अल-बकरा · 270/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَمَا أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُهُ ۗ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ ۝٢٧٠
Wa maaa anfaqtum min nafaqatin aw nazartum min nazrin fa innal laaha ya`lamuh; wa maa lizzaalimeena min ansaar
📖 हिंदी अर्थ
और तुम जो कुछ भी ख़र्च करो या कोई मन्नत मानो ख़ुदा उसको ज़रूर जानता है और (ये भी याद रहे) कि ज़ालिमों का (जो) ख़ुदा का हक़ मार कर औरों की नज़्र करते हैं (क़यामत में) कोई मददगार न होगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَفَقَة (नफ़क़ा): खर्च किया गया धन, चाहे वह थोड़ा हो या अधिक, जो अल्लाह की राह में दिया जाए।
  • نَذْر (नज़्र): वह चीज़ जो इंसान अपने ऊपर अनिवार्य कर ले, जैसे कोई अच्छा काम या दान जो अल्लाह के लिए करने का संकल्प लिया जाए।
  • ظَالِمِين (ज़ालिमीन): अत्याचारी, वे लोग जो अल्लाह के हुक्मों का उल्लंघन करते हैं और हक़ (अधिकार) को दबाते हैं।
  • أَنصَار (अंसार): मददगार, सहायक, वे लोग जो किसी की मदद करें या उसे बचाएँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में बताते हैं कि तुमने जो भी खर्च किया—चाहे वह थोड़ा हो या बहुत, चाहे वह अल्लाह की राह में दिया गया हो या किसी और मक़सद के लिए—और जो भी नज़्र (मन्नत) तुमने अपने ऊपर लाज़िम की हो, चाहे वह अच्छे काम के लिए हो या बुरे के लिए, अल्लाह उसे पूरी तरह जानता है। वह हर चीज़ से बाख़बर है, चाहे वह छिपी हो या खुली। अल्लाह के इल्म से कोई चीज़ बाहर नहीं है, और वह हर अच्छे काम का बदला देगा और हर बुरे काम की सज़ा भी देगा।

इस आयत में एक बड़ी चेतावनी भी है: जो लोग अल्लाह के हुक्मों का उल्लंघन करते हैं, अपने धन को ग़लत जगह खर्च करते हैं, या अल्लाह के हक़ (जैसे ज़कात, सदक़ा) को रोकते हैं, वे ज़ालिम हैं। ऐसे ज़ालिमों के लिए क़ियामत के दिन कोई मददगार नहीं होगा जो उन्हें अल्लाह के अज़ाब से बचा सके। उनके पास न कोई सिफ़ारिशी होगा और न कोई सहायक।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. अल्लाह का इल्म हर चीज़ पर हावी है: यह आयत हमें यक़ीन दिलाती है कि हमारा हर छोटा-बड़ा खर्च, हर नेकी और हर बुराई अल्लाह के इल्म में है। यह हमें अच्छे कामों पर उभारता है क्योंकि हम जानते हैं कि हमारी कोई नेकी बेकार नहीं जाएगी।
  2. नियत की अहमियत: खर्च करने में नियत का बड़ा दरजा है। अगर हम अल्लाह की रज़ा के लिए खर्च करेंगे, तो उसका अज्र मिलेगा, और अगर दिखावे या बुरे मक़सद से खर्च करेंगे, तो उसका हिसाब होगा। यह हमें सिखाता है कि हर अमल में नियत को सही रखें।
  3. ज़ालिमों के लिए कोई मदद नहीं: यह आयत हमें ज़ुल्म से बचाती है और बताती है कि जो लोग अल्लाह के हुक्मों की खिलाफ़वर्ज़ी करते हैं, वे अंजाम में अकेले होंगे। कोई उनकी मदद नहीं करेगा। यह हमें इंसाफ़ और हक़ पर चलने की तरग़ीब देती है।
  4. अल्लाह पर भरोसा: जब हम जानते हैं कि अल्लाह हमारे हर अच्छे काम को देखता है और उसका बदला देगा, तो हमारा दिल अल्लाह पर भरोसा करता है और हम नेकी पर साबित क़दम रहते हैं। यह हमें इस्लाम की मुहब्बत और अल्लाह की रहमत की तरफ़ ले जाता है।


