ताहा · 134/135
अनुवाद उच्चारण — ताहा
وَلَوْ أَنَّا أَهْلَكْنَاهُم بِعَذَابٍ مِّن قَبْلِهِ لَقَالُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ مِن قَبْلِ أَن نَّذِلَّ وَنَخْزَىٰ ۝١٣٤
Wa law annaaa ahlaknaahum bi`azaabim min qablihee laqaaloo Rabbanaa law laaa arsalta ilainaa Rasoolan fanattabi`s Aayaatika min qabli an nazilla wa nakhzaa
📖 हिंदी अर्थ
और अगर हम उनको इस रसूल से पहले अज़ाब से हलाक कर डालते तो ज़रूर कहते कि ऐ हमारे पालने वाले तूने हमारे पास (अपना) रसूल क्यों न भेजा तो हम अपने ज़लील व रूसवा होने से पहले तेरी आयतों की पैरवी ज़रूर करते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَوْلاَ – क्यों नहीं / काश
  • نَذِلَّ – हम अपमानित हों
  • نَخْزَى – हम शर्मिंदा हों / रुसवा हों

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों की उस दलील का जवाब दे रहे हैं जो कहते हैं कि हमारे पास रसूल क्यों नहीं आया? अल्लाह फ़रमाता है कि अगर हम इन काफ़िरों को रसूल (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के आने से पहले ही अज़ाब से हलाक कर देते, तो ये लोग क़यामत के दिन ये बहाना बनाते कि "ऐ हमारे रब! तूने हमारे पास रसूल क्यों नहीं भेजा? अगर तू रसूल भेजता तो हम तेरी आयतों पर चलते, इससे पहले कि हम अपमानित और रुसवा होते।"

यानी अल्लाह तआला फ़रमा रहे हैं कि हमने इन लोगों पर रसूल भेजकर हुज्जत (दलील) क़ायम कर दी है। अब इनके पास कोई बहाना नहीं बचा। अल्लाह ने अपने रसूल को भेजा, किताब उतारी, और लोगों को सीधा रास्ता दिखाया। अब जो लोग ईमान नहीं लाते, वे सिर्फ़ अपनी सरकशी और हठधर्मी की वजह से ईमान नहीं लाते।

ये आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला बड़ा मेहरबान और रहीम है। उसने किसी उम्मत को बिना दलील के अज़ाब में नहीं डाला। हमेशा रसूल भेजकर, किताबें उतारकर लोगों को राह दिखाई। ये अल्लाह की बड़ी रहमत है कि उसने हमें क़ुरआन और रसूल अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सूरत में हिदायत का ज़रिया अता किया।

इस आयत से हमें ये सबक़ मिलता है कि हमें अल्लाह के भेजे हुए रसूल और उसकी किताब की नेमत की क़द्र करनी चाहिए। ये अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है। जिसने इस नेमत को पाकर ईमान लाया और नेक अमल किए, वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हुआ। और जिसने इसे ठुकराया, वह दुनिया में गुमराही और आख़िरत में रुसवाई का सामना करेगा।

अल्लाह तआला हम सबको क़ुरआन और सुन्नत पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 132-135 — ताहा

132وَأْمُرْ أَهْلَكَ بِالصَّلَاةِ وَاصْطَبِرْ عَلَيْهَا ۖ لَا نَسْأَلُكَ رِزْقًا ۖ نَّحْنُ نَرْزُقُكَ ۗ وَالْعَاقِبَةُ لِلتَّقْوَىٰ
और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और तुम खुद भी उसके पाबन्द रहो हम तुम से रोज़ी तो तलब करते नहीं (बल्कि) हम तो खुद तुमको रोज़ी देते हैं और परहेज़गारी ही का तो अन्जाम बखैर है
133وَقَالُوا لَوْلَا يَأْتِينَا بِآيَةٍ مِّن رَّبِّهِ ۚ أَوَلَمْ تَأْتِهِم بَيِّنَةُ مَا فِي الصُّحُفِ الْأُولَىٰ
और (अहले मक्का) कहते हैं कि अपने परवरदिगार की तरफ से हमारे पास कोई मौजिज़ा हमारी मर्ज़ी के मुवाफिक़ क्यों नहीं लाते तो क्या जो (पेशीव गोइयाँ) अगली किताबों (तौरेत, इन्जील) में (इसकी) गवाह हैं वह भी उनके पास नहीं पहुँची
134وَلَوْ أَنَّا أَهْلَكْنَاهُم بِعَذَابٍ مِّن قَبْلِهِ لَقَالُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ مِن قَبْلِ أَن نَّذِلَّ وَنَخْزَىٰ
और अगर हम उनको इस रसूल से पहले अज़ाब से हलाक कर डालते तो ज़रूर कहते कि ऐ हमारे पालने वाले तूने हमारे पास (अपना) रसूल क्यों न भेजा तो हम अपने ज़लील व रूसवा होने से पहले तेरी आयतों की पैरवी ज़रूर करते
135قُلْ كُلٌّ مُّتَرَبِّصٌ فَتَرَبَّصُوا ۖ فَسَتَعْلَمُونَ مَنْ أَصْحَابُ الصِّرَاطِ السَّوِيِّ وَمَنِ اهْتَدَىٰ
रसूल तुम कह दो कि हर शख्स (अपने अन्जामकार का) मुन्तिज़र है तो तुम भी इन्तिज़ार करो फिर तो तुम्हें बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि सीधी राह वाले कौन हैं (और कज़ी पर कौन हैं) हिदायत याफ़ता कौन है और गुमराह कौन है।
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अनुवाद — ताहा 134

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Tuesday, August 18, 2026

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