यूनुस · 96/109
अनुवाद उच्चारण — यूनुस
إِنَّ الَّذِينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ ۝٩٦
Innal lazeena haqqat `alaihim Kalimatu Rabbika laa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों के बारे में तुम्हारे परवरदिगार को बातें पूरी उतर चुकी हैं (कि ये मुस्तहके अज़ाब हैं)
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • حَقَّتْ: साबित हो गई, अनिवार्य हो गई, लागू हो गई।
  • كَلِمَتُ رَبِّكَ: तुम्हारे रब का फैसला, उसका क़ज़ा और अज़ल (अनादि) हुक्म।
  • لَا يُؤْمِنُونَ: वे ईमान नहीं लाएँगे।

आयत का तफ़सीर:

ऐ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! जिन लोगों पर तुम्हारे रब की बात साबित हो चुकी है—यानी अल्लाह के अज़ली इल्म और फैसले में उनके लिए दुर्भाग्य और यातना लिख दी गई है, और यह तय हो चुका है कि वे अपनी हठधर्मी और सत्य के विरोध पर अड़े रहने के कारण कुफ्र की हालत में मरेंगे—वे कभी ईमान नहीं लाएँगे। अल्लाह की ओर से उनके लिए यह फैसला उनके अपने कर्मों और सत्य को ठुकराने की वजह से सामने आया है, क्योंकि अल्लाह का फैसला उसके इल्म और न्याय के अनुसार होता है। ये लोग अल्लाह की निशानियों पर दिल से विश्वास नहीं करते, उसकी एकता को स्वीकार नहीं करते, और न ही उसके आदेशों पर अमल करते हैं। उनके लिए ईमान का दरवाज़ा बंद हो चुका है, क्योंकि उन्होंने स्वयं सत्य को देखने के बावजूद उसे नकार दिया और अल्लाह की रहमत से खुद को वंचित कर लिया।

आयत से लाभ:

  1. अल्लाह का इल्म और फैसला उसके न्याय और हिकमत पर आधारित है; वह किसी पर ज़ुल्म नहीं करता, बल्कि इंसान अपने कर्मों से अपना अंजाम खुद तय करता है।
  2. ईमान अल्लाह की ओर से एक नेमत है, लेकिन यह उन्हीं को मिलती है जो सत्य की तलाश करते हैं और उसे क़बूल करने के लिए तैयार रहते हैं।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने दिलों को सत्य के लिए खुला रखना चाहिए और अहंकार, हठधर्मी या दुनियावी मोह की वजह से सत्य को नकारने से बचना चाहिए, क्योंकि यही वह रास्ता है जो इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह की मेहरबानी और रहमत उन लोगों के लिए है जो उसकी ओर रुजू करते हैं, और उसकी यातना उनके लिए है जो उसके संदेश को ठुकराते हैं—यह एक न्यायपूर्ण व्यवस्था है जो इंसान को सही रास्ते पर चलने की तरग़ीब देती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 94-98 — यूनुस

94فَإِن كُنتَ فِي شَكٍّ مِّمَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ فَاسْأَلِ الَّذِينَ يَقْرَءُونَ الْكِتَابَ مِن قَبْلِكَ ۚ لَقَدْ جَاءَكَ الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْمُمْتَرِينَ
पस जो कुरान हमने तुम्हारी तरफ नाज़िल किया है अगर उसके बारे में तुम को कुछ शक़ हो तो जो लोग तुम से पहले से किताब (ख़ुदा) पढ़ा करते हैं उन से पूछ के देखों तुम्हारे पास यक़ीनन तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से बरहक़ किताब आ चुकी तो तू न हरगिज़ शक़ करने वालों से होना
95وَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِآيَاتِ اللَّهِ فَتَكُونَ مِنَ الْخَاسِرِينَ
न उन लोगों से होना जिन्होंने ख़ुदा की आयतों को झुठलाया (वरना) तुम भी घाटा उठाने वालों से हो जाओगे
96إِنَّ الَّذِينَ حَقَّتْ عَلَيْهِمْ كَلِمَتُ رَبِّكَ لَا يُؤْمِنُونَ
(ऐ रसूल) इसमें शक़ नहीं कि जिन लोगों के बारे में तुम्हारे परवरदिगार को बातें पूरी उतर चुकी हैं (कि ये मुस्तहके अज़ाब हैं)
97وَلَوْ جَاءَتْهُمْ كُلُّ آيَةٍ حَتَّىٰ يَرَوُا الْعَذَابَ الْأَلِيمَ
वह लोग जब तक दर्दनाक अज़ाब देख (न) लेगें ईमान न लाएंगें अगरचे इनके सामने सारी (ख़ुदाई के) मौजिज़े आ मौजूद हो
98فَلَوْلَا كَانَتْ قَرْيَةٌ آمَنَتْ فَنَفَعَهَا إِيمَانُهَا إِلَّا قَوْمَ يُونُسَ لَمَّا آمَنُوا كَشَفْنَا عَنْهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَتَّعْنَاهُمْ إِلَىٰ حِينٍ
कोई बस्ती ऐसी क्यों न हुई कि ईमान क़ुबूल करती तो उसको उसका ईमान फायदे मन्द होता हाँ यूनूस की क़ौम जब (अज़ाब देख कर) ईमान लाई तो हमने दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में उनसे रुसवाई का अज़ाब दफा कर दिया और हमने उन्हें एक ख़ास वक्त तक चैन करने दिया
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अनुवाद — यूनुस 96

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Tuesday, August 18, 2026

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