अन-नहल · 77/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلِلَّهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَمَا أَمْرُ السَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ الْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ ۝٧٧
Wa lillaahi ghaibus samaawaati wal ard; wa maaa amrus Saa`ati illaa kalamhil basari aw huwa aqrab; innal laaha `alaaa kulli shai`in Qadeer
📖 हिंदी अर्थ
और सारे आसमान व ज़मीन की ग़ैब की बातें ख़ुदा ही के लिए मख़सूस हैं और ख़ुदा क़यामत का वाकेए होना तो ऐसा है जैसे पलक का झपकना बल्कि इससे भी जल्दी बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ुदरत कामेला रखता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ: आकाशों और धरती की छिपी हुई बातें, जो किसी सृष्टि को ज्ञात नहीं।
  • أَمْرُ السَّاعَةِ: क़ियामत के आने का मामला।
  • كَلَمْحِ الْبَصَرِ: आँख के झपकने जितनी तेज़ी से, यानी पलक झपकने की अवधि में।
  • أَقْرَبُ: उससे भी अधिक निकट।

तफ़सीर:

यह आयत अल्लाह तआला के असीम ज्ञान और उसकी पूर्ण शक्ति को बयान करती है। अल्लाह ही अकेला है जो आकाशों और धरती के सारे छिपे रहस्यों और अनदेखी चीज़ों का ज्ञान रखता है। उसके सिवा कोई भी इन ग़ैबी बातों को नहीं जानता। फिर अल्लाह तआला क़ियामत के आने के मामले का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि जब वह क़ियामत लाने का इरादा करता है, तो उसका आना आँख के झपकने जितनी तेज़ी से होता है, बल्कि उससे भी ज़्यादा तेज़ और निकट होता है। यानी जिस पल अल्लाह चाहे, क़ियामत आ जाएगी; उसमें कोई देरी या रुकावट नहीं। यह बात इसलिए कही गई कि लोग क़ियामत के आने को दूर और असंभव समझते थे, जबकि अल्लाह की क़ुदरत के आगे हर चीज़ मुमकिन है। अल्लाह हर चीज़ पर पूर्ण सामर्थ्य रखता है; जब वह किसी चीज़ का इरादा करता है, तो उससे कहता है "हो जा", और वह हो जाती है। यह आयत उस समय नाज़िल हुई जब लोगों ने रसूलुल्लाह ﷺ से क़ियामत के समय के बारे में पूछा, तो अल्लाह ने बताया कि उसका ज्ञान केवल अल्लाह के पास है, और उसका आना अल्लाह के लिए बेहद आसान है।

फ़ायदे:

  • इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि अल्लाह का ज्ञान असीमित है; वह हर छिपी चीज़ से वाक़िफ़ है, इसलिए हमें उसी पर भरोसा रखना चाहिए और उसी से डरना चाहिए।
  • क़ियामत का आना अल्लाह के लिए बेहद आसान है, इसलिए हमें हर वक़्त उसके लिए तैयार रहना चाहिए और अपने आख़िरत को संवारने की कोशिश करनी चाहिए।
  • अल्लाह की क़ुदरत हर चीज़ पर हावी है; जब वह कुछ चाहता है, तो वह तुरंत हो जाता है। इससे मुसलमान के दिल में अल्लाह की अज़मत और उसकी ताक़त का एहसास बढ़ता है और वह अपने जीवन को उसकी रज़ा के अनुसार ढालने की कोशिश करता है।
  • यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि ग़ैब का ज्ञान केवल अल्लाह को है, इसलिए हमें उन बातों में नहीं पड़ना चाहिए जो हमारे इल्म से बाहर हैं, बल्कि अपने कर्तव्यों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 75-79 — अन-नहल

75۞ ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا عَبْدًا مَّمْلُوكًا لَّا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَمَن رَّزَقْنَاهُ مِنَّا رِزْقًا حَسَنًا فَهُوَ يُنفِقُ مِنْهُ سِرًّا وَجَهْرًا ۖ هَلْ يَسْتَوُونَ ۚ الْحَمْدُ لِلَّهِ ۚ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
एक मसल ख़ुदा ने बयान फरमाई कि एक ग़ुलाम है जो दूसरे के कब्जे में है (और) कुछ भी एख्तियार नहीं रखता और एक शख़्श वह है कि हमने उसे अपनी बारगाह से अच्छी (खासी) रोज़ी दे रखी है तो वह उसमें से छिपा के दिखा के (ग़रज़ हर तरह ख़ुदा की राह में) ख़र्च करता है क्या ये दोनो बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं) अल्हमदोलिल्लाह (कि वह भी उसके मुक़र्रर हैं) मगर उनके बहुतेरे (इतना भी) नहीं जानते
76وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا رَّجُلَيْنِ أَحَدُهُمَا أَبْكَمُ لَا يَقْدِرُ عَلَىٰ شَيْءٍ وَهُوَ كَلٌّ عَلَىٰ مَوْلَاهُ أَيْنَمَا يُوَجِّههُّ لَا يَأْتِ بِخَيْرٍ ۖ هَلْ يَسْتَوِي هُوَ وَمَن يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ ۙ وَهُوَ عَلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
और ख़ुदा एक दूसरी मसल बयान फरमाता है दो आदमी हैं कि एक उनमें से बिल्कुल गूँगा उस पर गुलाम जो कुछ भी (बात वग़ैरह की) कुदरत नहीं रखता और (इस वजह से) वह अपने मालिक को दूभर हो रहा है कि उसको जिधर भेजता है (ख़ैर से) कभी भलाई नहीं लाता क्या ऐसा ग़ुलाम और वह शख़्श जो (लोगों को) अदल व मियाना रवी का हुक्म करता है वह खुद भी ठीक सीधी राह पर क़ायम है (दोनों बराबर हो सकते हैं (हरगिज़ नहीं)
77وَلِلَّهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَمَا أَمْرُ السَّاعَةِ إِلَّا كَلَمْحِ الْبَصَرِ أَوْ هُوَ أَقْرَبُ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
और सारे आसमान व ज़मीन की ग़ैब की बातें ख़ुदा ही के लिए मख़सूस हैं और ख़ुदा क़यामत का वाकेए होना तो ऐसा है जैसे पलक का झपकना बल्कि इससे भी जल्दी बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ुदरत कामेला रखता है
78وَاللَّهُ أَخْرَجَكُم مِّن بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ لَا تَعْلَمُونَ شَيْئًا وَجَعَلَ لَكُمُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَالْأَفْئِدَةَ ۙ لَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
और ख़ुदा ही ने तुम्हें तुम्हारी माओं के पेट से निकाला (जब) तुम बिल्कुल नासमझ थे और तुम को कान दिए और ऑंखें (अता की) दिल (इनायत किए) ताकि तुम शुक्र करो
79أَلَمْ يَرَوْا إِلَى الطَّيْرِ مُسَخَّرَاتٍ فِي جَوِّ السَّمَاءِ مَا يُمْسِكُهُنَّ إِلَّا اللَّهُ ۗ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
क्या उन लोगों ने परिन्दों की तरफ ग़ौर नहीं किया जो आसमान के नीचे हवा में घिरे हुए (उड़ते रहते हैं) उनको तो बस ख़ुदा ही (गिरने से ) रोकता है बेशक इसमें भी (कुदरते ख़ुदा की) ईमानदारों के लिए बहुत सी निशानियाँ हैं
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अनुवाद — अन-नहल 77

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Tuesday, August 18, 2026

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