अल-जिन्न · 7/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
وَأَنَّهُمْ ظَنُّوا كَمَا ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَبْعَثَ اللَّهُ أَحَدًا ۝٧
Wa annahum zannoo kamaa zanantum al lany yab`asal laahu ahadaa
📖 हिंदी अर्थ
और ये कि जैसा तुम्हारा ख्याल है वैसा उनका भी एतक़ाद था कि ख़ुदा हरगिज़ किसी को दोबारा नहीं ज़िन्दा करेगा
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • ظَنُّوا: उन्होंने अनुमान लगाया / ख़याल किया
  • كَمَا ظَنَنتُمْ: जैसा तुमने अनुमान लगाया
  • أَن لَّن يَبْعَثَ اللَّهُ أَحَدًا: कि अल्लाह किसी को (मृत्यु के बाद) दोबारा नहीं उठाएगा

विस्तृत व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला जिन्नों के उस क़ौल को बयान कर रहे हैं जो उन्होंने क़ुरआन सुनने के बाद कहा था। जिन्नों की एक जमात ने अपनी क़ौम को संबोधित करते हुए कहा कि हमने यह अद्भुत क़ुरआन सुना है जो सीधे रास्ते की ओर मार्गदर्शन करता है, और हम उस पर ईमान ले आए।

इस आयत में जिन्नों ने यह स्वीकार किया कि पहले हम (जिन्न) भी उसी ग़लतफ़हमी में थे जिसमें कुफ़्फ़ारे इंस (मानव) थे — यानी हम सब यही समझते थे कि अल्लाह तआला मृत्यु के बाद किसी को दोबारा नहीं उठाएगा, न कोई हिसाब होगा, न कोई जज़ा (बदला) मिलेगा। यह उनकी उस समय की सोच थी जब उन्होंने क़ुरआन नहीं सुना था और वे अज्ञानता और गुमराही में डूबे हुए थे।

यहाँ अल्लाह तआला जिन्नों के इस इक़रार (स्वीकारोक्ति) को बयान कर रहे हैं ताकि इंसानों को भी सबक़ मिले कि जिन्नों ने भी जब सच्चाई सुनी तो उसे क़बूल कर लिया, और अपनी पुरानी ग़लतफ़हमियों से तौबा कर ली। यह उन लोगों के लिए बड़ी नसीहत है जो आज भी क़ियामत, हिसाब और आख़िरत के दिन को झुठलाते हैं।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि:

  1. अल्लाह का भेजा हुआ सच्चा ज्ञान (क़ुरआन) इंसानों और जिन्नों दोनों के लिए मार्गदर्शन है।
  2. मृत्यु के बाद दोबारा उठाया जाना, हिसाब और जज़ा — यह अल्लाह की सुन्नत (व्यवस्था) है, जिस पर ईमान लाना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है।
  3. जब सच्चाई सामने आ जाए तो उसे क़बूल करने में देरी नहीं करनी चाहिए, चाहे पहले हम कितनी ही ग़लतफ़हमियों में क्यों न रहे हों।

यह आयत हमें यह भी बताती है कि अल्लाह की रहमत और हिदायत का दामन बहुत वसीअ (विस्तृत) है — जिन्नों को भी उसने क़ुरआन सुनने का शरफ़ दिया और उन्हें भी हिदायत का रास्ता दिखाया। तो हम इंसानों को चाहिए कि हम अल्लाह के इस एहसान का शुक्र अदा करें कि उसने हमें क़ुरआन समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दी, और हम उस दिन की तैयारी करें जब सबको अपने आमाल का हिसाब देना होगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 5-9 — अल-जिन्न

5وَأَنَّا ظَنَنَّا أَن لَّن تَقُولَ الْإِنسُ وَالْجِنُّ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا
और ये कि हमारा तो ख्याल था कि आदमी और जिन ख़ुदा की निस्बत झूठी बात नहीं बोल सकते
6وَأَنَّهُ كَانَ رِجَالٌ مِّنَ الْإِنسِ يَعُوذُونَ بِرِجَالٍ مِّنَ الْجِنِّ فَزَادُوهُمْ رَهَقًا
और ये कि आदमियों में से कुछ लोग जिन्नात में से बाज़ लोगों की पनाह पकड़ा करते थे तो (इससे) उनकी सरकशी और बढ़ गयी
7وَأَنَّهُمْ ظَنُّوا كَمَا ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَبْعَثَ اللَّهُ أَحَدًا
और ये कि जैसा तुम्हारा ख्याल है वैसा उनका भी एतक़ाद था कि ख़ुदा हरगिज़ किसी को दोबारा नहीं ज़िन्दा करेगा
8وَأَنَّا لَمَسْنَا السَّمَاءَ فَوَجَدْنَاهَا مُلِئَتْ حَرَسًا شَدِيدًا وَشُهُبًا
और ये कि हमने आसमान को टटोला तो उसको भी बहुत क़वी निगेहबानों और शोलो से भरा हुआ पाया
9وَأَنَّا كُنَّا نَقْعُدُ مِنْهَا مَقَاعِدَ لِلسَّمْعِ ۖ فَمَن يَسْتَمِعِ الْآنَ يَجِدْ لَهُ شِهَابًا رَّصَدًا
और ये कि पहले हम वहाँ बहुत से मक़ामात में (बातें) सुनने के लिए बैठा करते थे मगर अब कोई सुनना चाहे तो अपने लिए शोले तैयार पाएगा
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अनुवाद — अल-जिन्न 7

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Tuesday, August 18, 2026

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