Falammaa jaaa`a amrunaa najjainaa Saalihanw wal lazeena aamanoo ma`ahoo birahmatim minnaa wa min khizyi Yawmi`iz inna Rabbaka Huwal Qawiyyul `Azeez
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
यही ख़ुदा का वायदा है जो कभी झूठा नहीं होता फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने सालेह और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए थे अपनी मेहरबानी से नजात दी और उस दिन की रुसवाई से बचा लिया इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार ज़बरदस्त ग़ालिब है
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
جب ہمارا حکم آگیا تو ہم نے صالح کو اور جو لوگ ان کے ساتھ ایمان لائے تھے ان کو اپنی مہربانی سے بچالیا۔ اور اس دن کی رسوائی سے (محفوظ رکھا) ۔ بےشک تمہارا پروردگار طاقتور اور زبردست ہے
यही ख़ुदा का वायदा है जो कभी झूठा नहीं होता फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने सालेह और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए थे अपनी मेहरबानी से नजात दी और उस दिन की रुसवाई से बचा लिया इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार ज़बरदस्त ग़ालिब है
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
خِزْيِ – अपमान, रुसवाई, ज़िल्लत
يَوْمِئِذٍ – उस दिन (यानी उस समय जब अज़ाब आया)
الْقَوِيُّ – बहुत ताक़तवर, जिसकी क़ुदरत के आगे कोई नहीं ठहर सकता
الْعَزِيزُ – ग़ालिब, जो कभी हार न खाए, जिसे कोई मात न दे सके
तफ़सीर:
जब हमारा (अल्लाह का) फ़ैसला आया और समूद की क़ौम पर अज़ाब का वक़्त आ पहुँचा, तो हमने अपनी ख़ास रहमत से नबी सालिह (अलैहिस्सलाम) को और उन लोगों को जो उन पर ईमान लाए थे, उस तबाही से नजात दी। यह नजात सिर्फ़ जान बचाने तक ही नहीं थी, बल्कि हमने उन्हें उस दिन की रुसवाई, ज़िल्लत और अपमान से भी बचा लिया, जो काफ़िरों और मुनकिरों पर आई थी। यानी मोमिनीन को दोहरी नजात मिली — एक अज़ाब से, और दूसरी उस शर्मनाक और ज़लील अंजाम से जो झुठलाने वालों का मुक़द्दर बना।
फिर अल्लाह तआला अपने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को तसल्ली देते हुए फ़रमाता है: “ऐ रसूल! तेरा रब ही असली ताक़तवर और ग़ालिब है।” उसकी क़ुदरत के आगे कोई ताक़त नहीं चल सकती। उसी की क़ुदरत का नमूना यह है कि उसने सरकश और सरकश क़ौमों को हलाक कर दिया, और अपने नबियों और उनके साथियों को बचा लिया। यह उसकी क़ुदरत और इज़्ज़त की दलील है।
फ़ायदे:
अल्लाह की रहमत उसके अज़ाब से पहले आती है — जो लोग नबी पर ईमान लाते हैं, उन्हें अल्लाह हर मुसीबत से निकाल लेता है। यह हमारे लिए सबक़ है कि नबी की पैरवी और ईमान ही नजात की कुंजी है।
मोमिन को सिर्फ़ जान बचाने की फ़िक्र नहीं होती, बल्कि अल्लाह उसे इज़्ज़त और आबरू के साथ बचाता है। यानी जो अल्लाह की राह में होता है, उसकी इज़्ज़त अल्लाह ख़ुद महफ़ूज़ रखता है।
अल्लाह की क़ुदरत का यक़ीन हमें सिखाता है कि ज़ालिम कितना भी ताक़तवर क्यों न हो, अल्लाह के आगे उसकी कोई हक़ीक़त नहीं। इसलिए हमें सिर्फ़ अल्लाह से डरना चाहिए और उसी पर भरोसा रखना चाहिए।
यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह अपने नेक बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता — चाहे हालात कितने ही सख़्त क्यों न हों, अल्लाह की मदद उनके साथ होती है। यही हमारे दिलों को सुकून देता है और हमें सब्र और ईमान पर क़ायम रहने की ताक़त देता है।
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
(वरना) फिर तुम्हें फौरन ही (ख़ुदा का) अज़ाब ले डालेगा इस पर भी उन लोगों ने उसकी कूँचे काटकर (मार) डाला तब सालेह ने कहा अच्छा तीन दिन तक (और) अपने अपने घर में चैन (उड़ा लो)
यही ख़ुदा का वायदा है जो कभी झूठा नहीं होता फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने सालेह और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए थे अपनी मेहरबानी से नजात दी और उस दिन की रुसवाई से बचा लिया इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार ज़बरदस्त ग़ालिब है
और ऐसे मर मिटे कि गोया उनमें कभी बसे ही न थे तो देखो क़ौमे समूद ने अपने परवरदिगार की नाफरमानी की और (सज़ा दी गई) सुन रखो कि क़ौमे समूद (उसकी बारगाह से) धुत्कारी हुईहै
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