अल-मोमिनुन · 102/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
فَمَن ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ ۝١٠٢
Faman saqulat mawaazee nuhoo fa ulaaa`ika humul muflihoon
📖 हिंदी अर्थ
फिर जिन (के नेकियों) के पल्लें भारी होगें तो यही लोग कामयाब होंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ (उसके तराजू भारी हो गए): यानी उसके अच्छे कर्मों का पलड़ा बुरे कर्मों के मुकाबले भारी हो गया।
  • الْمُفْلِحُونَ (सफल लोग): वे लोग जो अपनी मंज़िल तक पहुँच गए, जिन्हें वह मिल गया जिसकी वे आशा रखते थे और उस अज़ाब से बच गए जिससे वे डरते थे।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब क़ियामत के दिन हिसाब-किताब होगा, तो लोगों के कर्मों को तराजू में तोला जाएगा। यह तराजू अल्लाह का न्यायपूर्ण तराजू है, जिसमें ज़रा-सी भी कमी या ज़्यादती नहीं होगी। उस दिन जिस व्यक्ति के अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी होगा, यानी उसकी नेकियाँ उसकी बुराइयों से ज़्यादा होंगी, तो वही लोग सच्चे सफल और कामयाब होंगे। वे जन्नत की ऊँची मंज़िलों तक पहुँचेंगे, उन्हें वह सब कुछ मिलेगा जिसकी वे तमन्ना रखते थे, और वे जहन्नम की आग और उसके अज़ाब से महफूज़ रहेंगे।

यह सफलता कोई साधारण सफलता नहीं, बल्कि हमेशा की सफलता है—ऐसी कामयाबी जिसके बाद कोई नाकामी नहीं, ऐसी ख़ुशी जिसके बाद कोई ग़म नहीं। यही असली फलाह है, और इसी के लिए मोमिन को जीवन भर मेहनत करनी चाहिए।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बताती है कि असली कामयाबी दुनिया के माल-दौलत, ऊँचे ओहदों या बड़ी-बड़ी फ़ौजों में नहीं है। असली कामयाबी वह है जो आख़िरत के दिन मिलेगी, जब हमारे अच्छे कर्म तराजू में भारी होंगे। आज हम जो एक-एक नेकी करते हैं—चाहे वह नमाज़ हो, रोज़ा हो, सच बोलना हो, माँ-बाप की ख़िदमत हो, ग़रीबों की मदद हो, या अल्लाह का ज़िक्र हो—यह सब उस दिन हमारे तराजू को भारी करेगा। तो आओ, हम अपनी ज़िंदगी को नेकियों से भर दें, क्योंकि यही वह पूँजी है जो उस दिन हमें सच्ची कामयाबी दिलाएगी। अल्लाह हम सबको उन मुफ़लिहों (सफल लोगों) में शामिल करे। आमीन।



📜 आयत 100-104 — अल-मोमिनुन

100لَعَلِّي أَعْمَلُ صَالِحًا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّا ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَائِلُهَا ۖ وَمِن وَرَائِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
(जवाब दिया जाएगा) हरगिज़ नहीं ये एक लग़ो बात है- जिसे वह बक रहा और उनके (मरने के) बाद (आलमे) बरज़ख़ है
101فَإِذَا نُفِخَ فِي الصُّورِ فَلَا أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍ وَلَا يَتَسَاءَلُونَ
(जहाँ) क़ब्रों से उठाए जाएँगें (रहना होगा) फिर जिस वक्त सूर फूँका जाएगा तो उस दिन न लोगों में क़राबत दारियाँ रहेगी और न एक दूसरे की बात पूछेंगे
102فَمَن ثَقُلَتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
फिर जिन (के नेकियों) के पल्लें भारी होगें तो यही लोग कामयाब होंगे
103وَمَنْ خَفَّتْ مَوَازِينُهُ فَأُولَٰئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ فِي جَهَنَّمَ خَالِدُونَ
और जिन (के नेकियों) के पल्लें हल्के होंगे तो यही लोग है जिन्होंने अपना नुक़सान किया कि हमेशा जहन्नुम में रहेंगे
104تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ النَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَالِحُونَ
और (उनकी ये हालत होगी कि) जहन्नुम की आग उनके मुँह को झुलसा देगी और लोग मुँह बनाए हुए होगें
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 102

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Tuesday, August 18, 2026

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