अश-शुआरा · 16/227
अनुवाद उच्चारण — अश-शुआरा
فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَا إِنَّا رَسُولُ رَبِّ الْعَالَمِينَ ۝١٦
Faatiyaa Fir`awna faqoolaaa innaa Rasoolu Rabbil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
और (सारी गुफ्तगू) अच्छी तरह सुनते हैं ग़रज़ तुम दोनों फिरऔन के पास जाओ और कह दो कि हम सारे जहाँन के परवरदिगार के रसूल हैं (और पैग़ाम लाएँ हैं)
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَأْتِيَا – तुम दोनों जाओ
  • فِرْعَوْنَ – फ़िरऔन (मिस्र के ज़ालिम शासक) के पास
  • رَسُولُ – भेजा हुआ (संदेशवाहक)
  • رَبِّ الْعَالَمِينَ – सारे संसारों का पालनहार

तफ़सीर:

अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) को आश्वस्त किया कि फ़िरऔन उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकता, और उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) को उनका सहायक बना दिया। फिर अल्लाह ने दोनों भाइयों को आदेश दिया कि वे फ़िरऔन के पास जाएँ और उसे सीधे संदेश सुनाएँ।

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है: "तुम दोनों फ़िरऔन के पास जाओ और उससे कहो कि हम सारे संसारों के पालनहार की ओर से भेजे गए हैं।"

ग़ौरतलब है कि यहाँ "رَسُولُ" (एकवचन) कहा गया है, "رَسُولَا" (दो रसूल) नहीं, क्योंकि हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) मूल रूप से रसूल थे और हज़रत हारून (अलैहिस्सलाम) उनके सहायक और समर्थक के रूप में थे। यह इस बात की ओर इशारा है कि दावत-ए-हक़ में मूल व्यक्ति की अहमियत होती है, और साथी उसका सहारा बनता है।

इस आयत से हमें कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:

  1. साहस और हिम्मत: अल्लाह के रसूलों ने सबसे बड़े ज़ालिम शासक के सामने जाने में संकोच नहीं किया। हमें भी हक़ बोलने में साहस दिखाना चाहिए, चाहे सामने कोई भी हो।
  2. अल्लाह पर भरोसा: जब अल्लाह किसी काम का आदेश देता है, तो वह अपनी मदद का वादा भी करता है। मूसा (अलैहिस्सलाम) को डर था कि फ़िरऔन उन्हें मार डालेगा, लेकिन अल्लाह ने उन्हें सुरक्षा का वचन दिया।
  3. दावत का अंदाज़: रसूलों का तरीक़ा यह था कि वे सीधे और स्पष्ट रूप से अपना संदेश पहुँचाते थे। उन्होंने अपनी बात को "रब्बुल आलमीन" से जोड़ा, यानी उन्होंने फ़िरऔन को याद दिलाया कि असली मालिक सारे जहान का पालनहार है, न कि कोई इंसानी बादशाह।
  4. भाईचारा और सहयोग: मूसा और हारून (अलैहैमुस्सलाम) ने मिलकर दावत दी। यह हमें सिखाता है कि अच्छे कामों में एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।

यह आयत हमें बताती है कि अल्लाह का दीन किसी भी हालत में कमज़ोर नहीं पड़ता। चाहे ज़ालिम कितना भी ताकतवर क्यों न हो, अल्लाह की मदद उसके रसूलों के साथ होती है। आज भी जो लोग अल्लाह के दीन की ख़िदमत करते हैं, अल्लाह उन्हें नुसरत (मदद) देता है और उनके काम को कामयाब बनाता है।

हमें भी चाहिए कि अपने जीवन में हक़ और सच्चाई पर डटे रहें, अल्लाह पर भरोसा रखें और याद रखें कि अल्लाह की मदद सच्चे लोगों के साथ होती है। यही इस आयत का पैग़ाम है।

🎧 सुनें

📜 आयत 14-18 — अश-शुआरा

14وَلَهُمْ عَلَيَّ ذَنبٌ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
(और इसके अलावा) उनका मेरे सर एक जुर्म भी है (कि मैने एक शख्स को मार डाला था)
15قَالَ كَلَّا ۖ فَاذْهَبَا بِآيَاتِنَا ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ
तो मैं डरता हूँ कि (शायद) मुझे ये लाग मार डालें ख़ुदा ने कहा हरगिज़ नहीं अच्छा तुम दोनों हमारी निशानियाँ लेकर जाओ हम तुम्हारे साथ हैं
16فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَا إِنَّا رَسُولُ رَبِّ الْعَالَمِينَ
और (सारी गुफ्तगू) अच्छी तरह सुनते हैं ग़रज़ तुम दोनों फिरऔन के पास जाओ और कह दो कि हम सारे जहाँन के परवरदिगार के रसूल हैं (और पैग़ाम लाएँ हैं)
17أَنْ أَرْسِلْ مَعَنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ
कि आप बनी इसराइल को हमारे साथ भेज दीजिए
18قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ
(चुनान्चे मूसा गए और कहा) फिरऔन बोला (मूसा) क्या हमने तुम्हें यहाँ रख कर बचपने में तुम्हारी परवरिश नहीं की और तुम अपनी उम्र से बरसों हम मे रह सह चुके हो
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अनुवाद — अश-शुआरा 16

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Tuesday, August 18, 2026

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