अल-फुरकान · 57/77
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फुरकान
قُلْ مَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ إِلَّا مَن شَاءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِ سَبِيلًا ۝٥٧
Qul maaa as`alukum `alaihi min ajrin illaa man shaaa`a ai yattakhiza ilaa Rabbihee sabeelaa
📖 हिंदी अर्थ
और उन लोगों से तुम कह दो कि मै इस (तबलीगे रिसालत) पर तुमसे कुछ मज़दूरी तो माँगता नहीं हूँ मगर तमन्ना ये है कि जो चाहे अपने परवरदिगार तक पहुँचने की राह पकडे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا أَسْأَلُكُمْ – मैं तुमसे नहीं माँगता
  • مِنْ أَجْرٍ – कोई बदला या पारिश्रमिक
  • إِلَّا مَن شَاءَ – सिवाय उस व्यक्ति के जो चाहे
  • يَتَّخِذَ – अपना ले / बना ले
  • سَبِيلًا – रास्ता / मार्ग

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप लोगों से साफ़ कह दीजिए कि मैं तुम्हें इस्लाम की ओर बुलाने और क़ुरआन पहुँचाने के बदले में तुमसे कोई मेहनताना या पारिश्रमिक नहीं माँगता। मेरा उद्देश्य तुम्हारे धन को हासिल करना नहीं है, न ही मैं इस दावत से कोई दुनियावी फ़ायदा चाहता हूँ। मेरी मेहनत और मेरा इनाम तो अल्लाह के पास है।

हाँ, अगर कोई व्यक्ति अपनी खुशी और अपनी भलाई के लिए अल्लाह की राह में खर्च करना चाहे, अपने रब की रज़ा और उसकी मर्ज़ी तक पहुँचने का रास्ता अपनाना चाहे, तो यह उसके अपने ही भले के लिए है। मैं उसे इससे नहीं रोकता, बल्कि यह उसके लिए बेहतर है। जो व्यक्ति अल्लाह की राह में अपना माल खर्च करता है, वह दरअसल अपने ही लिए अच्छाई कमाता है, क्योंकि अल्लाह की राह में खर्च किया गया धन कभी बेकार नहीं जाता।

यह आयत हमें सिखाती है कि दीन की दावत और अच्छाई की तरफ़ बुलाना किसी दुनियावी मुआवज़े के लिए नहीं होना चाहिए। एक सच्चा दाई (बुलाने वाला) सिर्फ़ अल्लाह की रज़ा के लिए लोगों को भलाई की ओर बुलाता है। साथ ही, यह भी सिखाती है कि अल्लाह की राह में खर्च करना कोई ज़बरदस्ती नहीं है, बल्कि यह एक स्वैच्छिक कार्य है जो इंसान के अपने ही फ़ायदे के लिए है। जो लोग अल्लाह की राह में खर्च करते हैं, वे दरअसल अपने आख़िरत की ज़िन्दगी को संवारते हैं और अपने रब का क़रीबी बनते हैं। यह एक ऐसा निवेश है जो कभी घाटे में नहीं जाता — आज की छोटी सी कुर्बानी कल की बड़ी कामयाबी का ज़रिया बनती है।



📜 आयत 55-59 — सूरा अल-फुरकान

55وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَنفَعُهُمْ وَلَا يَضُرُّهُمْ ۗ وَكَانَ الْكَافِرُ عَلَىٰ رَبِّهِ ظَهِيرًا
और लोग (कुफ्फ़ारे मक्का) ख़ुदा को छोड़कर उस चीज़ की परसतिश करते हैं जो न उन्हें नफा ही दे सकती है और न नुक़सान ही पहुँचा सकती है और काफिर (अबूजहल) तो हर वक्त अपने परवरदिगार की मुख़ालेफत पर ज़ोर लगाए हुए है
56وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا مُبَشِّرًا وَنَذِيرًا
और (ऐ रसूल) हमने तो तुमको बस (नेकी को जन्नत की) खुशख़बरी देने वाला और (बुरों को अज़ाब से) डराने वाला बनाकर भेजा है
57قُلْ مَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ إِلَّا مَن شَاءَ أَن يَتَّخِذَ إِلَىٰ رَبِّهِ سَبِيلًا
और उन लोगों से तुम कह दो कि मै इस (तबलीगे रिसालत) पर तुमसे कुछ मज़दूरी तो माँगता नहीं हूँ मगर तमन्ना ये है कि जो चाहे अपने परवरदिगार तक पहुँचने की राह पकडे
58وَتَوَكَّلْ عَلَى الْحَيِّ الَّذِي لَا يَمُوتُ وَسَبِّحْ بِحَمْدِهِ ۚ وَكَفَىٰ بِهِ بِذُنُوبِ عِبَادِهِ خَبِيرًا
और (ऐ रसूल) तुम उस (ख़ुदा) पर भरोसा रखो जो ऐसा ज़िन्दा है कि कभी नहीं मरेगा और उसकी हम्द व सना की तस्बीह पढ़ो और वह अपने बन्दों के गुनाहों की वाक़िफ कारी में काफी है (वह ख़ुद समझ लेगा)
59الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَىٰ عَلَى الْعَرْشِ ۚ الرَّحْمَٰنُ فَاسْأَلْ بِهِ خَبِيرًا
जिसने सारे आसमान व ज़मीन और जो कुछ उन दोनों में है छह: दिन में पैदा किया फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ और वह बड़ा मेहरबान है तो तुम उसका हाल किसी बाख़बर ही से पूछना
अल-फुरकानकुरान सूची
77आयत
मक्कीअवतरण स्थान
57आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 57

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Friday, October 2, 2026

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