यूनुस · 59/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
قُلْ أَرَأَيْتُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ لَكُم مِّن رِّزْقٍ فَجَعَلْتُم مِّنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًا قُلْ آللَّهُ أَذِنَ لَكُمْ ۖ أَمْ عَلَى اللَّهِ تَفْتَرُونَ ۝٥٩
Qul ara`aitum maaa anzalal laahu lakum mir rizqin faja`altum minhu haraamanw wa halaalan qul aaallaahu azina lakum am `alal laahi taftaroon
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ वह जमा कर रहे हैं उससे कहीं बेहतर है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम्हारा क्या ख्याल है कि ख़ुदा ने तुम पर रोज़ी नाज़िल की तो अब उसमें से बाज़ को हराम बाज़ को हलाल बनाने लगे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा ने तुम्हें इजाज़त दी है या तुम ख़ुदा पर बोहतान बाँधते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَرَأَيْتُمْ: मुझे बताओ, अपनी राय से देखो।
  • أَنزَلَ اللَّهُ لَكُم مِّن رِّزْقٍ: अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो रोज़ी (जीविका) उतारी/पैदा की।
  • حَرَامًا وَحَلَالًا: तुमने उसमें से कुछ को हराम और कुछ को हलाल ठहरा लिया।
  • أَذِنَ لَكُمْ: क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी इजाज़त दी?
  • تَفْتَرُونَ: झूठ गढ़कर अल्लाह पर थोपते हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! इन मुशरिकों से कहो जो अपनी मर्ज़ी से हलाल-हराम के क़ानून बनाते हैं: "ज़रा मुझे बताओ, अल्लाह ने तुम्हारे लिए जो रोज़ी उतारी है—चाहे वह खेती की पैदावार हो, जानवर हों या दूसरी नेमतें—तुमने उनमें से कुछ चीज़ों को अपनी ओर से हराम और कुछ को हलाल ठहरा लिया। यह फ़ैसला किस अधिकार से किया? क्या अल्लाह ने तुम्हें इसकी कोई इजाज़त दी है? हरगिज़ नहीं! बल्कि तुम अल्लाह पर झूठ बाँध रहे हो और उसकी तरफ़ ऐसी बातें निस्बत कर रहे हो जो उसने कभी नहीं कहीं।"

यह आयत उन लोगों के बारे में है जो मक्का में अपनी मनमानी से कुछ जानवरों (जैसे बहीरा, साइबा, वसीला) को हराम ठहराते थे और कुछ को हलाल, बिना किसी शरई दलील के। अल्लाह उन्हें चुनौती देता है कि यदि सच्चे हो तो कोई सबूत लाओ कि अल्लाह ने यह हुक्म दिया है, वरना यह सरासर झूठ और अल्लाह पर इफ्तिरा है।


फ़ायदे (सबक):

  1. हलाल और हराम का हुक्म सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल का अधिकार है। किसी इंसान को यह हक़ नहीं कि अपनी सोच, रिवाज या मनमर्ज़ी से किसी चीज़ को हराम या हलाल कर दे।
  2. इस्लाम में दीन को अल्लाह की तरफ़ से मुकम्मल किया गया है, इसलिए किसी को यह जुर्रत नहीं करनी चाहिए कि अल्लाह के नाम पर ऐसी बातें गढ़े जो उसकी तरफ़ से साबित न हों।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों को भोगने में कोई बुराई नहीं, बल्कि बुराई उन नेमतों को अपनी ओर से हराम ठहराने में है। अल्लाह ने जो पाक और अच्छी चीज़ें बनाईं, वह अपने बंदों के लिए हैं।
  4. अल्लाह पर झूठ बाँधना (इफ्तिरा) बहुत बड़ा गुनाह है, और यह कुफ्र की श्रेणी में आता है। इससे बचना हर मुसलमान का ज़रूरी कर्तव्य है।
  5. इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम में हर मामले में सबूत और दलील की पैरवी की जाती है, और बिना इल्म के फ़तवा देना या दीन में नई बातें जोड़ना सख्त मना है।


📜 आयत 57-61 — यूनुस

57يَا أَيُّهَا النَّاسُ قَدْ جَاءَتْكُم مَّوْعِظَةٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَشِفَاءٌ لِّمَا فِي الصُّدُورِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّلْمُؤْمِنِينَ
लोगों तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नसीहत (किताबे ख़ुदा आ चुकी और जो (मरज़ शिर्क वगैरह) दिल में हैं उनकी दवा और ईमान वालों के लिए हिदायत और रहमत
58قُلْ بِفَضْلِ اللَّهِ وَبِرَحْمَتِهِ فَبِذَٰلِكَ فَلْيَفْرَحُوا هُوَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि (ये क़ुरान) ख़ुदा के फज़ल व करम और उसकी रहमत से तुमको मिला है (ही) तो उन लोगों को इस पर खुश होना चाहिए
59قُلْ أَرَأَيْتُم مَّا أَنزَلَ اللَّهُ لَكُم مِّن رِّزْقٍ فَجَعَلْتُم مِّنْهُ حَرَامًا وَحَلَالًا قُلْ آللَّهُ أَذِنَ لَكُمْ ۖ أَمْ عَلَى اللَّهِ تَفْتَرُونَ
और जो कुछ वह जमा कर रहे हैं उससे कहीं बेहतर है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम्हारा क्या ख्याल है कि ख़ुदा ने तुम पर रोज़ी नाज़िल की तो अब उसमें से बाज़ को हराम बाज़ को हलाल बनाने लगे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा ने तुम्हें इजाज़त दी है या तुम ख़ुदा पर बोहतान बाँधते हो
60وَمَا ظَنُّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَشْكُرُونَ
और जो लोग ख़ुदा पर झूठ मूठ बोहतान बॉधा करते हैं रोजे क़यामत का क्या ख्याल करते हैं उसमें शक़ नहीं कि ख़ुदा तो लोगों पर बड़ा फज़ल व (करम) है मगर उनमें से बहुतेरे शुक्र गुज़ार नहीं हैं
61وَمَا تَكُونُ فِي شَأْنٍ وَمَا تَتْلُو مِنْهُ مِن قُرْآنٍ وَلَا تَعْمَلُونَ مِنْ عَمَلٍ إِلَّا كُنَّا عَلَيْكُمْ شُهُودًا إِذْ تُفِيضُونَ فِيهِ ۚ وَمَا يَعْزُبُ عَن رَّبِّكَ مِن مِّثْقَالِ ذَرَّةٍ فِي الْأَرْضِ وَلَا فِي السَّمَاءِ وَلَا أَصْغَرَ مِن ذَٰلِكَ وَلَا أَكْبَرَ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ
(और ऐ रसूल) तुम (चाहे) किसी हाल में हो और क़ुरान की कोई सी भी आयत तिलावत करते हो और (लोगों) तुम कोई सा भी अमल कर रहे हो हम (हम सर वक़त) जब तुम उस काम में मशग़ूल होते हो तुम को देखते रहते हैं और तुम्हारे परवरदिगार से ज़र्रा भी कोई चीज़ ग़ायब नहीं रह सकती न ज़मीन में और न आसमान में और न कोई चीज़ ज़र्रे से छोटी है और न उससे बढ़ी चीज़ मगर वह रौशन किताब लौहे महफूज़ में ज़रुर है
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अनुवाद — यूनुस 59

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Tuesday, August 18, 2026

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