अल-आराफ · 84/206
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-आराफ
وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ ۝٨٤
Wa `amtarnaa `alaihim mataran fanzur kaifa kaana aaqibatul mujjrimeen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने उन लोगों पर (पत्थर का) मेह बरसाया-पस ज़रा ग़ौर तो करो कि गुनाहगारों का अन्जाम आखिर क्या हुआ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا: हमने उन पर एक (विशेष) वर्षा बरसाई — अर्थात पत्थरों की वर्षा।
  • عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ: अपराधियों का अंतिम परिणाम।

व्याख्या:

अल्लाह तआला ने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की क़ौम के काफ़िरों और अपराधियों को उनके घोर अत्याचारों, व्यभिचार और रसूलों के झुठलाने की सज़ा में एक भयानक पत्थरों की वर्षा भेजी। यह कोई साधारण वर्षा नहीं थी, बल्कि पकी हुई मिट्टी (सिज्जील) के पत्थर थे जो उन पर लगातार गिरे। साथ ही अल्लाह ने उनकी बस्तियों को उलट दिया, उनका ऊपरी हिस्सा नीचे कर दिया और नीचे का ऊपर कर दिया। यह उनके लिए सांसारिक अपमान और अंतिम विनाश का कारण बना।

फिर अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को संबोधित करते हुए कहता है कि आप देखें कि उन अपराधियों का अंत कैसा हुआ, जिन्होंने अल्लाह की अवज्ञा में ज़ुल्म और फ़साद किया और उसके रसूलों को झुठलाया। उनका अंजाम पूर्ण विनाश, हानि और सदैव के लिए बदनामी थी। यह एक सबक़ और चेतावनी है कि अल्लाह की पकड़ से कोई नहीं बच सकता।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह की सज़ा अचानक और ऐसे रूप में आती है जिसका अंदाज़ा इंसान नहीं लगा सकता, इसलिए हर व्यक्ति को अपने आचरण पर निरंतर ध्यान देना चाहिए।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि बुराई और अश्लीलता का अंत हमेशा विनाशकारी होता है, चाहे अपराधी कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों।
  3. अल्लाह की रहमत और नाराज़गी दोनों उसके नियमों के अनुसार काम करती हैं; जो लोग सीमाएँ तोड़ते हैं, वे अल्लाह की पकड़ से नहीं बच सकते।
  4. इस घटना से हमें सीख लेनी चाहिए कि अल्लाह के आदेशों का पालन करना और उसके रसूलों की शिक्षाओं पर चलना ही सुरक्षा और सफलता का मार्ग है।
  5. यह आयत न्याय और सज़ा के सिद्धांत को स्थापित करती है कि अल्लाह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि लोग स्वयं अपने कर्मों से अपना विनाश बुलाते हैं।


📜 आयत 82-86 — सूरा अल-आराफ

82وَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا أَخْرِجُوهُم مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ
सिर्फ करनें वालों (को नुत्फे को ज़ाए करते हो उस पर उसकी क़ौम का उसके सिवा और कुछ जवाब नहीं था कि वह आपस में कहने लगे कि उन लोगों को अपनी बस्ती से निकाल बाहर करो क्योंकि ये तो वह लोग हैं जो पाक साफ बनना चाहते हैं)
83فَأَنجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ كَانَتْ مِنَ الْغَابِرِينَ
तब हमने उनको और उनके घर वालों को नजात दी मगर सिर्फ (एक) उनकी बीबी को कि वह (अपनी बदआमाली से) पीछे रह जाने वालों में थी
84وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِم مَّطَرًا ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُجْرِمِينَ
और हमने उन लोगों पर (पत्थर का) मेह बरसाया-पस ज़रा ग़ौर तो करो कि गुनाहगारों का अन्जाम आखिर क्या हुआ
85وَإِلَىٰ مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا ۗ قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ قَدْ جَاءَتْكُم بَيِّنَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ ۖ فَأَوْفُوا الْكَيْلَ وَالْمِيزَانَ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ بَعْدَ إِصْلَاحِهَا ۚ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
और (हमने) मदयन (वालों के) पास उनके भाई शुएब को (रसूल बनाकर भेजा) तो उन्होंने (उन लोगों से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई दूसरा माबूद नहीं (और) तुम्हारे पास तो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से एक वाजेए व रौशन मौजिज़ा (भी) आ चुका तो नाप और तौल पूरी किया करो और लोगों को उनकी (ख़रीदी हुई) चीज़ में कम न दिया करो और ज़मीन में उसकी असलाह व दुरूस्ती के बाद फसाद न करते फिरो अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
86وَلَا تَقْعُدُوا بِكُلِّ صِرَاطٍ تُوعِدُونَ وَتَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ مَنْ آمَنَ بِهِ وَتَبْغُونَهَا عِوَجًا ۚ وَاذْكُرُوا إِذْ كُنتُمْ قَلِيلًا فَكَثَّرَكُمْ ۖ وَانظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُفْسِدِينَ
और तुम लोग जो रास्तों पर (बैठकर) जो ख़ुदा पर ईमान लाया है उसको डराते हो और ख़ुदा की राह से रोकते हो और उसकी राह में (ख्वाहमाख्वाह) कज़ी ढूँढ निकालते हो अब न बैठा करो और उसको तो याद करो कि जब तुम (शुमार में) कम थे तो ख़ुदा ही ने तुमको बढ़ाया, और ज़रा ग़ौर तो करो कि (आख़िर) फसाद फैलाने वालों का अन्जाम क्या हुआ
अल-आराफकुरान सूची
206आयत
मक्कीअवतरण स्थान
84आयत

अनुवाद — अल-आराफ 84

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Wednesday, September 30, 2026

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