अल-मोमिनुन · 71/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْوَاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَاهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ ۝٧١
Wa lawit taba`al haqqu ahwaaa`ahum lafasadatis samaawaatu wal ardu wa man feehinnn; bal atainaahum bizikrihim fahum `an zikrihim mu`ridon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर कहीं हक़ उनकी नफसियानी ख्वाहिश की पैरवी करता है तो सारे आसमान व ज़मीन और जो लोग उनमें हैं (सबके सब) बरबाद हो जाते बल्कि हम तो उन्हीं के तज़किरे (जिबरील के वास्ते से) उनके पास लेकर आए तो यह लोग अपने ही तज़किरे से मुँह मोड़तें हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْحَقُّ – यहाँ अल्लाह तआला का नाम है, जो सत्य है।
  • أَهْوَاءَهُمْ – उनकी मनमानी इच्छाएँ और ख्वाहिशें।
  • ذِكْرِهِمْ – उनकी इज़्ज़त और शान का ज़रिया (क़ुरआन)।

तफ़सीर:

अगर अल्लाह तआला अपने फ़ैसलों और क़ानूनों में उन लोगों की मनमानी इच्छाओं की पैरवी करता जो उसके साथ शरीक ठहराते हैं, तो आसमान और ज़मीन और उनमें रहने वाली सारी मख़लूक़ात का निज़ाम तबाह और बर्बाद हो जाता। क्योंकि इंसान की इच्छाएँ अक्सर जाहिलाना, नफ़्सानी और सीमित होती हैं, वह अंजाम को नहीं देख पाता और न ही उसे सही और ग़लत इंतिज़ाम का इल्म है। अल्लाह की हिकमत यही है कि उसने कायनात को अपनी रहमत, अदल और हिकमत के क़ानून पर चलाया है, न कि किसी की ख्वाहिश पर।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: हमने उन्हें ऐसी चीज़ दी जो उनकी इज़्ज़त, बुलंदी और भलाई की ज़ामिन है — वह है क़ुरआन, जो उन्हें सीधे रास्ते की तरफ़ बुलाता है और उनकी दुनिया और आख़िरत की भलाई का ज़रिया है। लेकिन अफ़सोस कि वे इसी चीज़ से मुँह मोड़ रहे हैं, उस पर ध्यान नहीं देते, न उस पर अमल करते हैं और न उसकी तालीमात को क़बूल करते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह का दीन और उसका क़ुरआन ही हमारी असली इज़्ज़त और कामयाबी की कुंजी है। जो लोग अपनी ख्वाहिशों को दीन पर मुक़द्दम रखते हैं, वह न सिर्फ़ खुद को बल्कि पूरे समाज को तबाही की तरफ़ ले जाते हैं। अल्लाह ने हमें क़ुरआन जैसी नेमत दी है जो हर दौर और हर ज़रूरत का हल रखती है। हमें चाहिए कि इस किताब को अपनी ज़िंदगी में उतारें, इस पर ग़ौर करें और इसे अपना रहनुमा बनाएँ। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है। अल्लाह तआला से दुआ है कि वह हमें क़ुरआन को समझने, उस पर अमल करने और उसकी तालीमात को दूसरों तक पहुँचाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।



📜 आयत 69-73 — अल-मोमिनुन

69أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُ مُنكِرُونَ
या उन लोगों ने अपने रसूल ही को नहीं पहचाना तो इस वजह से इन्कार कर बैठे
70أَمْ يَقُولُونَ بِهِ جِنَّةٌ ۚ بَلْ جَاءَهُم بِالْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ
या कहते हैं कि इसको जुनून हो गया है (हरगिज़ उसे जुनून नहीं) बल्कि वह तो उनके पास हक़ बात लेकर आया है और उनमें के अक्सर हक़ बात से नफरत रखते हैं
71وَلَوِ اتَّبَعَ الْحَقُّ أَهْوَاءَهُمْ لَفَسَدَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَاهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ
और अगर कहीं हक़ उनकी नफसियानी ख्वाहिश की पैरवी करता है तो सारे आसमान व ज़मीन और जो लोग उनमें हैं (सबके सब) बरबाद हो जाते बल्कि हम तो उन्हीं के तज़किरे (जिबरील के वास्ते से) उनके पास लेकर आए तो यह लोग अपने ही तज़किरे से मुँह मोड़तें हैं
72أَمْ تَسْأَلُهُمْ خَرْجًا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
(ऐ रसूल) क्या तुम उनसे (अपनी रिसालत की) कुछ उजरत माँगतें हों तो तुम्हारे परवरदिगार की उजरत उससे कही बेहतर है और वह तो सबसे बेहतर रोज़ी देने वाला है
73وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
और तुम तो यक़ीनन उनको सीधी राह की तरफ बुलाते हो
अल-मोमिनुनकुरान सूची
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71आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 71

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Tuesday, August 18, 2026

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