अल-हिज्र · 57/99
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-हिज्र
قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ ۝٥٧
Qaala famaa khatbukum aiyuhal mursaloon
📖 हिंदी अर्थ
(फिर) इबराहीम ने कहा ऐ (ख़ुदा के) भेजे हुए (फरिश्तों) तुम्हें आख़िर क्या मुहिम दर पेश है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • خَطْبُكُمْ: तुम्हारा मामला, तुम्हारा कार्य, या वह महत्वपूर्ण विषय जिसके लिए तुम आए हो।
  • الْمُرْسَلُونَ: भेजे गए (फ़रिश्ते), जो अल्लाह की ओर से किसी कार्य से भेजे गए हों।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपने मेहमान फ़रिश्तों से कहा कि "मुझे तुमसे डर लग रहा है," तो फ़रिश्तों ने उन्हें आश्वस्त किया और उन्हें अल्लाह की ओर से दो शुभ सूचनाएँ दीं: एक यह कि उन्हें एक बुद्धिमान पुत्र (हज़रत इस्हाक़) मिलेगा, और दूसरी यह कि वे क़ौम-ए-लूत (अलैहिस्सलाम) को सज़ा देने के लिए भेजे गए हैं। इसके बाद हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने उनसे पूछा: "तो फिर तुम्हारा मामला क्या है, ऐ अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्तों?" यानी तुम्हारे आने का असली कारण और उद्देश्य क्या है? यह प्रश्न उन्होंने इसलिए किया ताकि वे उनके आने के मक़सद को स्पष्ट रूप से जान सकें, क्योंकि शुभ सूचना के अलावा भी उनके पास कोई और महत्वपूर्ण कार्य हो सकता था। फ़रिश्तों ने जवाब में बताया कि वे एक अपराधी क़ौम (क़ौम-ए-लूत) को सज़ा देने के लिए भेजे गए हैं। यह प्रश्न उनके अदब और शिष्टाचार को दर्शाता है, कि उन्होंने फ़रिश्तों से उनके कार्य के बारे में पूछा, न कि उनके रहस्यों में दखल दिया।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह के फ़रिश्तों का सम्मान: हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का फ़रिश्तों से इस तरह पूछना सिखाता है कि अल्लाह के भेजे हुए फ़रिश्तों और उनके कार्यों का आदर करना चाहिए, और उनसे अच्छे अंदाज़ में बात करनी चाहिए।
  2. शुभ सूचना के बाद भी सवाल: यह दर्शाता है कि इंसान को अल्लाह की रहमत और शुभ सूचनाओं पर खुश होना चाहिए, लेकिन साथ ही उसे अल्लाह के फ़ैसलों और उसके कार्यों के बारे में जानने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि उसका विश्वास और मज़बूत हो।
  3. निराशा से बचना: इस आयत से पहले हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने कहा था कि "अल्लाह की रहमत से केवल गुमराह लोग ही निराश होते हैं।" यह सिखाता है कि मुसलमान को कभी भी अल्लाह की रहमत से निराश नहीं होना चाहिए, चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों।
  4. अल्लाह के कार्यों में हिकमत: फ़रिश्तों का क़ौम-ए-लूत को सज़ा देने के लिए भेजा जाना यह दर्शाता है कि अल्लाह हर काम हिकमत (बुद्धिमत्ता) के साथ करता है, और उसके फ़ैसले न्याय और अदल पर आधारित होते हैं।


📜 आयत 55-59 — सूरा अल-हिज्र

55قَالُوا بَشَّرْنَاكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُن مِّنَ الْقَانِطِينَ
तो फिर अब काहे की खुशख़बरी देते हो वह फरिश्ते बोले हमने आप को बिल्कुल ठीक खुशख़बरी दी है तो आप (बारगाह ख़ुदा बन्दी से) ना उम्मीद न हो
56قَالَ وَمَن يَقْنَطُ مِن رَّحْمَةِ رَبِّهِ إِلَّا الضَّالُّونَ
इबराहीम ने कहा गुमराहों के सिवा और ऐसा कौन है जो अपने परवरदिगार की रहमत से ना उम्मीद हो
57قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ
(फिर) इबराहीम ने कहा ऐ (ख़ुदा के) भेजे हुए (फरिश्तों) तुम्हें आख़िर क्या मुहिम दर पेश है
58قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمٍ مُّجْرِمِينَ
उन्होंने कहा कि हम तो एक गुनाहगार क़ौम की तरफ (अज़ाब नाज़िल करने के लिए) भेजे गए हैं
59إِلَّا آلَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ
मगर लूत के लड़के वाले कि हम उन सबको ज़रुर बचा लेगें मगर उनकी बीबी जिसे हमने ताक लिया है
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अनुवाद — अल-हिज्र 57

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Monday, September 7, 2026

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