अल-मोमिनुन · 111/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ ۝١١١
Inee jazaituhumul Yawma bimaa sabarooo annahum humul faaa`izoon
📖 हिंदी अर्थ
मैने आज उनको उनके सब्र का अच्छा बदला दिया कि यही लोग अपनी (ख़ातिरख्वाह) मुराद को पहुँचने वाले हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • جَزَيْتُهُمُ — मैंने उन्हें बदला दिया, उन्हें पुरस्कृत किया।
  • بِمَا صَبَرُوا — उनके धैर्य के कारण, उनके सब्र की वजह से।
  • الْفَائِزُونَ — कामयाब होने वाले, सफलता पाने वाले, अपनी मंज़िल को पाने वाले।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नेक और मोमिन बंदों के बारे में फ़रमा रहा है कि आज — यानी क़ियामत के दिन — मैंने उन्हें उनके सब्र का पूरा बदला दे दिया है। यह वही लोग हैं जिन्होंने दुनिया में ईमान की राह पर चलते हुए मुश्किलों, तकलीफों और अज़िय्यतों को सहा। उन्होंने अल्लाह की इबादत पर साबित क़दम रहे, उसकी ताअत (आज्ञा) का पालन किया, और दुश्मनों के ज़ुल्म व सितम को बर्दाश्त किया। उन्होंने हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखा और उसके वादे पर यक़ीन किया।

आज उसी सब्र का नतीजा है कि अल्लाह ने उन्हें जन्नत की नेमतें अता कर दीं, उन्हें हर दुख और रंज से पाक कर दिया, और उन्हें वह कामयाबी दी जो असल कामयाबी है। यह फ़ौज़ (कामयाबी) सिर्फ़ उन्हीं का हिस्सा है जिन्होंने दुनिया में सब्र किया। यानी जिसने दुनिया में सब्र किया, उसने आख़िरत में कामयाबी पाई। यह अल्लाह का इन्साफ़ और उसका फ़ज़ल दोनों है — इन्साफ़ इसलिए कि उन्होंने सब्र किया, और फ़ज़ल इसलिए कि अल्लाह ने उन्हें ऐसा बदला दिया जो उनके आमाल से कहीं बढ़कर है।

दावती पहलू:

यह आयत हर उस मुसलमान के लिए बहुत बड़ी ख़ुशख़बरी है जो आज किसी मुश्किल, बीमारी, ग़रीबी, ज़ुल्म या तकलीफ़ में है। अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि तुम्हारा सब्र ज़ाया नहीं जाएगा। जितनी देर तक तुम सब्र करोगे, उतना ही बड़ा इनाम तुम्हारे लिए तैयार हो रहा है। यह दुनिया की ज़िंदगी बहुत छोटी है, और आख़िरत की ज़िंदगी हमेशा की है। जो आज की छोटी सी तकलीफ़ सह लेता है, वह कल की हमेशा की खुशियों का हक़दार बन जाता है। अल्लाह ने वादा किया है कि सब्र करने वालों को उसका पूरा-पूरा बदला मिलेगा — बिना किसी कमी के। तो आओ, हम भी अपनी ज़िंदगी में सब्र को अपनाएँ, अल्लाह की राह पर जुड़े रहें, और उस कामयाबी के हक़दार बनें जो कभी ख़त्म नहीं होती — यानी जन्नत की हमेशा की नेमतें।

🎧 सुनें

📜 आयत 109-113 — अल-मोमिनुन

109إِنَّهُ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْ عِبَادِي يَقُولُونَ رَبَّنَا آمَنَّا فَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ الرَّاحِمِينَ
मेरे बन्दों में से एक गिरोह ऐसा भी था जो (बराबर) ये दुआ करता था कि ऐ हमारे पालने वाले हम ईमान लाए तो तू हमको बख्श दे और हम पर रहम कर तू तो तमाम रहम करने वालों से बेहतर है
110فَاتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِي وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ
तो तुम लोगों ने उन्हें मसखरा बना लिया-यहाँ तक कि (गोया) उन लोगों ने तुम से मेरी याद भुला दी और तुम उन पर (बराबर) हँसते रहे
111إِنِّي جَزَيْتُهُمُ الْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوا أَنَّهُمْ هُمُ الْفَائِزُونَ
मैने आज उनको उनके सब्र का अच्छा बदला दिया कि यही लोग अपनी (ख़ातिरख्वाह) मुराद को पहुँचने वाले हैं
112قَالَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِي الْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ
(फिर उनसे) ख़ुदा पूछेगा कि (आख़िर) तुम ज़मीन पर कितने बरस रहे
113قَالُوا لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ فَاسْأَلِ الْعَادِّينَ
वह कहेंगें (बरस कैसा) हम तो बस पूरा एक दिन रहे या एक दिन से भी कम
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Tuesday, August 18, 2026

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