अल-बकरा · 90/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ فَبَاءُوا بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ ۝٩٠
Bi`samash taraw biheee anfusahum ai yakfuroo bimaaa anzalal laahu baghyan ai yunazzilal laahu min fadlilhee `alaa mai yashaaa`u min ibaadihee fabaaa`oo bighadabin `alaa ghadab; wa lilkaafireena `azaabum muheen
📖 हिंदी अर्थ
क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में (इतनी बात पर) वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि खुदा अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाज़िल किया करे इस रश्क से जो कुछ खुदा ने नाज़िल किया है सबका इन्कार कर बैठे पस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफ़िरों के लिए (बड़ी) रूसवाई का अज़ाब है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ: कितना बुरा है वह जिसे उन्होंने अपने प्राणों के बदले खरीदा, अर्थात् उन्होंने अपने लिए बुरा सौदा चुना।
  • بَغْيًا: अत्याचार और ईर्ष्या के कारण।
  • فَبَاءُوا: वे लौटे, अर्थात् वे (अपने कर्मों का परिणाम) लेकर लौटे।
  • بِغَضَبٍ عَلَى غَضَبٍ: क्रोध पर क्रोध, अर्थात् दोहरा क्रोध।
  • عَذَابٌ مُّهِينٌ: अपमानित करने वाला, ज़लील करने वाला दंड।

व्याख्या:

यह आयत बनी इस्राईल (यहूदियों) के उस कुकर्म की निंदा करती है जब उन्होंने अल्लाह द्वारा उतारी गई चीज़ (क़ुरआन) को अस्वीकार किया। उन्होंने अपने लिए बहुत बुरा सौदा चुना—उन्होंने ईमान के बदले कुफ़्र को खरीद लिया। उनका यह कृत्य केवल ईर्ष्या और अत्याचार पर आधारित था, क्योंकि अल्लाह ने अपनी कृपा (नबुव्वत और क़ुरआन) अपने जिस बंदे (मुहम्मद ﷺ) पर चाहा, उतारी। यह बात उन्हें बर्दाश्त नहीं हुई कि नबुव्वत उनके अलावा किसी और को मिल जाए।

इस कारण वे अल्लाह के क्रोध पर क्रोध लेकर लौटे—पहला क्रोध उनके तौरात को बदलने और उसमें हेरफेर करने के कारण था, और दूसरा क्रोध मुहम्मद ﷺ पर ईमान न लाने के कारण। उन्होंने अपने पिछले अपराधों पर एक और बड़ा अपराध जोड़ लिया। ऐसे काफ़िरों के लिए, जो अल्लाह की आयतों और अपने रसूल को झुठलाते हैं, क़ियामत के दिन अपमानजनक और ज़लील करने वाला दंड तैयार है, जिसमें वे हमेशा रहेंगे।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. ईर्ष्या (हसद) एक ऐसी बीमारी है जो इंसान को अल्लाह की स्पष्ट आयतों को भी अस्वीकार करने पर उतारू कर देती है। इसलिए हमें ईर्ष्या से बचना चाहिए और अल्लाह के फैसलों पर संतुष्ट रहना चाहिए।
  2. अल्लाह अपनी कृपा (नबुव्वत, ज्ञान, धन आदि) जिसे चाहता है, देता है। किसी को यह अधिकार नहीं कि वह अल्लाह की बंदगी में चयन पर आपत्ति करे।
  3. पापों का बार-बार किया जाना अल्लाह के क्रोध को बढ़ाता है। पहले पाप पर पछतावा न करना और फिर दूसरा पाप करना दोहरे क्रोध का कारण बनता है।
  4. कुफ़्र और अवज्ञा का परिणाम अपमानजनक दंड है, जबकि ईमान और आज्ञाकारिता का परिणाम सम्मान और सफलता है। अतः हमें सदैव अल्लाह की राह पर चलना चाहिए।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अपने जीवन का सबसे अच्छा सौदा करना चाहिए—ईमान और नेक कर्मों को चुनना चाहिए, न कि कुफ़्र और पापों को, क्योंकि यही सच्ची भलाई है।
🎧 सुनें

📜 आयत 88-92 — अल-बकरा

88وَقَالُوا قُلُوبُنَا غُلْفٌ ۚ بَل لَّعَنَهُمُ اللَّهُ بِكُفْرِهِمْ فَقَلِيلًا مَّا يُؤْمِنُونَ
और कहने लगे कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ चढ़ा हुआ है (ऐसा नहीं) बल्कि उनके कुफ्र की वजह से खुदा ने उनपर लानत की है पस कम ही लोग ईमान लाते हैं
89وَلَمَّا جَاءَهُمْ كِتَابٌ مِّنْ عِندِ اللَّهِ مُصَدِّقٌ لِّمَا مَعَهُمْ وَكَانُوا مِن قَبْلُ يَسْتَفْتِحُونَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَمَّا جَاءَهُم مَّا عَرَفُوا كَفَرُوا بِهِ ۚ فَلَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الْكَافِرِينَ
और जब उनके पास खुदा की तरफ़ से किताब (कुरान आई और वह उस किताब तौरेत) की जो उन के पास तसदीक़ भी करती है। और उससे पहले (इसकी उम्मीद पर) काफ़िरों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे पस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन्कार करने पस काफ़िरों पर खुदा की लानत है
90بِئْسَمَا اشْتَرَوْا بِهِ أَنفُسَهُمْ أَن يَكْفُرُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ بَغْيًا أَن يُنَزِّلَ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ ۖ فَبَاءُوا بِغَضَبٍ عَلَىٰ غَضَبٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ
क्या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में (इतनी बात पर) वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि खुदा अपने बन्दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाज़िल किया करे इस रश्क से जो कुछ खुदा ने नाज़िल किया है सबका इन्कार कर बैठे पस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफ़िरों के लिए (बड़ी) रूसवाई का अज़ाब है
91وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ قَالُوا نُؤْمِنُ بِمَا أُنزِلَ عَلَيْنَا وَيَكْفُرُونَ بِمَا وَرَاءَهُ وَهُوَ الْحَقُّ مُصَدِّقًا لِّمَا مَعَهُمْ ۗ قُلْ فَلِمَ تَقْتُلُونَ أَنبِيَاءَ اللَّهِ مِن قَبْلُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
और जब उनसे कहा गया कि (जो क़ुरान) खुदा ने नाज़िल किया है उस पर ईमान लाओ तो कहने लगे कि हम तो उसी किताब (तौरेत) पर ईमान लाए हैं जो हम पर नाज़िल की गई थी और उस किताब (कुरान) को जो उसके बाद आई है नहीं मानते हैं हालाँकि वह (क़ुरान) हक़ है और उस किताब (तौरेत) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करती है मगर उस किताब कुरान का जो उसके बाद आई है इन्कार करते हैं (ऐ रसूल) उनसे ये तो पूछो कि तुम (तुम्हारे बुर्जुग़) अगर ईमानदार थे तो फिर क्यों खुदा के पैग़म्बरों का साबिक़ क़त्ल करते थे
92۞ وَلَقَدْ جَاءَكُم مُّوسَىٰ بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ اتَّخَذْتُمُ الْعِجْلَ مِن بَعْدِهِ وَأَنتُمْ ظَالِمُونَ
और तुम्हारे पास मूसा तो वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ ही चुके थे फिर भी तुमने उनके बाद बछड़े को खुदा बना ही लिया और उससे तुम अपने ही ऊपर ज़ुल्म करने वाले थे
अल-बकराकुरान सूची
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मदनीRevelation
90आयत

अनुवाद — अल-बकरा 90

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Tuesday, August 18, 2026

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