अल-इंसान · 10/31
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-इंसान
إِنَّا نَخَافُ مِن رَّبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًا قَمْطَرِيرًا ۝١٠
Innaa nakhaafu mir Rabbinna Yawman `aboosan qamtareeraa
📖 हिंदी अर्थ
हमको तो अपने परवरदिगार से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे (और) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अबूसन (عبوسًا): ऐसा दिन जिसमें चेहरे टेढ़े-मेढ़े और भयावह हों, भौंहें तनी हुई हों।
  • क़म्तरीर (قمطرير): अत्यंत कठोर, भयानक और संकट से भरा हुआ दिन।

तफ़सीर:

यह आयत उन नेक लोगों का वर्णन करती है जो अल्लाह की इबादत में अपना जीवन बिताते हैं और उसके भय से काँपते रहते हैं। वे कहते हैं: "हम अपने रब से उस दिन का भय रखते हैं जो अत्यंत कठोर, भयानक और संकटों से भरा होगा।"

यह वे लोग हैं जो दुनिया में अल्लाह के आदेशों का पालन करते थे, अपने वादों को पूरा करते थे, और दूसरों की मदद करते थे—चाहे वह गरीब हो, अनाथ हो या कैदी। वे अपने अच्छे कर्मों का बदला नहीं चाहते थे, न ही लोगों से प्रशंसा की आशा रखते थे। उनका एकमात्र उद्देश्य अल्लाह की रज़ा और उसका प्रतिफल था।

वे उस दिन से डरते हैं जब चेहरे भय से विकृत हो जाएँगे, आँखें खौफ से फटी रह जाएँगी, और हर इंसान केवल अपनी ही फिक्र में डूबा होगा। यह भय उन्हें निराशा नहीं देता, बल्कि उन्हें अच्छे कर्मों की ओर प्रेरित करता है। वे जानते हैं कि अल्लाह का दिन अत्यंत कठिन है, इसलिए वे उसकी रहमत की उम्मीद में अपने आपको अच्छे कर्मों से सजाते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का भय मोमिन की पहचान है। यह भय उसे गुनाहों से रोकता है और नेकियों की ओर ले जाता है। जो व्यक्ति अल्लाह के उस भयानक दिन से डरता है, वह दुनिया में अपने आचरण को सुधारता है, लोगों के साथ भलाई करता है, और अपने रब की इबादत में लगा रहता है।

ऐसे लोगों के लिए अल्लाह ने जन्नत के झरने, सुंदर आवास और अनंत नेमतें तैयार की हैं। वे उस दिन सुरक्षित होंगे जब हर कोई भयभीत होगा। अल्लाह उन्हें उस दिन की परेशानियों से बचाएगा और उन्हें खुशी और शांति प्रदान करेगा।

इसलिए, हमें भी इन नेक लोगों की तरह अल्लाह से डरना चाहिए, उसकी इबादत करनी चाहिए, और दूसरों की मदद करनी चाहिए। यही वह रास्ता है जो हमें उस कठिन दिन में सुरक्षा और सफलता तक पहुँचाएगा। अल्लाह हमें अपने भय और अपनी रहमत के बीच संतुलन बनाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 8-12 — सूरा अल-इंसान

8وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا
और उसकी मोहब्बत में मोहताज और यतीम और असीर को खाना खिलाते हैं
9إِنَّمَا نُطْعِمُكُمْ لِوَجْهِ اللَّهِ لَا نُرِيدُ مِنكُمْ جَزَاءً وَلَا شُكُورًا
(और कहते हैं कि) हम तो तुमको बस ख़ालिस ख़ुदा के लिए खिलाते हैं हम न तुम से बदले के ख़ास्तगार हैं और न शुक्र गुज़ारी के
10إِنَّا نَخَافُ مِن رَّبِّنَا يَوْمًا عَبُوسًا قَمْطَرِيرًا
हमको तो अपने परवरदिगार से उस दिन का डर है जिसमें मुँह बन जाएँगे (और) चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती होंगी
11فَوَقَاهُمُ اللَّهُ شَرَّ ذَٰلِكَ الْيَوْمِ وَلَقَّاهُمْ نَضْرَةً وَسُرُورًا
तो ख़ुदा उन्हें उस दिन की तकलीफ़ से बचा लेगा और उनको ताज़गी और ख़ुशदिली अता फरमाएगा
12وَجَزَاهُم بِمَا صَبَرُوا جَنَّةً وَحَرِيرًا
और उनके सब्र के बदले (बेहिश्त के) बाग़ और रेशम (की पोशाक) अता फ़रमाएगा
अल-इंसानकुरान सूची
31आयत
मदनीअवतरण स्थान
10आयत

अनुवाद — अल-इंसान 10

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Thursday, October 1, 2026

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