अल-आराफ · 183/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ ۝١٨٣
Wa umlee lahum; inna kaidee mateen
📖 हिंदी अर्थ
और मैं उन्हें (दुनिया में) ढील दूंगा बेशक मेरी तद्बीर (पुख्ता और) मज़बूत है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَأُمْلِي لَهُمْ: मैं उन्हें मोहलत देता हूँ, अर्थात उनकी सज़ा को टालता हूँ।
  • كَيْدِي: मेरी योजना, मेरी पकड़, मेरा दाँव।
  • مَتِينٌ: अत्यंत मज़बूत, दृढ़ और अटूट।

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने उसकी आयतों को झुठलाया और नबी की दावत को नकार दिया। अल्लाह फ़रमाता है कि जब ये लोग अपनी सरकशी और इनकार पर अड़े रहे, तो मैंने उन्हें तुरंत पकड़ना मुनासिब नहीं समझा, बल्कि उन्हें लंबी मोहलत दे दी। मैं उनकी सज़ा को टालता रहता हूँ, ताकि वे यह समझें कि उन्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी और वे अपने कुफ़्र और सरकशी में और बढ़ते चले जाएँ। यह मोहलत उनके लिए रहमत नहीं, बल्कि एक चालाकी भरी मोहलत है, जिससे उनका अज़ाब और दोगुना हो जाएगा।

अल्लाह फ़रमाता है: "मेरी चाल अत्यंत मज़बूत है।" यानी जब मैं उन्हें पकड़ूँगा, तो उनकी कोई ताक़त, कोई हथियार, कोई चालाकी उन्हें बचा नहीं सकेगी। मेरी पकड़ ऐसी होगी जिसे कोई रोक नहीं सकता। बाहर से देखने में यह मोहलत उनके लिए भलाई लगती है, लेकिन असल में यह उनके लिए नुक़्सान का सामान है, क्योंकि हर गुनाह जो वे इस मोहलत में करते हैं, उनके अज़ाब में इज़ाफ़ा करता है।


फ़ायदे:

  1. अल्लाह की सज़ा में देरी उसकी रहमत की कमी नहीं है, बल्कि वह अपने बंदों को तौबा का मौक़ा देता है। जो इस मौक़े से फ़ायदा उठाए, वह कामयाब है।
  2. इंसान को कभी भी अल्लाह की मोहलत पर धोखा नहीं खाना चाहिए। जो लोग गुनाहों पर अड़े रहते हैं और समझते हैं कि हमें कुछ नहीं होगा, वे सबसे बड़े घाटे में हैं।
  3. अल्लाह की पकड़ बहुत मज़बूत है। उसकी पकड़ से बचने की कोई सूरत नहीं। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की नाफ़रमानी से बचे और उसकी रहमत का दामन थामे।
  4. यह आयत मुसलमानों को सब्र और दृढ़ता सिखाती है। जब वे देखें कि बातिल के लोग तरक़्क़ी कर रहे हैं और उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल रही, तो वे निराश न हों, क्योंकि अल्लाह की योजना सबसे मज़बूत है और उसका फ़ैसला अटल है।
  5. अल्लाह की मोहलत को ग़नीमत समझकर तौबा और इस्लाह का रास्ता अपनाना चाहिए, क्योंकि मोहलत की आख़िरी घड़ी का पता किसी को नहीं।


📜 आयत 181-185 — अल-आराफ

181وَمِمَّنْ خَلَقْنَا أُمَّةٌ يَهْدُونَ بِالْحَقِّ وَبِهِ يَعْدِلُونَ
और हमारी मख़लूक़ात से कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दीने हक़ की हिदायत करते हैं और हक़ से इन्साफ़ भी करते हैं
182وَالَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا سَنَسْتَدْرِجُهُم مِّنْ حَيْثُ لَا يَعْلَمُونَ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठलाया हम उन्हें बहुत जल्द इस तरह आहिस्ता आहिस्ता (जहन्नुम में) ले जाएंगें कि उन्हें ख़बर भी न होगी
183وَأُمْلِي لَهُمْ ۚ إِنَّ كَيْدِي مَتِينٌ
और मैं उन्हें (दुनिया में) ढील दूंगा बेशक मेरी तद्बीर (पुख्ता और) मज़बूत है
184أَوَلَمْ يَتَفَكَّرُوا ۗ مَا بِصَاحِبِهِم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ مُّبِينٌ
क्या उन लोगों ने इतना भी ख्याल न किया कि आख़िर उनके रफीक़ (मोहम्मद ) को कुछ जुनून तो नहीं वह तो बस खुल्लम खुल्ला (अज़ाबे ख़ुदा से) डराने वाले हैं
185أَوَلَمْ يَنظُرُوا فِي مَلَكُوتِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا خَلَقَ اللَّهُ مِن شَيْءٍ وَأَنْ عَسَىٰ أَن يَكُونَ قَدِ اقْتَرَبَ أَجَلُهُمْ ۖ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَهُ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने आसमान व ज़मीन की हुकूमत और ख़ुदा की पैदा की हुई चीज़ों में ग़ौर नहीं किया और न इस बात में कि यायद उनकी मौत क़रीब आ गई हो फिर इतना समझाने के बाद (भला) किस बात पर ईमान लाएंगें
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अनुवाद — अल-आराफ 183

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Tuesday, August 18, 2026

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