एक अच्छा गिरोह (जो नेकी का हुक्म देता था) उन लोगों से (जो नसीहत करने वालों से) कह रहा था: "तुम उन लोगों को क्यों नसीहत देते हो जिन्हें अल्लाह ने दुनिया में हलाक करने का फ़ैसला कर लिया है या आख़िरत में उन्हें सख्त अज़ाब देने वाला है? तुम्हारी नसीहत का उन पर कोई असर नहीं होगा।" तो नसीहत करने वालों ने जवाब दिया: "हम यह नसीहत इसलिए करते हैं ताकि अपने रब के सामने हमारा कोई बहाना न रहे (यानी हमने अपना फ़र्ज़ अदा कर दिया), और इस उम्मीद में कि शायद वे (अल्लाह से) डरें और अपनी गलती से बाज़ आ जाएँ।" यानी हमारा मक़सद सिर्फ अल्लाह का हुक्म पूरा करना और उनकी भलाई की दुआ करना है, चाहे वे सुनें या न सुनें।

फ़ायदे (सबक):

  1. अच्छाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना हर हाल में वाजिब है, चाहे लोग सुनें या न सुनें। हमारा फ़र्ज़ सिर्फ पहुँचाना है, नतीजा अल्लाह के हाथ में है।
  2. जब लोग गुनाह पर अड़ जाएँ और उनके हलाक होने का अंदेशा हो, तब भी नेक लोगों को चुप नहीं बैठना चाहिए, बल्कि नसीहत जारी रखनी चाहिए।
  3. नसीहत का एक मक़सद यह भी है कि अल्लाह के सामने हमारा बहाना पुख़्ता हो जाए — यानी हमने अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी, ताकि हम पर कोई मोरचा न लगे।
  4. इस आयत से पता चलता है कि उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए — शायद एक दिन वे गुनाहगार भी तौबा कर लें और अल्लाह से डरने लगें। अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
  5. यह सबक सिखाती है कि समाज में बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाना अल्लाह की इबादत है, और यही अच्छे इंसान की पहचान है।
🎧 सुनें

📜 आयत 162-166 — अल-आराफ

162فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ
तो ज़ालिमों ने जो बात उनसे कही गई थी उसे बदल कर कुछ और कहना शुरू किया तो हमने उनकी शरारतों की बदौलत उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया
163وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ ۙ لَا تَأْتِيهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
और (ऐ रसूल) उनसे ज़रा उस गाँव का हाल तो पूछो जो दरिया के किनारे वाक़ऐ था जब ये लोग उनके बुज़ुर्ग शुम्बे (सनीचर) के दिन ज्यादती करने लगे कि जब उनका शुम्बे (वाला इबादत का) दिन होता तब तो मछलियाँ सिमट कर उनके सामने पानी पर उभर के आ जाती और जब उनका शुम्बा (वाला इबादत का) दिन न होता तो मछलियॉ उनके पास ही न फटकतीं और चॅूकि ये लोग बदचलन थे उस दरजे से हम भी उनकी यूं ही आज़माइश किया करते थे
164وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
और जब उनमें से एक जमाअत ने (उन लोगों में से जो शुम्बे के दिन शिकार को मना करते थे) कहा कि जिन्हें ख़ुदा हलाक़ करना या सख्त अज़ाब में मुब्तिला करना चाहता है उन्हें (बेफायदे) क्यो नसीहत करते हो तो वह कहने लगे कि फक़त तुम्हारे परवरदिगार में (अपने को) इल्ज़ाम से बचाने के लिए यायद इसलिए कि ये लोग परहेज़गारी एख्तियार करें
165فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ أَنجَيْنَا الَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّوءِ وَأَخَذْنَا الَّذِينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَئِيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
फिर जब वह लोग जिस चीज़ की उन्हें नसीहत की गई थी उसे भूल गए तो हमने उनको तो तजावीज़ (नजात) दे दी जो बुरे काम से लोगों को रोकते थे और जो लोग ज़ालिम थे उनको उनकी बद चलनी की वजह से बड़े अज़ाब में गिरफ्तार किया
166فَلَمَّا عَتَوْا عَن مَّا نُهُوا عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِئِينَ
फिर जिस बात की उन्हें मुमानिअत (रोक) की गई थी जब उन लोगों ने उसमें सरकशी की तो हमने हुक्म दिया कि तुम ज़लील और ख़्वार (धुत्कारे) हुए बन्दर बन जाओ (और वह बन गए)
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अनुवाद — अल-आराफ 164

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Tuesday, August 18, 2026

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