अल-मआरिज · 20/44
अनुवाद उच्चारण — अल-मआरिज
إِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ جَزُوعًا ۝٢٠
Izaa massahush sharru jazoo`aa
📖 हिंदी अर्थ
जब उसे तक़लीफ छू भी गयी तो घबरा गया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मस्सहु (مسه): उसे छू लिया, अर्थात उसे पहुँच गया।
  • अश्शर्रु (الشر): बुराई, तकलीफ़, ग़रीबी, बीमारी, या कोई मुसीबत।
  • जज़ू'अन (جزوعا): बहुत ज़्यादा बेसब्री करने वाला, घबरा जाने वाला, हाय-तोबा करने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में इंसान की कमज़ोर फ़ितरत (प्रकृति) का ज़िक्र किया है। इंसान अपनी आदत और स्वभाव के तौर पर ऐसा है कि जब उसे कोई तकलीफ़ पहुँचती है—चाहे वह ग़रीबी हो, बीमारी हो, या कोई और मुसीबत—तो वह बेसब्र हो जाता है, घबरा जाता है, और हाय-तोबा करने लगता है। उसका दिल तंग हो जाता है और वह अल्लाह की रहमत से उम्मीद खो देता है। यह इंसान की कमज़ोरी है जो उसके अंदर पैदाइशी तौर पर मौजूद है।

लेकिन यह बात उन लोगों के बारे में नहीं है जो अल्लाह की इबादत करने वाले, नमाज़ पढ़ने वाले और अपने रब पर भरोसा रखने वाले हैं। वे लोग मुसीबत में भी सब्र करते हैं, क्योंकि उन्हें यक़ीन होता है कि हर तकलीफ़ अल्लाह की तरफ़ से है और उसमें भलाई छिपी होती है। वे जानते हैं कि मुसीबत के बाद आसानी आती है, और अल्लाह उन्हें सब्र की जज़ा (इनाम) देगा।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपनी इस कमज़ोरी पर क़ाबू पाना चाहिए। जब कोई मुसीबत आए, तो हमें घबराना नहीं चाहिए, बल्कि सब्र करना चाहिए और अल्लाह से दुआ करनी चाहिए। अल्लाह उन लोगों से मुहब्बत करता है जो सब्र करते हैं। याद रखिए, यह दुनिया इम्तिहान (परीक्षा) की जगह है, और मुसीबतें हमारे गुनाहों की माफ़ी का ज़रिया बनती हैं। जो शख्स मुसीबत में सब्र करता है, अल्लाह उसे बेहतरीन इनाम देता है और उसके दर्जे बुलंद करता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने अंदर सब्र की सिफ़त पैदा करें और अल्लाह की रहमत से कभी निराश न हों।



📜 आयत 18-22 — अल-मआरिज

18وَجَمَعَ فَأَوْعَىٰ
जिन्होंने (दीन से) पीठ फेरी और मुँह मोड़ा और (माल जमा किया)
19۞ إِنَّ الْإِنسَانَ خُلِقَ هَلُوعًا
और बन्द कर रखा बेशक इन्सान बड़ा लालची पैदा हुआ है
20إِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ جَزُوعًا
जब उसे तक़लीफ छू भी गयी तो घबरा गया
21وَإِذَا مَسَّهُ الْخَيْرُ مَنُوعًا
और जब उसे ज़रा फराग़ी हासिल हुई तो बख़ील बन बैठा
22إِلَّا الْمُصَلِّينَ
मगर जो लोग नमाज़ पढ़ते हैं
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अनुवाद — अल-मआरिज 20

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Tuesday, August 18, 2026

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