अल-आराफ · 165/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ أَنجَيْنَا الَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّوءِ وَأَخَذْنَا الَّذِينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَئِيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ ۝١٦٥
Falammaa nasoo maa zukkiroo bihee anjainal lazeena yanhawna `anis sooo`i wa akhaznal lazeena zalamoo bi`azaabim ba`eeim bimaa kaanooyafsuqoon
📖 हिंदी अर्थ
फिर जब वह लोग जिस चीज़ की उन्हें नसीहत की गई थी उसे भूल गए तो हमने उनको तो तजावीज़ (नजात) दे दी जो बुरे काम से लोगों को रोकते थे और जो लोग ज़ालिम थे उनको उनकी बद चलनी की वजह से बड़े अज़ाब में गिरफ्तार किया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • नَسُوا: यहाँ इसका अर्थ 'त्याग दिया' या 'अनदेखा कर दिया' है, न कि भूल जाना।
  • السُّوء: बुराई, अवज्ञा, वह काम जो अल्लाह की नाराज़गी का कारण हो।
  • بَئِيس: अत्यंत कठोर, गंभीर और दर्दनाक (आज़ाब)।
  • يَفْسُقُونَ: अल्लाह की आज्ञा से बाहर निकलना, अवज्ञा करना और पाप में डटे रहना।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब उस बस्ती के ज़ालिम लोगों ने उस नसीहत को पूरी तरह अनदेखा कर दिया जो उन्हें दी गई थी — यानी शनिवार के दिन मछली पकड़ने से रोका गया था, लेकिन वे अपनी हठधर्मी और उल्लंघन पर अड़े रहे — और उन्होंने उन नसीहत करने वालों की बात न मानी जो उन्हें बुराई से रोक रहे थे, तो अल्लाह ने उन लोगों को नजात (मुक्ति) दी जो बुराई से रोकते थे और अल्लाह की अवज्ञा से बचाते थे। उन्हें उस आज़ाब से बचा लिया गया जो दूसरों पर आया। और जिन लोगों ने ज़ुल्म किया — यानी हद से आगे बढ़कर अल्लाह की मनाही का उल्लंघन किया — उन्हें अल्लाह ने अत्यंत कठोर और दर्दनाक आज़ाब में पकड़ लिया। यह सज़ा उन्हें इसलिए मिली क्योंकि वे लगातार अल्लाह की आज्ञा से बाहर निकल रहे थे, पाप पर अड़े रहे और अपनी शरारत और सरकशी से बाज़ नहीं आए। यह आज़ाब उनके लिए उनके ही कर्मों का परिणाम था — उनके फ़िस्क़ (अवज्ञा) के कारण।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. अच्छाई का हुक्म देना और बुराई से रोकना (अम्र बिल-मारूफ़ व नही अनिल-मुनकर) इस्लाम का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत का ज़रिया है — जो लोग इस ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, अल्लाह उन्हें आज़ाब से बचाता है।
  2. अल्लाह की सज़ा से कोई नहीं बच सकता, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। जब अल्लाह किसी क़ौम पर आज़ाब लाता है, तो वह अटल होता है।
  3. नसीहत सुनना और उस पर अमल करना बहुत ज़रूरी है। नसीहत को अनदेखा करना और हठधर्मी पर अड़े रहना इंसान को तबाही की ओर ले जाता है।
  4. अल्लाह की मदद उन्हीं के साथ होती है जो सच्चाई पर क़ायम रहते हैं और बुराई से रोकते हैं। भले ही वे अल्पसंख्यक हों, अल्लाह उन्हें हर बुराई से महफ़ूज़ रखता है।
  5. पाप पर अड़े रहना और उसे छोड़ने से इनकार करना इंसान के दिल को सख्त कर देता है और उसे अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है। अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, इसलिए हमें हमेशा उसकी ओर लौटते रहना चाहिए।


📜 आयत 163-167 — सूरा अल-आराफ

163وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ ۙ لَا تَأْتِيهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
और (ऐ रसूल) उनसे ज़रा उस गाँव का हाल तो पूछो जो दरिया के किनारे वाक़ऐ था जब ये लोग उनके बुज़ुर्ग शुम्बे (सनीचर) के दिन ज्यादती करने लगे कि जब उनका शुम्बे (वाला इबादत का) दिन होता तब तो मछलियाँ सिमट कर उनके सामने पानी पर उभर के आ जाती और जब उनका शुम्बा (वाला इबादत का) दिन न होता तो मछलियॉ उनके पास ही न फटकतीं और चॅूकि ये लोग बदचलन थे उस दरजे से हम भी उनकी यूं ही आज़माइश किया करते थे
164وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
और जब उनमें से एक जमाअत ने (उन लोगों में से जो शुम्बे के दिन शिकार को मना करते थे) कहा कि जिन्हें ख़ुदा हलाक़ करना या सख्त अज़ाब में मुब्तिला करना चाहता है उन्हें (बेफायदे) क्यो नसीहत करते हो तो वह कहने लगे कि फक़त तुम्हारे परवरदिगार में (अपने को) इल्ज़ाम से बचाने के लिए यायद इसलिए कि ये लोग परहेज़गारी एख्तियार करें
165فَلَمَّا نَسُوا مَا ذُكِّرُوا بِهِ أَنجَيْنَا الَّذِينَ يَنْهَوْنَ عَنِ السُّوءِ وَأَخَذْنَا الَّذِينَ ظَلَمُوا بِعَذَابٍ بَئِيسٍ بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
फिर जब वह लोग जिस चीज़ की उन्हें नसीहत की गई थी उसे भूल गए तो हमने उनको तो तजावीज़ (नजात) दे दी जो बुरे काम से लोगों को रोकते थे और जो लोग ज़ालिम थे उनको उनकी बद चलनी की वजह से बड़े अज़ाब में गिरफ्तार किया
166فَلَمَّا عَتَوْا عَن مَّا نُهُوا عَنْهُ قُلْنَا لَهُمْ كُونُوا قِرَدَةً خَاسِئِينَ
फिर जिस बात की उन्हें मुमानिअत (रोक) की गई थी जब उन लोगों ने उसमें सरकशी की तो हमने हुक्म दिया कि तुम ज़लील और ख़्वार (धुत्कारे) हुए बन्दर बन जाओ (और वह बन गए)
167وَإِذْ تَأَذَّنَ رَبُّكَ لَيَبْعَثَنَّ عَلَيْهِمْ إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَن يَسُومُهُمْ سُوءَ الْعَذَابِ ۗ إِنَّ رَبَّكَ لَسَرِيعُ الْعِقَابِ ۖ وَإِنَّهُ لَغَفُورٌ رَّحِيمٌ
(ऐ रसूल वह वक्त याद दिलाओ) जब तुम्हारे परवरदिगार ने पुकार पुकार के (बनी ईसराइल से कह दिया था कि वह क़यामत तक उन पर ऐसे हाक़िम को मुसल्लत देखेगा जो उन्हें बुरी बुरी तकलीफें देता रहे क्योंकि) इसमें तो शक़ ही नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बहुत जल्द अज़ाब करने वाला है और इसमें भी शक़ नहीं कि वह बड़ा बख्शने वाला (मेहरबान) भी है
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
165आयत

अनुवाद — अल-आराफ 165

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Thursday, October 1, 2026

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