अल-मोमिनुन · 26/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ ۝٢٦
Qaala Rabbin surnee bimaa kazzaboon
📖 हिंदी अर्थ
नूह ने (ये बातें सुनकर) दुआ की ऐ मेरे पलने वाले मेरी मदद कर
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • رَبِّ (रब्बी): मेरे पालनहार
  • انصُرْنِي (उन्सुरनी): मेरी सहायता कर
  • بِمَا كَذَّبُونِ (बिमा कज़्ज़बूनी): इसलिए कि उन्होंने मुझे झुठलाया

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने जब अपनी क़ौम को सच्चाई की ओर बुलाने में नौ सौ पचास साल बिता दिए, और उनकी क़ौम ने हर तरह से उन्हें झुठलाया, मज़ाक उड़ाया और उनकी नसीहतों को ठुकराया, तो उन्होंने अपने रब की दरगाह में यह दुआ की। यह दुआ उस समय की है जब उन्हें अपनी क़ौम के ईमान लाने से पूरी तरह मायूसी हो चुकी थी।

उन्होंने कहा: "ऐ मेरे पालनहार! मेरी सहायता कर, मुझ पर विजय प्रदान कर, क्योंकि इन लोगों ने मुझे झुठलाया है।" यानी उन्होंने अल्लाह से यह नहीं माँगा कि उन्हें दुनिया का ख़ज़ाना मिले या कोई सांसारिक लाभ हो, बल्कि उन्होंने सिर्फ़ अल्लाह की मदद और उसकी तरफ़ से इंसाफ़ की फ़रियाद की। यह इस बात का सबूत है कि नबी और रसूल अपनी क़ौम के अत्याचारों के बावजूद अल्लाह के दीन की ख़ातिर ही सब्र करते हैं और अपने रब से मदद माँगते हैं।

इस आयत में हमारे लिए सबसे बड़ा सबक़ यह है कि जब इंसान सच्चाई पर हो और उसे अपनी क़ौम की तरफ़ से झुठलाया जाए, तो उसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए। अल्लाह ही सबसे बड़ा सहायक है और वही अपने सच्चे बंदों की मदद करता है। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की यह दुआ हमें सिखाती है कि कठिन से कठिन हालात में भी अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए और उसी से मदद माँगनी चाहिए।

यह दुआ हमें यह भी बताती है कि अल्लाह के नबी भी जब अपनी क़ौम के इनकार से तंग आ जाते हैं, तो वे अल्लाह की दरगाह में फ़रियाद करते हैं। और अल्लाह ने इस दुआ को क़बूल करके नूह (अलैहिस्सलाम) को उनके दुश्मनों पर विजय दी और उनकी क़ौम के ज़ालिमों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया। यह उन लोगों के लिए सबसे बड़ी नसीहत है जो सच्चाई को झुठलाते हैं और नबियों की शिक्षाओं का मज़ाक उड़ाते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अल-मोमिनुन

24فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَائِكَةً مَّا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ
तो उनकी क़ौम के सरदारों ने जो काफिर थे कहा कि ये भी तो बस (आख़िर) तुम्हारे ही सा आदमी है (मगर) इसकी तमन्ना ये है कि तुम पर बुर्जुगी हासिल करे और अगर खुदा (पैग़म्बर ही न भेजना) चाहता तो फरिश्तों को नाज़िल करता हम ने तो (भाई) ऐसी बात अपने अगले बाप दादाओं में (भी होती) नहीं सुनी
25إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ بِهِ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِهِ حَتَّىٰ حِينٍ
हो न हों बस ये एक आदमी है जिसे जुनून हो गया है ग़रज़ तुम लोग एक (ख़ास) वक्त तक (इसके अन्जाम का) इन्तेज़ार देखो
26قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ
नूह ने (ये बातें सुनकर) दुआ की ऐ मेरे पलने वाले मेरी मदद कर
27فَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ أَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَاءَ أَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُ ۙ فَاسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
इस वजह से कि उन लोगों ने मुझे झुठला दिया तो हमने नूह के पास 'वही' भेजी कि तुम हमारे सामने हमारे हुक्म के मुताबिक़ कश्ती बनाना शुरु करो फिर जब कल हमारा अज़ाब आ जाए और तन्नूर (से पानी) उबलने लगे तो तुम उसमें हर किस्म (के जानवरों में) से (नर मादा) दो दो का जोड़ा और अपने लड़के बालों को बिठा लो मगर उन में से जिसकी निस्बत (ग़रक़ होने का) पहले से हमारा हुक्म हो चुका है (उन्हें छोड़ दो) और जिन लोगों ने (हमारे हुकम से) सरकशी की है उनके बारे में मुझसे कुछ कहना (सुनना) नहीं क्योंकि ये लोग यकीनन डूबने वाले है
28فَإِذَا اسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى الْفُلْكِ فَقُلِ الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي نَجَّانَا مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
ग़रज़ जब तुम अपने हमराहियों के साथ कश्ती पर दुरुस्त बैठो तो कहो तमाम हम्दो सना की सज़ावार खुदा ही है जिसने हमको ज़ालिम लोगों से नजात दी
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 26

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Tuesday, August 18, 2026

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