अन-नमल · 55/93
अनुवाद उच्चारण — अन-नमल
أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ النِّسَاءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ ۝٥٥
A`innakum lataatoonar rijaala shahwatam min doonin nisaaa`; bal antum qawmun tajhaloon
📖 हिंदी अर्थ
क्या तुम औरतों को छोड़कर शहवत से मर्दों के आते हो (ये तुम अच्छा नहीं करते) बल्कि तुम लोग बड़ी जाहिल क़ौम हो तो लूत की क़ौम का इसके सिवा कुछ जवाब न था

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • شَهْوَةً – वासना की पूर्ति के लिए
  • مِن دُونِ النِّسَاءِ – स्त्रियों को छोड़कर
  • تَجْهَلُونَ – अज्ञानता का व्यवहार करते हो

तफ़सीर:

हज़रत लूत (अलैहिस्सलाम) ने अपनी क़ौम को नसीहत करते हुए फ़रमाया: क्या तुम लोग ऐसा घिनौना काम करते हो जिसकी बुराई तुम ख़ुद जानते हो? क्या तुम वासना की पूर्ति के लिए स्त्रियों को छोड़कर पुरुषों के पास जाते हो? यह कैसी हयात-ओ-पाकदामनी से गिरी हुई हरकत है! तुमने अल्लाह तआला के हुक्म की ख़िलाफ़वरी की और उसके नबी की नाफ़रमानी की। तुम लोग दरअसल अज्ञानता में डूबे हुए हो – तुम न तो अल्लाह की बड़ाई को समझते हो, न उसकी नेअमतों का एहसान मानते हो, न अज़ाब के डर को दिल में रखते हो। यही जहालत तुम्हें ऐसे काम पर उभार रही है जो अल्लाह की नज़र में सख्त से सख्त गुनाह है और जिसे दुनिया में तुमसे पहले किसी ने नहीं किया।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह ने इंसान की फ़ितरत को इस तरह बनाया है कि उसकी वासना की पूर्ति का जायज़ और पाक रास्ता निकाह है। जो लोग इस फ़ितरत के ख़िलाफ़ जाते हैं, वे न सिर्फ़ अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं बल्कि अपनी जान को भी बड़े अज़ाब में डालते हैं। अल्लाह तआला की रहमत यह है कि उसने हमें हलाल रास्ता दिखाया और हराम से बचने की तौफ़ीक़ देने का वादा किया। हमें चाहिए कि अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की बताई हुई हदों के अंदर रखें, क्योंकि इन्हीं हदों में हमारी भलाई और सुकून छिपा है। जो लोग इन हदों से बाहर निकलते हैं, वे दुनिया में भी बेचैन रहते हैं और आख़िरत में भी नादिम होते हैं। अल्लाह तआला हम सबको सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 53-57 — अन-नमल

53وَأَنجَيْنَا الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
और हमने उन लोगों को जो ईमान लाए थे और परहेज़गार थे बचा लिया
54وَلُوطًا إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَتَأْتُونَ الْفَاحِشَةَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ
और (ऐ रसूल) लूत को (याद करो) जब उन्होंने अपनी क़ौम से कहा कि क्या तुम देखभाल कर (समझ बूझ कर) ऐसी बेहयाई करते हो
55أَئِنَّكُمْ لَتَأْتُونَ الرِّجَالَ شَهْوَةً مِّن دُونِ النِّسَاءِ ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌ تَجْهَلُونَ
क्या तुम औरतों को छोड़कर शहवत से मर्दों के आते हो (ये तुम अच्छा नहीं करते) बल्कि तुम लोग बड़ी जाहिल क़ौम हो तो लूत की क़ौम का इसके सिवा कुछ जवाब न था
56۞ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوْمِهِ إِلَّا أَن قَالُوا أَخْرِجُوا آلَ لُوطٍ مِّن قَرْيَتِكُمْ ۖ إِنَّهُمْ أُنَاسٌ يَتَطَهَّرُونَ
कि वह लोग बोल उठे कि लूत के खानदान को अपनी बस्ती (सदूम) से निकाल बाहर करो ये लोग बड़े पाक साफ बनना चाहते हैं
57فَأَنجَيْنَاهُ وَأَهْلَهُ إِلَّا امْرَأَتَهُ قَدَّرْنَاهَا مِنَ الْغَابِرِينَ
ग़रज हमने लूत को और उनके ख़ानदान को बचा लिया मगर उनकी बीवी कि हमने उसकी तक़दीर में पीछे रह जाने वालों में लिख दिया था
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अनुवाद — अन-नमल 55

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Tuesday, August 18, 2026

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