इब्राहीम · 29/52
अनुवाद उच्चारण — इब्राहीम
جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا ۖ وَبِئْسَ الْقَرَارُ ۝٢٩
Jahannama yaslawnahaa wa bi`sal qaraar
📖 हिंदी अर्थ
कि सबके सब जहन्नुम वासिल होगें और वह (क्या) बुरा ठिकाना है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَصْلَوْنَهَا: इसमें प्रवेश करेंगे और इसकी गर्मी (आग) की पीड़ा को भोगेंगे।
  • الْقَرَار: ठहरने की जगह, निवास स्थान।

व्याख्या:

यह आयत उन काफिरों के अंतिम परिणाम को बयान कर रही है, जिन्होंने अल्लाह की नेमतों के बदले कुफ्र को चुना और अपने अनुयायियों को विनाश के घर की ओर ले गए। उनका ठिकाना जहन्नुम (नरक) है, जिसमें वे प्रवेश करेंगे और उसकी भयंकर आग की गर्मी को अपने शरीर से महसूस करेंगे। यह आग उन्हें हर तरफ से घेर लेगी, और वे इससे बचने का कोई रास्ता नहीं पाएँगे। अल्लाह ने इस स्थान को "बुरा ठिकाना" कहकर स्पष्ट कर दिया कि यह ठहरने की दृष्टि से सबसे खराब जगह है—न वहाँ आराम है, न राहत, न कोई सुख-चैन। यह उनके कर्मों का सटीक बदला है, क्योंकि उन्होंने सत्य को अस्वीकार किया और अपने लिए यही स्थान चुना।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. यह आयत हमें अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करने की सीख देती है, क्योंकि नेमतों को नकारने का अंजाम विनाश है।
  2. नरक का वर्णन सुनकर हर मुसलमान को अपने आचरण की समीक्षा करनी चाहिए और अल्लाह की रहमत की ओर लौटना चाहिए।
  3. यह जानना कि नरक एक वास्तविक स्थान है, हमें गुनाहों से बचने और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा देता है।
  4. अल्लाह का न्याय पूर्ण है—जो सत्य को ठुकराकर गुमराही अपनाते हैं, उनके लिए बुरा ठिकाना ही उचित है। यह हमें सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहने की ताकत देता है।
  5. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि दुनिया की अस्थायी सुख-सुविधाओं के लिए आख़िरत की स्थायी भलाई को नहीं बेचना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 27-31 — इब्राहीम

27يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ ۖ وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ ۚ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ
जो लोग पक्की बात (कलमा तौहीद) पर (सदक़ दिल से ईमान ला चुके उनको ख़ुदा दुनिया की ज़िन्दगी में भी साबित क़दम रखता है और आख़िरत में भी साबित क़दम रखेगा (और) उन्हें सवाल व जवाब में कोई वक्त न होगा और सरकशों को ख़ुदा गुमराही में छोड़ देता है और ख़ुदा जो चाहता है करता है
28۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ بَدَّلُوا نِعْمَتَ اللَّهِ كُفْرًا وَأَحَلُّوا قَوْمَهُمْ دَارَ الْبَوَارِ
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों के हाल पर ग़ौर नहीं किया जिन्होंने मेरे एहसान के बदले नाशुक्री की एख्तियार की और अपनी क़ौम को हलाकत के घरवाहे (जहन्नुम) में झोंक दिया
29جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا ۖ وَبِئْسَ الْقَرَارُ
कि सबके सब जहन्नुम वासिल होगें और वह (क्या) बुरा ठिकाना है
30وَجَعَلُوا لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلُّوا عَن سَبِيلِهِ ۗ قُلْ تَمَتَّعُوا فَإِنَّ مَصِيرَكُمْ إِلَى النَّارِ
और वह लोग दूसरो को ख़ुदा का हमसर (बराबर) बनाने लगे ताकि (लोगों को) उसकी राह से बहका दे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (ख़ैर चन्द रोज़ तो) चैन कर लो फिर तो तुम्हें दोज़ख की तरफ लौट कर जाना ही है
31قُل لِّعِبَادِيَ الَّذِينَ آمَنُوا يُقِيمُوا الصَّلَاةَ وَيُنفِقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا بَيْعٌ فِيهِ وَلَا خِلَالٌ
(ऐ रसूल) मेरे वह बन्दे जो ईमान ला चुके उन से कह दो कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से (ख़ुदा की राह में) छिपाकर या दिखा कर ख़र्च किया करे उस दिन (क़यामत) के आने से पहल जिसमें न तो (ख़रीदो) फरोख्त ही (काम आएगी) न दोस्ती मोहब्बत काम (आएगी)
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अनुवाद — इब्राहीम 29

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Tuesday, August 18, 2026

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