Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- أَرْذَلُونَ (अरज़लून): नीच, तुच्छ, सामान्य लोग, जिनका कोई सामाजिक या आर्थिक दर्जा न हो। यह 'رذل' से बना है, जिसका अर्थ है घटिया या कमतर चीज़।
तफ़सीर (व्याख्या):
हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को एकेश्वरवाद (तौहीद) की ओर बुलाया और उन्हें अल्लाह की इबादत की दावत दी। उनकी दावत का असर आम लोगों पर पड़ा—ग़रीब, कमज़ोर और सामाजिक रूप से नीचे समझे जाने वाले लोग उन पर ईमान लाए। यह देखकर क़ौम के सरदारों और बड़े लोगों ने अहंकार और घमंड से भरकर कहा: "क्या हम तुम पर ईमान लाएँ, जबकि तुम्हारे पीछे केवल तुच्छ और नीच लोग चल रहे हैं?" उनका कहना था कि जो लोग तुम्हारी बात मान रहे हैं, वे समाज के ऊँचे दर्जे वाले नहीं, बल्कि साधारण, ग़रीब और कमज़ोर लोग हैं। उन्होंने सोचा कि सच्चाई का मापदंड सामाजिक प्रतिष्ठा और धन-दौलत है, जबकि सच्चाई का मापदंड तो सिर्फ़ अल्लाह का दिया हुआ ज्ञान और ईमान है।
यह बात उन्होंने इसलिए कही क्योंकि उनके दिलों में बड़प्पन का झूठा भ्रम था। वे समझते थे कि जो लोग दुनिया में ऊँचे दर्जे पर हैं, वही सच्चाई के हक़दार हैं। लेकिन अल्लाह की नज़र में इंसान की इज़्ज़त उसके तक़वा (परहेज़गारी) पर है, न कि उसके धन, पद या सामाजिक हैसियत पर। यही वजह है कि अल्लाह ने क़ुरआन में इस घटना को बयान करके हमें सिखाया कि ईमान और हिदायत किसी के दुनियावी रुतबे की मोहताज नहीं होती। जो लोग सच्चे दिल से अल्लाह की तरफ़ आते हैं, चाहे वे ग़रीब हों या अमीर, कमज़ोर हों या ताक़तवर, अल्लाह उन्हें अपनी रहमत से नवाज़ता है।
इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि हमें कभी भी लोगों को उनकी दुनियावी हैसियत के आधार पर नहीं आँकना चाहिए। सच्ची इज़्ज़त तो अल्लाह के पास है, और वह उसी को देता है जो उसकी राह पर चलता है। हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) की दावत में शामिल होने वाले साधारण लोग ही असल में कामयाब थे, क्योंकि उन्होंने दुनिया की झूठी बड़ाई को छोड़कर अल्लाह की सच्चाई को क़बूल किया। यह आज हमारे लिए भी एक प्रेरणा है कि हम सच्चाई को क़बूल करने में कभी संकोच न करें, चाहे दुनिया हमें कितना ही नीचा क्यों न समझे। अल्लाह उन्हीं को सच्ची बुलंदी देता है जो उसकी राह पर चलते हैं।
📜 आयत 109-113 — सूरा अश-शुआरा
अनुवाद — अश-शुआरा 111
सूरा अश-शुआरा आयत 111 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : तो हम तुम पर क्या ईमान लाएंसूरा आयत 111/227 — सूरा अश-शुआरा الشعراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अश-शुआरा सुनें, सूरा अश-शुआरा अनुवाद, सूरा अश-शुआरा mp3, सूरा अश-शुआरा pdf. आयत 109–113. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा अश-शुआरा
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


