अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- فَلَوْلَا: काश! ऐसा क्यों न हुआ? (यहाँ इसका अर्थ है: ऐसा नहीं हुआ)
- قَرْيَةٌ: बस्ती, बसने वाली जगह (यहाँ अर्थ: बस्ती के निवासी)
- عَذَابَ الْخِزْيِ: अपमान और रुसवाई का अज़ाब
- إِلَىٰ حِينٍ: एक निश्चित समय तक (अर्थात् उनकी मृत्यु के समय तक)
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि पिछली उम्मतों में ऐसा नहीं हुआ कि जब अज़ाब आ चुका हो या उसके आने के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हों, तब किसी बस्ती के लोग ईमान लाए हों और उनका ईमान उन्हें अज़ाब से बचा पाया हो। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) रही है कि जब अज़ाब का वादा पूरा होने लगता है, तो उस समय लाया गया ईमान स्वीकार नहीं होता।
लेकिन इस सामान्य नियम से हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) की क़ौम (बस्ती) को अलग रखा गया। जब उन्होंने अज़ाब के बादलों को अपने सिर पर मंडराते देखा और यक़ीन हो गया कि अल्लाह का अज़ाब आने वाला है, तो उन्होंने सच्चे दिल से तौबा किया, अपने कु़फ़्र और शिर्क से बाज़ आए और अल्लाह की ओर झुक गए। उनकी तौबा सच्ची और सच्चे इरादे पर आधारित थी, इसलिए अल्लाह ने उनसे वह अज़ाब टाल दिया जो उन पर नाज़िल होने वाला था। वह अज़ाब उनके लिए दुनिया में रुसवाई और अपमान का कारण बनता। अल्लाह ने उन्हें दुनिया में जीने का समय दिया और उन्हें उनकी नियत अवधि तक जीवन का आनंद उठाने दिया।
इस आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह की रहमत और माफ़ी का दरवाज़ा तब तक खुला रहता है जब तक अज़ाब वास्तव में नाज़िल न हो जाए। हज़रत यूनुस की क़ौम ने उस आख़िरी पल में सच्ची तौबा की, और अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया, जो उनकी विशेष रहमत थी।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
- अल्लाह की रहमत बहुत विशाल है; वह अपने बंदों के सच्चे पश्चाताप को स्वीकार करता है, चाहे वह कितनी भी देर से क्यों न किया गया हो, जब तक कि अज़ाब सामने न आ जाए।
- तौबा के लिए सच्चा इरादा और दिल की पवित्रता आवश्यक है; दिखावे की तौबा स्वीकार नहीं होती।
- यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की पकड़ से डरें और उसकी रहमत से निराश न हों; दोनों के बीच संतुलन रखें।
- अल्लाह अपने नबियों की उम्मतों पर विशेष कृपा करता है, और उनकी दुआओं और उनकी क़ौम की तौबा को क़बूल करता है।
- यह हमें बताता है कि ईमान और तौबा का सही समय वह है जब अज़ाब न आया हो; अज़ाब आने के बाद ईमान लाना बेकार है। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह की ओर लौटते रहना चाहिए और उसकी इबादत में सच्चे रहना चाहिए।
📜 आयत 96-100 — यूनुस
अनुवाद — यूनुस 98
सूरा यूनुस आयत 98 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : कोई बस्ती ऐसी क्यों न हुई कि ईमान क़ुबूल करती…सूरा आयत 98/109 — यूनुस يونس (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: यूनुस सुनें, यूनुस अनुवाद, यूनुस mp3, यूनुस pdf. आयत 96–100. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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