Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- लग़्व (اللَّغْو): वह व्यर्थ और बेकार बात जिसका कोई इरादा न हो, बोलते समय ज़बान से निकल जाने वाला शब्द।
- युअाख़िज़ुकुम (يُؤَاخِذُكُم): वह तुम्हें पकड़ेगा, हिसाब लेगा, सज़ा देगा।
- कसबत (كَسَبَتْ): कमाया, इरादा किया, नीयत की।
- हलीम (حَلِيم): बहुत सहनशील, जल्दी सज़ा न देने वाला।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला अपने बंदों पर बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला है। वह उन क़समों पर तुम्हें पकड़ नहीं करता जो तुम्हारी ज़बान से बिना किसी इरादे के निकल जाती हैं—जैसे किसी की आदत हो जाती है कि बातचीत में "नहीं, अल्लाह की क़सम!" या "हाँ, अल्लाह की क़सम!" कह देता है, जबकि उसका दिल उस क़सम का इरादा नहीं रखता। ऐसी लापरवाही से निकली हुई क़समों पर न तो कोई सज़ा है और न ही कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित)।
लेकिन अल्लाह उस क़सम पर ज़रूर पकड़ करता है जो तुम्हारे दिल से निकले—यानी जब तुम जान-बूझकर, इरादे से कोई क़सम खाओ और फिर उसे तोड़ो, तो उसका हिसाब होगा। असल में अल्लाह के नज़दीक ज़बान नहीं, बल्कि दिल का इरादा और नीयत मायने रखती है। जो बात दिल से निकले और उस पर तुम्हारा पक्का इरादा हो, उसी की ज़िम्मेदारी तुम पर होगी।
और अल्लाह ग़फ़ूर है—अपने बंदों के गुनाहों को माफ़ करने वाला, और हलीम है—बहुत सहनशील, वह जल्दी में सज़ा नहीं देता, बल्कि तौबा करने का मौक़ा देता है और अपनी रहमत से बंदों को ढक लेता है।
फ़ायदे और सीख:
- अल्लाह की रहमत की ख़ुशख़बरी: यह आयत मुसलमानों को बड़ी राहत देती है कि अल्लाह हर छोटी ग़लती पर पकड़ नहीं करता। वह बंदों की कमज़ोरियों को जानता है और उन पर रहम करता है।
- नीयत की अहमियत: इस्लाम में हर अमल का दारोमदार नीयत पर है। अल्लाह के यहाँ वही चीज़ क़ीमती है जो दिल से निकले। यह हमें सिखाता है कि हम अपने दिलों को साफ़ रखें और हर काम सोच-समझकर, इरादे से करें।
- ज़बान की हिफ़ाज़त: हालाँकि लापरवाही से निकली क़सम पर पकड़ नहीं, लेकिन यह हमें सिखाता है कि ज़बान को संभालकर रखें और अल्लाह का नाम व्यर्थ में न लें। अल्लाह का नाम लेना एक बड़ी इबादत है, उसे आम बातचीत का ज़रिया न बनाएँ।
- अल्लाह की सहनशीलता: अल्लाह जल्दी सज़ा नहीं देता। वह बंदे को मौक़ा देता है कि वह तौबा करे और अपनी ग़लती सुधारे। यह हमें सिखाता है कि हम भी लोगों के साथ सहनशीलता से पेश आएँ और उनकी ग़लतियों पर जल्दी सख़्ती न करें।
- तौबा का दरवाज़ा हमेशा खुला: आयत के आख़िर में "ग़फ़ूर" और "हलीम" का ज़िक्र इस बात की तरफ़ इशारा है कि चाहे कितनी ही ग़लती हो जाए, अल्लाह की रहमत उम्मीद से बड़ी है। बंदे को कभी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि हमेशा अल्लाह की तरफ़ पलटना चाहिए।
📜 आयत 223-227 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 225
सूरा अल-बकरा आयत 225 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तुम्हारी लग़ो (बेकार) क़समों पर जो बेइख्तेयार ज़बान से निकल…सूरा आयत 225/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 223–227. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Wednesday, September 30, 2026
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