यूसुफ · 11/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
قَالُوا يَا أَبَانَا مَا لَكَ لَا تَأْمَنَّا عَلَىٰ يُوسُفَ وَإِنَّا لَهُ لَنَاصِحُونَ ۝١١
Qaaloo yaaa abaanaa maa laka laa taamannaa `alaa Yoosufa wa innaa lahoo lanaa sihoon
📖 हिंदी अर्थ
सब ने (याक़ूब से) कहा अब्बा जान आख़िर उसकी क्या वजह है कि आप यूसुफ के बारे में हमारा ऐतबार नहीं करते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَنَاصِحُونَ: हम उसके हितैषी हैं, उसकी भलाई चाहने वाले हैं, उसके प्रति सच्चे इरादे रखने वाले हैं।

तफसीर:

जब हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के भाइयों ने उन्हें उनके पिता से अलग करने की योजना बना ली, तो वे अपने पिता हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) के पास आए और कहने लगे: "ऐ हमारे पिता! आख़िर आपको क्या हो गया है कि आप हमें यूसुफ़ के मामले में भरोसेमंद नहीं समझते? हम तो उसके भाई हैं, उससे सच्चा प्यार करते हैं और उसकी भलाई के अलावा हमें कोई मंशा नहीं है। हम उसकी देखभाल करेंगे, उसे हर नुक़सान से बचाएँगे और उसके साथ पूरी नेकनीयती से पेश आएँगे। हम उसे इसलिए अपने साथ ले जाना चाहते हैं ताकि वह खेल-कूद और खुशी के माहौल में रहे, और हम उसे सुरक्षित आपके पास वापस ले आएँगे।"

भाइयों ने यह बातें कहकर अपने पिता को यक़ीन दिलाने की कोशिश की कि वे यूसुफ़ के सच्चे हितैषी हैं और उनका इरादा बिल्कुल साफ़ है। उन्होंने पिता से सवाल किया कि आख़िर किस वजह से आप हम पर भरोसा नहीं करते? क्या हमने कोई ऐसा काम किया है जिससे आपको हम पर शक हो? यह कहकर उन्होंने अपनी बात को ज़ोर देकर पेश किया और कहा कि हम तो उसके साथ भलाई ही करेंगे और उसकी हर तरह से हिफ़ाज़त करेंगे।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें सबक मिलता है कि इंसान की ज़ुबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता; सच्चाई और झूठ का पता अमल से चलता है। भाइयों ने मीठी बातें कहीं, लेकिन उनके दिल में कुछ और ही था।
  2. हज़रत याक़ूब (अलैहिस्सलाम) की पिता-भरी शफ़्क़त और बच्चों के प्रति उनकी मोहब्बत हमें सिखाती है कि माता-पिता को अपनी औलाद की हिफ़ाज़त और भलाई के लिए हमेशा चौकन्ना रहना चाहिए, भले ही दूसरे कितनी भी अच्छी बातें कहें।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि दूसरों की बातों पर आँख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि समझदारी और परख के साथ फ़ैसला करना चाहिए।
  4. इस क़िस्से से यह भी पता चलता है कि अल्लाह तआला अपने नबियों को मुसीबतों में डालकर उनके सब्र और भरोसे को परखता है, और हर मुसीबत के बाद राहत और कामयाबी अता करता है।


📜 आयत 9-13 — यूसुफ

9اقْتُلُوا يُوسُفَ أَوِ اطْرَحُوهُ أَرْضًا يَخْلُ لَكُمْ وَجْهُ أَبِيكُمْ وَتَكُونُوا مِن بَعْدِهِ قَوْمًا صَالِحِينَ
(ख़ैर तो अब मुनासिब ये है कि या तो) युसूफ को मार डालो या (कम से कम) उसको किसी जगह (चल कर) फेंक आओ तो अलबत्ता तुम्हारे वालिद की तवज्जो सिर्फ तुम्हारी तरफ हो जाएगा और उसके बाद तुम सबके सब (बाप की तवजज्जो से) भले आदमी हो जाओगें
10قَالَ قَائِلٌ مِّنْهُمْ لَا تَقْتُلُوا يُوسُفَ وَأَلْقُوهُ فِي غَيَابَتِ الْجُبِّ يَلْتَقِطْهُ بَعْضُ السَّيَّارَةِ إِن كُنتُمْ فَاعِلِينَ
उनमें से एक कहने वाला बोल उठा कि यूसुफ को जान से तो न मारो हाँ अगर तुमको ऐसा ही करना है तो उसको किसी अन्धे कुएँ में (ले जाकर) डाल दो कोई राहगीर उसे निकालकर ले जाएगा (और तुम्हारा मतलब हासिल हो जाएगा)
11قَالُوا يَا أَبَانَا مَا لَكَ لَا تَأْمَنَّا عَلَىٰ يُوسُفَ وَإِنَّا لَهُ لَنَاصِحُونَ
सब ने (याक़ूब से) कहा अब्बा जान आख़िर उसकी क्या वजह है कि आप यूसुफ के बारे में हमारा ऐतबार नहीं करते
12أَرْسِلْهُ مَعَنَا غَدًا يَرْتَعْ وَيَلْعَبْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
हालॉकि हम लोग तो उसके ख़ैर ख्वाह (भला चाहने वाले) हैं आप उसको कुल हमारे साथ भेज दीजिए कि ज़रा (जंगल) से फल वगैरह् खाए और खेले कूदे
13قَالَ إِنِّي لَيَحْزُنُنِي أَن تَذْهَبُوا بِهِ وَأَخَافُ أَن يَأْكُلَهُ الذِّئْبُ وَأَنتُمْ عَنْهُ غَافِلُونَ
और हम लोग तो उसके निगेहबान हैं ही याक़ूब ने कहा तुम्हारा उसको ले जाना मुझे सख्त सदमा पहुँचाना है और मै तो इससे डरता हूँ कि तुम सब के सब उससे बेख़बर हो जाओ और (मुबादा) उसे भेड़िया फाड़ खाए
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अनुवाद — यूसुफ 11

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Tuesday, August 18, 2026

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