📜 आयत 268-272 — अल-बकरा

268الشَّيْطَانُ يَعِدُكُمُ الْفَقْرَ وَيَأْمُرُكُم بِالْفَحْشَاءِ ۖ وَاللَّهُ يَعِدُكُم مَّغْفِرَةً مِّنْهُ وَفَضْلًا ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
शैतान तमुको तंगदस्ती से डराता है और बुरी बात (बुख्ल) का तुमको हुक्म करता है और ख़ुदा तुमसे अपनी बख्शिश और फ़ज़ल (व करम) का वायदा करता है और ख़ुदा बड़ी गुन्जाइश वाला और सब बातों का जानने वाला है
269يُؤْتِي الْحِكْمَةَ مَن يَشَاءُ ۚ وَمَن يُؤْتَ الْحِكْمَةَ فَقَدْ أُوتِيَ خَيْرًا كَثِيرًا ۗ وَمَا يَذَّكَّرُ إِلَّا أُولُو الْأَلْبَابِ
वह जिसको चाहता है हिकमत अता फ़रमाता है और जिसको (ख़ुदा की तरफ) से हिकमत अता की गई तो इसमें शक नहीं कि उसे ख़ूबियों से बड़ी दौलत हाथ लगी और अक्लमन्दों के सिवा कोई नसीहत मानता ही नहीं
270وَمَا أَنفَقْتُم مِّن نَّفَقَةٍ أَوْ نَذَرْتُم مِّن نَّذْرٍ فَإِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُهُ ۗ وَمَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ أَنصَارٍ
और तुम जो कुछ भी ख़र्च करो या कोई मन्नत मानो ख़ुदा उसको ज़रूर जानता है और (ये भी याद रहे) कि ज़ालिमों का (जो) ख़ुदा का हक़ मार कर औरों की नज़्र करते हैं (क़यामत में) कोई मददगार न होगा
271إِن تُبْدُوا الصَّدَقَاتِ فَنِعِمَّا هِيَ ۖ وَإِن تُخْفُوهَا وَتُؤْتُوهَا الْفُقَرَاءَ فَهُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ وَيُكَفِّرُ عَنكُم مِّن سَيِّئَاتِكُمْ ۗ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
अगर ख़ैरात को ज़ाहिर में दो तो यह (ज़ाहिर करके देना) भी अच्छा है और अगर उसको छिपाओ और हाजतमन्दों को दो तो ये छिपा कर देना तुम्हारे हक़ में ज्यादा बेहतर है और ऐसे देने को ख़ुदा तुम्हारे गुनाहों का कफ्फ़ारा कर देगा और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा उससे ख़बरदार है
272۞ لَّيْسَ عَلَيْكَ هُدَاهُمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۗ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ فَلِأَنفُسِكُمْ ۚ وَمَا تُنفِقُونَ إِلَّا ابْتِغَاءَ وَجْهِ اللَّهِ ۚ وَمَا تُنفِقُوا مِنْ خَيْرٍ يُوَفَّ إِلَيْكُمْ وَأَنتُمْ لَا تُظْلَمُونَ
ऐ रसूल उनका मंज़िले मक़सूद तक पहुंचाना तुम्हारा काम नहीं (तुम्हारा काम सिर्फ रास्ता दिखाना है) मगर हॉ ख़ुदा जिसको चाहे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे और (लोगों) तुम जो कुछ नेक काम में ख़र्च करोगे तो अपने लिए और तुम ख़ुदा की ख़ुशनूदी के सिवा और काम में ख़र्च करते ही नहीं हो (और जो कुछ तुम नेक काम में ख़र्च करोगे) (क़यामत में) तुमको भरपूर वापस मिलेगा और तुम्हारा हक़ न मारा जाएगा
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अनुवाद — अल-बकरा 270

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Tuesday, August 18, 2026

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