अल-क़सस · 59/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ ۝٥٩
Wa maa kaana Rabbuka muhlikal quraa hattaa yab`asa feee ummihaa Rasoolany yatloo `alaihim aayaatina; wa maa kunnaa muhlikil quraaa illaa wa ahluhaa zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
और तुम्हारा परवरदिगार जब तक उन गाँव के सदर मक़ाम पर अपना पैग़म्बर न भेज ले और वह उनके सामने हमारी आयतें न पढ़ दे (उस वक्त तक) बस्तियों को बरबाद नहीं कर दिया करता-और हम तो बस्तियों को बरबाद करते ही नहीं जब तक वहाँ के लोग ज़ालिम न हों

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मुहलिक – विनाश करने वाला
  • उम्मिहा – उस (बस्ती) की जड़ या सबसे बड़ा केंद्र (यहाँ मक्का)
  • यत्लू – पढ़कर सुनाना
  • ज़ालिमून – अत्याचारी (अपने ऊपर कु़फ़्र और गुनाहों के कारण ज़ुल्म करने वाले)

तफ़सीर:

ऐ नबी! आपका रब किसी बस्ती को उस समय तक विनाश के अधीन नहीं करता, जब तक कि वह उस बस्ती के केंद्र (उम्मुल-क़ुरा) में एक रसूल न भेज दे, जो उन्हें अल्लाह की आयतें पढ़कर सुनाए। यह अल्लाह की रहमत और अदल का तक़ाज़ा है कि वह किसी क़ौम को सज़ा देने से पहले उनके पास अपना पैग़ाम पहुँचा दे, ताकि कोई बहाना बाक़ी न रहे।

चुनाँचे अल्लाह ने मक्का — जो उस ज़माने में अरब का सबसे बड़ा केंद्र और क़ुरैश का मरकज़ था — में आपको रसूल बनाकर भेजा, ताकि आप उन्हें क़ुरआन की आयतें सुनाएँ और उन्हें अज़ाब से डराएँ। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) रही है कि वह जब किसी बस्ती को हलाक करता है, तो उसके लोग पहले से ज़ालिम होते हैं — यानी उन्होंने कु़फ़्र और नाफ़रमानी करके अपने ऊपर ज़ुल्म किया होता है। अल्लाह कभी किसी बस्ती को उस हालत में तबाह नहीं करता जब उसके लोग सीधे रास्ते पर हों या उनके पास हुज्जत (स्पष्ट प्रमाण) न पहुँची हो।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की रहमत बेहद वसीअ है — वह बंदों पर उस वक़्त तक अज़ाब नाज़िल नहीं करता जब तक वह उन्हें माफ़ी का मौक़ा न दे दे। रसूलों का भेजना अल्लाह की तरफ़ से सबसे बड़ी नेमत है, क्योंकि इससे लोगों को हिदायत पाने का रास्ता मिलता है।

आज भी हमारे पास क़ुरआन और सुन्नत मौजूद है — यही हमारे लिए रहमत और हिदायत का ज़रिया है। हमें चाहिए कि इस नेमत की क़द्र करें, उस पर अमल करें और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्मों के मुताबिक ढालें, ताकि हम उन बस्तियों के हाल से सबक़ लें जो अपने ज़ुल्म की वजह से तबाह कर दी गईं। अल्लाह हमें सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 57-61 — सूरा अल-क़सस

57وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) कुफ्फ़ार (मक्का) तुमसे कहते हैं कि अगर हम तुम्हारे साथ दीन हक़ की पैरवी करें तो हम अपने मुल्क़ से उचक लिए जाएँ (ये क्या बकते है) क्या हमने उन्हें हरम (मक्का) में जहाँ हर तरह का अमन है जगह नहीं दी वहाँ हर किस्म के फल रोज़ी के वास्ते हमारी बारगाह से खिंचे चले जाते हैं मगर बहुतेरे लोग नहीं जाते
58وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ
और हमने तो बहुतेरी बस्तियाँ बरबाद कर दी जो अपनी मइशत (रोजी) में बहुत इतराहट से (ज़िन्दगी) बसर किया करती थीं-(तो देखो) ये उन ही के (उजड़े हुए) घर हैं जो उनके बाद फिर आबाद नहीं हुए मगर बहुत कम और (आख़िर) हम ही उनके (माल व असबाब के) वारिस हुए
59وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ
और तुम्हारा परवरदिगार जब तक उन गाँव के सदर मक़ाम पर अपना पैग़म्बर न भेज ले और वह उनके सामने हमारी आयतें न पढ़ दे (उस वक्त तक) बस्तियों को बरबाद नहीं कर दिया करता-और हम तो बस्तियों को बरबाद करते ही नहीं जब तक वहाँ के लोग ज़ालिम न हों
60وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और तुम लोगों को जो कुछ अता हुआ है तो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी का फ़ायदा और उसकी आराइश है और जो कुछ ख़ुदा के पास है वह उससे कही बेहतर और पाएदार है तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते
61أَفَمَن وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
तो क्या वह शख्स जिससे हमने (बेहश्त का) अच्छा वायदा किया है और वह उसे पाकर रहेगा उस शख्स के बराबर हो सकता है जिसे हमने दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) फायदे अता किए हैं और फिर क़यामत के दिन (जवाब देही के वास्ते हमारे सामने) हाज़िर किए जाएँगें
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59आयत

अनुवाद — अल-क़सस 59

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Saturday, October 3, 2026

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