अल-फुरकान · 14/77
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फुरकान
لَّا تَدْعُوا الْيَوْمَ ثُبُورًا وَاحِدًا وَادْعُوا ثُبُورًا كَثِيرًا ۝١٤
Laa tad`ul yawma subooranw waahidanw wad`oo subooran kaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
(उस वक्त उनसे कहा जाएगा कि) आज एक मौत को न पुकारो बल्कि बहुतेरी मौतों को पुकारो (मगर इससे भी कुछ होने वाला नहीं)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ثُبُورًا (सुबूरन): हलाकत, विनाश, तबाही। यहाँ इसका अर्थ है मौत या विनाश को पुकारना।
  • وَاحِدًا (वाहिदन): एक बार।
  • كَثِيرًا (कसीरन): बहुत बार, अनेकों बार।

तफसीर (व्याख्या):

उस दिन जब काफिरों को जहन्नम की आग में डाला जाएगा, तो वे हालात के बोझ से तिलमिला उठेंगे और चीख़-पुकार मचाएँगे। वे कहेंगे: "हाय! हमारी तबाही आ जाए, हम मर जाएँ, हमारा अंत हो जाए!" तब उन्हें फरिश्तों या अल्लाह की ओर से कहा जाएगा: "आज एक बार मौत या विनाश को मत पुकारो, बल्कि बहुत सारे विनाशों को पुकारो!"

यह बात उन्हें ताने के रूप में कही जाएगी, क्योंकि उनका अज़ाब इतना भयंकर और लगातार है कि एक मौत या एक विनाश से उन्हें राहत नहीं मिल सकती। उनके लिए तो कई तरह के अज़ाब हैं—आग, ज़हरीले पानी, जंज़ीरें, और तरह-तरह की यातनाएँ। हर पल उनके लिए एक नया विनाश है, हर घड़ी एक नई तबाही है। इसलिए वे जितनी बार भी मौत को पुकारें, उन्हें मौत नहीं आएगी, बल्कि उनका अज़ाब और बढ़ता जाएगा।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह की नाफ़रमानी का अंजाम कितना भयानक है। जो लोग दुनिया में अल्लाह के हुक्मों को नहीं मानते, वे आख़िरत में ऐसी जगह पहुँचेंगे जहाँ मौत भी उनके काम नहीं आएगी।

लेकिन इसी के साथ यह आयत हमारे लिए एक नसीहत भी है—कि हमें अल्लाह की रहमत और माफ़ी का दामन थाम लेना चाहिए। दुनिया में हमारे पास तौबा का मौका है, हम अपने गुनाहों से बाज़ आ सकते हैं, अल्लाह से माफ़ी माँग सकते हैं। लेकिन उस दिन कोई मौका नहीं होगा, कोई तौबा क़बूल नहीं होगी।

इसलिए ऐ इंसान! आज ही अपने रब की तरफ़ लौट आ, उसकी रहमत का सहारा ले, और उस आग से बचने की कोशिश कर जो उन लोगों के लिए तैयार की गई है जो हक़ को नहीं मानते। अल्लाह बड़ा मेहरबान है, वह अपने बंदों की तौबा क़बूल करता है और उन्हें जहन्नम से बचाकर जन्नत में दाखिल करता है। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 12-16 — सूरा अल-फुरकान

12إِذَا رَأَتْهُم مِّن مَّكَانٍ بَعِيدٍ سَمِعُوا لَهَا تَغَيُّظًا وَزَفِيرًا
जब जहन्नुम इन लोगों को दूर से दखेगी तो (जोश खाएगी और) ये लोग उसके जोश व ख़रोश की आवाज़ सुनेंगें
13وَإِذَا أُلْقُوا مِنْهَا مَكَانًا ضَيِّقًا مُّقَرَّنِينَ دَعَوْا هُنَالِكَ ثُبُورًا
और जब ये लोग ज़ज़ीरों से जकड़कर उसकी किसी तंग जगह मे झोंक दिए जाएँगे तो उस वक्त मौत को पुकारेंगे
14لَّا تَدْعُوا الْيَوْمَ ثُبُورًا وَاحِدًا وَادْعُوا ثُبُورًا كَثِيرًا
(उस वक्त उनसे कहा जाएगा कि) आज एक मौत को न पुकारो बल्कि बहुतेरी मौतों को पुकारो (मगर इससे भी कुछ होने वाला नहीं)
15قُلْ أَذَٰلِكَ خَيْرٌ أَمْ جَنَّةُ الْخُلْدِ الَّتِي وُعِدَ الْمُتَّقُونَ ۚ كَانَتْ لَهُمْ جَزَاءً وَمَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि जहन्नुम बेहतर है या हमेशा रहने का बाग़ (बेहश्त) जिसका परहेज़गारों से वायदा किया गया है कि वह उन (के आमाल) का सिला होगा और आख़िरी ठिकाना
16لَّهُمْ فِيهَا مَا يَشَاءُونَ خَالِدِينَ ۚ كَانَ عَلَىٰ رَبِّكَ وَعْدًا مَّسْئُولًا
जिस चीज़ की ख्वाहिश करेंगें उनके लिए वहाँ मौजूद होगी (और) वह हमेशा (उसी हाल में) रहेंगें ये तुम्हारे परवरदिगार पर एक लाज़िमी और माँगा हुआ वायदा है
अल-फुरकानकुरान सूची
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मक्कीअवतरण स्थान
14आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 14

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Friday, October 2, 2026

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