अल-मुद्दस्सिर · 44/56
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मुद्दस्सिर
وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ ۝٤٤
Wa lam naku nut`imul miskeen
📖 हिंदी अर्थ
और न मोहताजों को खाना खिलाते थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
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A Abdul Basit Abdul Samad ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ – मिस्कीन (ग़रीब) को खाना खिलाना, उसकी मदद करना।

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों की ज़ुबानी है जो जहन्नम में डाले जा चुके हैं। जब वे पूछे जाते हैं कि आख़िर किस चीज़ ने तुम्हें जहन्नम में डाला, तो वे अपने उन कर्मों का इज़हार करते हैं जो उन्हें इस अंजाम तक ले गए। उनमें से एक बड़ा क़ुसूर (कमी) यह था कि वे अल्लाह की दी हुई नेमतों में से ग़रीबों और मिस्कीनों का हक़ अदा नहीं करते थे। वे न तो खुद मिस्कीन को खाना खिलाते थे और न ही दूसरों को इस पर उभारते थे।

यह आयत हमें सिखाती है कि इबादत सिर्फ़ नमाज़ और रोज़े तक महदूद नहीं है, बल्कि अल्लाह की मख़लूक़ (सृष्टि) के साथ हुस्ने-सुलूक (अच्छा व्यवहार) और ग़रीबों की मदद करना भी ईमान का हिस्सा है। जिस समाज में ग़रीबों का ख़याल नहीं रखा जाता, वह समाज अल्लाह की रहमत से महरूम हो जाता है।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हमें अपने आस-पास के ज़रूरतमंदों पर ध्यान देना चाहिए। एक मुसलमान वही है जो दूसरों की भूख का एहसास करे और अपनी नेमतों में से उनका हिस्सा निकाले। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "वह मुसलमान कामिल नहीं जो पेट भरकर सोए और उसका पड़ोसी भूखा हो।"

अल्लाह हमें तौफ़ीक़ दे कि हम अपने माल में ग़रीबों और मिस्कीनों का हक़ अदा करें, और उस दिन की शर्मिंदगी से बचें जब ये सवालात किए जाएंगे। आमीन।



📜 आयत 42-46 — सूरा अल-मुद्दस्सिर

42مَا سَلَكَكُمْ فِي سَقَرَ
वह लोग कहेंगे
43قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّينَ
कि हम न तो नमाज़ पढ़ा करते थे
44وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ
और न मोहताजों को खाना खिलाते थे
45وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ
और अहले बातिल के साथ हम भी बड़े काम में घुस पड़ते थे
46وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ
और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही रहे)
अल-मुद्दस्सिरकुरान सूची
56आयत
मक्कीअवतरण स्थान
44आयत

अनुवाद — अल-मुद्दस्सिर 44

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Thursday, October 1, 2026

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