अल-आराफ · 85/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ۝٨٥
Wa ilaa Madyana akhaahum Shu`aybaa; qaala yaa qawmi` budul laaha maa lakum min ilaahin ghairuhoo qad jaaa`atkum baiyinatum mir Rabbikum fa awful kaila walmeezaana wa laa tabkhasun naasa ashyaa`ahum wa laa tufsidoo fil ardi ba`da islaahihaa; zaalikum khairul lakum in kuntum mu`mineen
📖 हिंदी अर्थ
और (हमने) मदयन (वालों के) पास उनके भाई शुएब को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होंने (उन लोगों से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं (और) तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक वाजेए व रौशन मौजिज़ा (भी) आ चुका तो नाप और तौल पूरी किया करो और लोगों को उनकी (ख़रीदी हुई) चीज़ में कम न दिया करो और ज़मीन में उसकी असलाह व दुरूस्ती के बाद फसाद न करते फिरो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَدْيَنَ (मदयन): यह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की संतान में से एक व्यक्ति का नाम था, और उन्हीं के नाम पर उस क़ौम के शहर का नाम रखा गया।
  • أَخَاهُمْ (उनका भाई): यहाँ भाई से मतलब नसब (ख़ानदान) में भाई होना है, न कि दीन में।
  • بَيِّنَةٌ (स्पष्ट प्रमाण): वह स्पष्ट चमत्कार और दलील जो नबी की सच्चाई पर गवाही दे।
  • تَبْخَسُوا (कम न करो): किसी का हक़ कम करना या उसे नुक़सान पहुँचाना।
  • إِصْلَاحِهَا (उसके सुधार के बाद): अल्लाह ने पैग़म्बरों के ज़रिए ज़मीन को ईमान और अदल से सुधारा था।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम को उनकी क़ौम "मदयन" की ओर भेजा। यह वही क़ौम थी जो कुफ़्र में डूबी हुई थी और लोगों को नाप-तौल में धोखा देती थी। हज़रत शुएब ने अपनी क़ौम को पुकारा: "ऐ मेरी क़ौम! अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई माबूद नहीं है। मैं तुम्हें सिर्फ़ उसी की तरफ़ बुलाता हूँ, और मेरे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से स्पष्ट प्रमाण आ चुका है जो मेरी सच्चाई की गवाही देता है।"

फिर उन्होंने अपनी क़ौम को सबसे अहम नसीहत दी: "नाप और तौल में पूरा-पूरा दो, लोगों को उनका हक़ कम करके मत दो, और ज़मीन में फ़साद मत फैलाओ।" यानी अल्लाह ने पैग़म्बरों के ज़रिए ज़मीन को ईमान, अदल और अच्छाई से सुधारा है, तुम उसे कुफ़्र, ज़ुल्म और बेईमानी से बिगाड़ो मत।

हज़रत शुएब ने यह भी फ़रमाया: "यह चीज़ें जो मैं तुम्हें बता रहा हूँ — यानी अल्लाह की इबादत, ईमानदारी, नाप-तौल में पूरा हक़ देना और ज़मीन पर फ़साद न फैलाना — यह तुम्हारे लिए दुनिया और आख़िरत दोनों में बेहतर है, बशर्ते कि तुम सच्चे दिल से मेरी बात को मानो और अल्लाह पर ईमान रखो।"


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम सिर्फ़ नमाज़ और रोज़े का नाम नहीं, बल्कि यह पूरे जीवन का निज़ाम है। अल्लाह की इबादत के साथ-साथ लोगों के हक़ अदा करना, ईमानदारी से काम करना और समाज में अदल क़ायम करना भी हमारा फ़र्ज़ है। आज के दौर में जब दुनिया भर में बेईमानी, धोखाधड़ी और ज़ुल्म फैला हुआ है, यह आयत हमें बुलाती है कि हम अपने कामों में सच्चाई और ईमानदारी अपनाएँ। याद रखिए, अल्लाह उन्हीं लोगों से मुहब्बत करता है जो अदल और इंसाफ़ करते हैं। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया की भलाई और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाता है।



📜 आयत 83-87 — अल-आराफ

83فَأَنجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ كَانَتْ مِنَ الْغَابِرِينَ
तब हमने उनको और उनके घर वालों को नजात दी मगर सिर्फ (एक) उनकी बीबी को कि वह (अपनी बदआमाली से) पीछे रह जाने वालों में थी
84وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ
और हमने उन लोगों पर (पत्थर का) मेह बरसाया-पस ज़रा ग़ौर तो करो कि गुनाहगारों का अन्जाम आखिर क्या हुआ
85وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
और (हमने) मदयन (वालों के) पास उनके भाई शुएब को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होंने (उन लोगों से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं (और) तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक वाजेए व रौशन मौजिज़ा (भी) आ चुका तो नाप और तौल पूरी किया करो और लोगों को उनकी (ख़रीदी हुई) चीज़ में कम न दिया करो और ज़मीन में उसकी असलाह व दुरूस्ती के बाद फसाद न करते फिरो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
86وَلَا تَقْعُدُوا بِكُلِّ صِرَاطٍ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ مَنْ آمَنَ بِهِ وَتَبْغُونَهَا عِوَجًا ۚ وَاذْكُرُوا إِذْ كُنتُمْ قَلِيلًا فَكَثَّرَكُمْ ۖ وَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ
और तुम लोग जो रास्तों पर (बैठकर) जो ख़ुदा पर ईमान लाया है उसको डराते हो और ख़ुदा की राह से रोकते हो और उसकी राह में (ख्वाहमाख्वाह) कज़ी ढूँढ निकालते हो अब न बैठा करो और उसको तो याद करो कि जब तुम (शुमार में) कम थे तो ख़ुदा ही ने तुमको बढ़ाया, और ज़रा ग़ौर तो करो कि (आख़िर) फसाद फैलाने वालों का अन्जाम क्या हुआ
87وَإِن كَانَ طَائِفَةٌ مِّنكُمْ آمَنُوا بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ وَطَائِفَةٌ لَّمْ يُؤْمِنُوا فَاصْبِرُوا حَتَّىٰ يَحْكُمَ اللَّهُ بَيْنَنَا ۚ وَهُوَ خَيْرُ الْحَاكِمِينَ
और जिन बातों का मै पैग़ाम लेकर आया हूँ अगर तुममें से एक गिरोह ने उनको मान लिया और एक गिरोह ने नहीं माना तो (कुछ परवाह नहीं) तो तुम सब्र से बैठे (देखते) रहो यहाँ तक कि ख़ुदा (खुद) हमारे दरमियान फैसला कर दे, वह तो सबसे बेहतर फैसला करने वाला है
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अनुवाद — अल-आराफ 85

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Tuesday, August 18, 2026

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