अल-मोमिनुन · 25/118
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-मोमिनुन
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ بِهِ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِهِ حَتَّىٰ حِينٍ ۝٢٥
In huwa illaa rajulum bihee jinnatun fatarabbasoo bihee hattan heen
📖 हिंदी अर्थ
हो न हों बस ये एक आदमी है जिसे जुनून हो गया है ग़रज़ तुम लोग एक (ख़ास) वक्त तक (इसके अन्जाम का) इन्तेज़ार देखो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • بِهِ جِنَّةٌ – उसे पागलपन है (यानी वह पागल है)
  • فَتَرَبَّصُوا – तो तुम प्रतीक्षा करो, ढील दो
  • حَتَّى حِينٍ – एक समय तक (यानी उसकी मृत्यु तक)

तफ़सीर:

जब नूह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को एकेश्वरवाद (तौहीद) की ओर बुलाया और उन्हें अल्लाह की याद दिलाई, तो उनकी क़ौम के सरदारों और बड़े लोगों ने उन्हें झुठलाया और आम लोगों से कहा: "यह आदमी तुम्हारे जैसा ही एक इंसान है, इसमें कोई विशेषता नहीं है। यह कोई नबी या रसूल नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा आदमी है जिसे पागलपन है। यह जो कुछ भी कह रहा है, वह अपने होश-हवास में नहीं कह रहा।" उन्होंने लोगों से कहा: "तुम इस पर ध्यान मत दो, बस इसके साथ धैर्य रखो और प्रतीक्षा करो कि या तो यह अपनी दावत छोड़ देगा, या फिर मर जाएगा, और तुम इसके झंझट से मुक्त हो जाओगे।"

यह बात उन्होंने केवल इसलिए कही ताकि लोग नूह अलैहिस्सलाम की सच्ची बात पर विचार न करें और उनके मार्गदर्शन से दूर रहें। उनका उद्देश्य यह था कि लोगों के दिलों में नूह अलैहिस्सलाम के प्रति संदेह और अविश्वास पैदा कर दिया जाए, ताकि वे उनकी बात न मानें।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह के नबियों और सच्चे दावत देने वालों के साथ हमेशा यही व्यवहार किया गया है। जब कोई सच्चाई की ओर बुलाता है, तो झूठ के पुजारी उसे पागल, जादूगर या झूठा कहकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं। लेकिन सच्चाई कभी छिपती नहीं है। अल्लाह अपने नबियों की मदद करता है और उनकी दावत को कामयाब बनाता है। हमें चाहिए कि हम सच्चाई पर दृढ़ रहें और लोगों की बातों से विचलित न हों। अल्लाह का वादा है कि वह अपने सच्चे बंदों की मदद करेगा, चाहे लोग कितनी भी कोशिश कर लें। यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि जब हम सच्चाई पर हों, तो हमें अपने विरोधियों की बातों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। अल्लाह ही सबसे अच्छा सहायक है और वही अपने बंदों को कामयाबी देता है।



📜 आयत 23-27 — सूरा अल-मोमिनुन

23وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِ فَقَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
और हमने नूह को उनकी काैम के पास पैग़म्बर बनाकर भेजा तो नूह ने (उनसे) कहा ऐ मेरी क़ौम खुदा ही की इबादत करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं तो क्या तुम (उससे) डरते नहीं हो
24فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِن قَوْمِهِ مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَائِكَةً مَّا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ
तो उनकी क़ौम के सरदारों ने जो काफिर थे कहा कि ये भी तो बस (आख़िर) तुम्हारे ही सा आदमी है (मगर) इसकी तमन्ना ये है कि तुम पर बुर्जुगी हासिल करे और अगर खुदा (पैग़म्बर ही न भेजना) चाहता तो फरिश्तों को नाज़िल करता हम ने तो (भाई) ऐसी बात अपने अगले बाप दादाओं में (भी होती) नहीं सुनी
25إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ بِهِ جِنَّةٌ فَتَرَبَّصُوا بِهِ حَتَّىٰ حِينٍ
हो न हों बस ये एक आदमी है जिसे जुनून हो गया है ग़रज़ तुम लोग एक (ख़ास) वक्त तक (इसके अन्जाम का) इन्तेज़ार देखो
26قَالَ رَبِّ انصُرْنِي بِمَا كَذَّبُونِ
नूह ने (ये बातें सुनकर) दुआ की ऐ मेरे पलने वाले मेरी मदद कर
27فَأَوْحَيْنَا إِلَيْهِ أَنِ اصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَاءَ أَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُ ۙ فَاسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
इस वजह से कि उन लोगों ने मुझे झुठला दिया तो हमने नूह के पास 'वही' भेजी कि तुम हमारे सामने हमारे हुक्म के मुताबिक़ कश्ती बनाना शुरु करो फिर जब कल हमारा अज़ाब आ जाए और तन्नूर (से पानी) उबलने लगे तो तुम उसमें हर किस्म (के जानवरों में) से (नर मादा) दो दो का जोड़ा और अपने लड़के बालों को बिठा लो मगर उन में से जिसकी निस्बत (ग़रक़ होने का) पहले से हमारा हुक्म हो चुका है (उन्हें छोड़ दो) और जिन लोगों ने (हमारे हुकम से) सरकशी की है उनके बारे में मुझसे कुछ कहना (सुनना) नहीं क्योंकि ये लोग यकीनन डूबने वाले है
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीअवतरण स्थान
25आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 25

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Friday, October 2, 2026

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