अल-मोमिनुन · 69/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنكِرُونَ ۝٦٩
Am lam ya`rifoo Rasoolahum fahum lahoo munkiroon
📖 हिंदी अर्थ
या उन लोगों ने अपने रसूल ही को नहीं पहचाना तो इस वजह से इन्कार कर बैठे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَمْ – क्या (यहाँ तिरस्कार एवं फटकार के अर्थ में प्रयुक्त)
  • لَمْ يَعْرِفُوا – क्या उन्होंने नहीं पहचाना
  • رَسُولَهُمْ – अपने रसूल (पैगंबर) को
  • مُنكِرُونَ – इनकार करने वाले, झुठलाने वाले

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों को फटकार लगा रहे हैं जो रसूलुल्लाह ﷺ पर ईमान नहीं लाते। अल्लाह पूछता है: क्या उन्होंने अपने रसूल को नहीं पहचाना? क्या वे उन्हें नहीं जानते? यह प्रश्न वास्तव में उनकी स्थिति को उजागर करने के लिए है।

यहाँ अल्लाह तआला उन काफिरों से कह रहा है जो मक्का में रहते थे। वे मुहम्मद ﷺ को बचपन से जानते थे। वे जानते थे कि वे सच्चे, अमानतदार और सच्चे इंसान हैं। उन्हें "अल-अमीन" (अमानतदार) कहा जाता था। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला, कभी धोखा नहीं दिया। यहाँ तक कि जब उन्होंने नबुव्वत का दावा किया, तो उनके अपने दुश्मनों ने भी उनकी सच्चाई और अमानतदारी की गवाही दी।

अल्लाह तआला फरमाता है: जब वे उन्हें अच्छी तरह जानते हैं, उनकी सच्चाई और अमानतदारी से वाकिफ हैं, तो फिर वे उन्हें क्यों झुठला रहे हैं? क्या यह उनकी जिद और हठधर्मिता नहीं है?

यह आयत उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो सच्चाई को जानते हुए भी उसे नहीं मानते। यह उन लोगों के लिए भी एक सबक है जो हक़ को पहचानते हैं लेकिन अपनी मनमर्जी और स्वार्थ के कारण उसे कबूल नहीं करते।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि हमें सच्चाई को पहचानना चाहिए और उसे कबूल करना चाहिए। रसूलुल्लाह ﷺ की सच्चाई और अमानतदारी उनके नबुव्वत की सबसे बड़ी गवाही है। जो लोग उन्हें जानते हुए भी इनकार करते हैं, वे अपनी जिद और अहंकार के कारण ही इनकार करते हैं।

हमें चाहिए कि हम रसूलुल्लाह ﷺ पर पूरा ईमान लाएं, उनकी सुन्नत पर अमल करें और उनके बताए रास्ते पर चलें। यही हमारी कामयाबी और नजात का जरिया है। अल्लाह हमें सच्चे ईमान और अमल की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 67-71 — अल-मोमिनुन

67مُسْتَكْبِرِينَ بِهِ سَامِرًا تَهْجُرُونَ
तो क्या उन लोगों ने (हमारी) बात (कुरान) पर ग़ौर नहीं किया
68أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا الْقَوْلَ أَمْ جَاءَهُم مَّا لَمْ يَأْتِ آبَاءَهُمُ الْأَوَّلِينَ
उनके पास कोई ऐसी नयी चीज़ आयी जो उनके अगले बाप दादाओं के पास नहीं आयी थी
69أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنكِرُونَ
या उन लोगों ने अपने रसूल ही को नहीं पहचाना तो इस वजह से इन्कार कर बैठे
70أَمْ يَقُولُونَ بِهِ جِنَّةٌ ۚ بَلْ جَاءَهُم بِالْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ
या कहते हैं कि इसको जुनून हो गया है (हरगिज़ उसे जुनून नहीं) बल्कि वह तो उनके पास हक़ बात लेकर आया है और उनमें के अक्सर हक़ बात से नफरत रखते हैं
71وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْوَاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَاهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ
और अगर कहीं हक़ उनकी नफसियानी ख्वाहिश की पैरवी करता है तो सारे आसमान व ज़मीन और जो लोग उनमें हैं (सबके सब) बरबाद हो जाते बल्कि हम तो उन्हीं के तज़किरे (जिबरील के वास्ते से) उनके पास लेकर आए तो यह लोग अपने ही तज़किरे से मुँह मोड़तें हैं
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 69

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Tuesday, August 18, 2026

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