अनुवाद — Tafsir
यह आयत अल्लाह तआला की क़ुदरत और उसके दीन की सच्चाई को बयान करती है। पहले कुछ अहम शब्दों के मानी समझ लीजिए:
- يُولِجُ (यूलिजु): दाखिल करना, डालना, एक चीज़ को दूसरी में मिलाना या बदलना।
- اللَّيْلَ (अल-लैल): रात, अंधेरा।
- النَّهَارَ (अन-नहार): दिन, उजाला।
- سَمِيعٌ (समीउन): सब कुछ सुनने वाला।
- بَصِيرٌ (बसीरुन): सब कुछ देखने वाला।
अब आयत का विस्तृत तफ़सीर मुलाहिज़ा फ़रमाइए:
यह वो बात है जो अल्लाह तआला ने अपने बंदों को सिखाई है कि जो क़ानून और हिदायात उसने दिए हैं, वो सब अदल और हिकमत पर आधारित हैं। यह इसलिए है कि अल्लाह ही सच्चा मालिक है, और उसकी क़ुदरत हर चीज़ पर हावी है। उसकी क़ुदरत की सबसे बड़ी निशानी यह है कि वह रात को दिन में दाखिल करता है और दिन को रात में दाखिल करता है। यानी जब सूरज डूबता है तो दिन की रोशनी खत्म होकर रात का अंधेरा छा जाता है, और जब सूरज निकलता है तो रात का अंधेरा मिटकर दिन का उजाला फैल जाता है। इस तरह अल्लाह एक को दूसरे में बदलता रहता है, कभी दिन लंबा होता है और रात छोटी, कभी रात लंबी होती है और दिन छोटा। यह नियमित बदलाव उसी की क़ुदरत का नतीजा है।
और अल्लाह तआला सब कुछ सुनने वाला है — हर बंदे की दुआ, हर ज़ुबान की आवाज़, हर दिल की पुकार उस तक पहुँचती है। वह सब कुछ देखने वाला है — हर अमल, हर नीयत, हर छोटी-बड़ी चीज़ उसकी नज़र से ओझल नहीं है। जो लोग उस पर भरोसा करते हैं और उसके दीन की मदद करते हैं, अल्लाह उनकी मदद करता है, क्योंकि वह जानता है कि कौन सच्चा है और कौन झूठा, कौन मज़लूम है और कौन ज़ालिम। यह आयत मोमिनों के दिलों को तसल्ली देती है कि अल्लाह की क़ुदरत के आगे कोई ताकत टिक नहीं सकती। जिस तरह वह रात और दिन को बदलता है, उसी तरह वह हालात को भी बदल सकता है — मुसीबत को राहत में, कमज़ोरी को ताकत में, और हार को जीत में।
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह पर पूरा भरोसा रखें, उसकी क़ुदरत पर यक़ीन करें, और याद रखें कि वह हमारी हर बात सुनता है और हर काम देखता है। जो लोग उसकी राह में सब्र करते हैं, उनके लिए उसकी मदद ज़रूर आती है। यह ईमान की ताकत है कि इंसान यक़ीन करे कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है — चाहे वह रात और दिन का बदलाव हो या इंसानों के हालात का। यही वजह है कि अल्लाह ने अपने बंदों को अदल और इंसाफ़ का हुक्म दिया है, और ज़ालिमों को सज़ा का डर दिखाया है। मोमिन के लिए यह आयत एक प्यारा पैग़ाम है कि अल्लाह की नज़र में उसकी कोई भी कोशिश, कोई भी दुआ, कोई भी आँसू बेकार नहीं जाता। अल्लाह सब सुनता है, सब देखता है, और सबका हिसाब रखता है।
📜 आयत 59-63 — अल-हज
अनुवाद — अल-हज 61
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पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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