अल-मुद्दस्सिर · 45/56
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मुद्दस्सिर
وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ ۝٤٥
Wa kunnaa nakhoodu ma`al khaaa`ideen
📖 हिंदी अर्थ
और अहले बातिल के साथ हम भी बड़े काम में घुस पड़ते थे

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • नख़ूज़ु (نَخُوضُ): हम प्रवेश करते थे, बातों में उलझ जाते थे।
  • अल-ख़ाइज़ीन (الْخَائِضِينَ): बातिल (झूठ) में डूबने वाले, ग़लत बातों में लगे रहने वाले लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के कथन का हिस्सा है जो जहन्नम (नरक) में होंगे। जब उनसे पूछा जाएगा कि तुम्हें जहन्नम में किस चीज़ ने डाला, तो वे अपने उन कार्यों को गिनाएँगे जिनके कारण वे इस अंजाम तक पहुँचे। इस आयत में वे कहते हैं: "और हम बातिल में डूबने वालों के साथ मिलकर बातिल में डूबे रहते थे।"

इसका अर्थ यह है कि वे दुनिया में झूठ, बेकार की बातों, ग़लत कामों और गुमराही में लिप्त लोगों के साथ शामिल हो जाते थे। वे उनके साथ बैठते थे, उनकी बातों में हिस्सा लेते थे, उनके ग़लत कामों का समर्थन करते थे और उनके साथ मिलकर सच्चाई का मज़ाक उड़ाते थे। वे न केवल खुद बातिल में थे, बल्कि दूसरों के बातिल में शामिल होकर उसे बढ़ावा भी देते थे। यह उनकी बुरी आदत थी कि जहाँ भी कोई झूठी बात, ग़लत काम या गुमराही होती, वे उसमें कूद पड़ते और उसका हिस्सा बन जाते।

यह आयत हमें सिखाती है कि इंसान की संगत और माहौल का उसके दिल और आचरण पर गहरा असर पड़ता है। जो लोग बुरी संगत में रहते हैं और बातिल (झूठ) के साथ मिलकर उसमें हिस्सा लेते हैं, वे धीरे-धीरे सच्चाई से दूर हो जाते हैं और उनका दिल कठोर हो जाता है। इसलिए हमें हमेशा अच्छी संगत चुननी चाहिए और बातिल (झूठ और ग़लत कामों) से दूर रहना चाहिए। जो लोग सच्चाई पर हैं, उनके साथ रहकर हम सच्चाई पर क़ायम रह सकते हैं, और जो लोग बातिल में हैं, उनसे दूरी बनाकर हम अपने ईमान की हिफ़ाज़त कर सकते हैं।

याद रखिए! यह दुनिया एक इम्तिहान (परीक्षा) की जगह है। जो लोग यहाँ सच्चाई का साथ देंगे और बातिल से बचेंगे, उनका अंजाम जन्नत (स्वर्ग) होगा। और जो लोग बातिल में डूबे रहे और सच्चाई से मुँह मोड़ा, उनका अंजाम जहन्नम (नरक) होगा। अल्लाह हमें सच्चाई का साथ देने और बातिल से बचने की तौफ़ीक़ (शक्ति) दे। आमीन।



📜 आयत 43-47 — सूरा अल-मुद्दस्सिर

43قَالُوا لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّينَ
कि हम न तो नमाज़ पढ़ा करते थे
44وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِينَ
और न मोहताजों को खाना खिलाते थे
45وَكُنَّا نَخُوضُ مَعَ الْخَائِضِينَ
और अहले बातिल के साथ हम भी बड़े काम में घुस पड़ते थे
46وَكُنَّا نُكَذِّبُ بِيَوْمِ الدِّينِ
और रोज़ जज़ा को झुठलाया करते थे (और यूँ ही रहे)
47حَتَّىٰ أَتَانَا الْيَقِينُ
यहाँ तक कि हमें मौत आ गयी
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56आयत
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45आयत

अनुवाद — अल-मुद्दस्सिर 45

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Thursday, October 1, 2026

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