अल-क़सस · 60/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ ۝٦٠
Wa maaa ooteetum min shai`in famataa`ul hayaatid dunyaa wa zeenatuhaa; wa maa `indal laahi khairunw wa abqaa; afalaa ta`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
और तुम लोगों को जो कुछ अता हुआ है तो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी का फ़ायदा और उसकी आराइश है और जो कुछ ख़ुदा के पास है वह उससे कही बेहतर और पाएदार है तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا أُوتِيتُم – जो कुछ तुम्हें दिया गया है (धन, संतान, सुख-साधन)
  • مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا – दुनिया की ज़िंदगी का अस्थायी सामान और आनंद
  • زِينَتُهَا – उसकी सजावट और शोभा
  • خَيْرٌ وَأَبْقَى – बेहतर और अधिक स्थायी (जो कभी खत्म न हो)
  • أَفَلَا تَعْقِلُونَ – क्या तुम अक्ल से काम नहीं लेते?

विस्तृत तफसीर:

ऐ लोगों! जो कुछ भी तुम्हें इस दुनिया में दिया गया है—चाहे वह धन-दौलत हो, औलाद हो, शान-शौकत हो, या कोई और सांसारिक सुख-साधन—यह सब कुछ फ़ानी (नाशवान) है। यह महज़ दुनिया की ज़िंदगी का अस्थायी सामान है और उसकी सजावट है, जिसका आनंद तुम कुछ दिनों तक उठाते हो, फिर यह सब खत्म हो जाता है। यह ऐसा सामान है जो ज़रूरत के वक़्त काम आता है, लेकिन इसकी कोई हक़ीक़त नहीं, क्योंकि यह क्षणभंगुर है।

लेकिन जो कुछ अल्लाह के पास है—यानी उसका इनाम, उसकी रहमत, जन्नत की नेमतें, और उसकी रज़ा—वह इस सबसे कहीं बेहतर है और बहुत अधिक स्थायी है। अल्लाह का दिया हुआ इनाम कभी खत्म नहीं होता, न कभी पुराना होता है, और न ही उसमें कोई कमी आती है। यह हमेशा रहने वाला है, जबकि दुनिया का सामान कुछ दिनों का मेहमान है।

अब ज़रा सोचो—क्या तुम्हारी अक्ल यह नहीं समझती कि जो चीज़ बाक़ी रहने वाली है, वह उस चीज़ से बेहतर है जो खत्म हो जाने वाली है? क्या कोई समझदार इंसान उस चीज़ को पकड़े रहेगा जो मिट्टी में मिल जाए, और उस चीज़ को छोड़ देगा जो हमेशा क़ायम रहे? यह तो साफ़ बात है कि अक्लमंद वही है जो फ़ानी (नाशवान) पर बाक़ी (स्थायी) को तरजीह दे।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुनिया की चमक-दमक और उसके सुखों पर मोहित न हों। यह सब एक परीक्षा है। अल्लाह ने यह सब कुछ इसलिए दिया है ताकि देखा जाए कि कौन इन चीज़ों में खोकर अपने रब को भूल जाता है, और कौन इन्हीं चीज़ों का इस्तेमाल करके अल्लाह की रज़ा हासिल करता है। जो इंसान दुनिया को आख़िरत का खेत समझता है और अपने कामों को अल्लाह की रज़ा के लिए करता है, वही असली कामयाब है।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें दुनिया और आख़िरत के बीच सही संतुलन बनाने की तालीम देती है। दुनिया का माल और सुख-साधन अल्लाह की नेमत हैं, लेकिन इन्हें ही सब कुछ समझ लेना बड़ी नादानी है। अल्लाह की रहमत और उसका इनाम उस चीज़ की तरह है जो कभी खत्म नहीं होती—जन्नत के बाग़, वहाँ की नहरें, वहाँ के महल, और सबसे बड़ी नेमत—अल्लाह का दीदार। यह सब उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की इबादत करते हैं, उसके हुक्मों पर चलते हैं, और दुनिया को आख़िरत पर कभी तरजीह नहीं देते।

तो आओ, हम अपनी अक्ल को काम में लाएँ और उस चीज़ को चुनें जो बाक़ी रहने वाली है, न कि उस चीज़ को जो मिट जाने वाली है। अल्लाह हम सबको सही समझ और सही अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 58-62 — अल-क़सस

58وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ
और हमने तो बहुतेरी बस्तियाँ बरबाद कर दी जो अपनी मइशत (रोजी) में बहुत इतराहट से (ज़िन्दगी) बसर किया करती थीं-(तो देखो) ये उन ही के (उजड़े हुए) घर हैं जो उनके बाद फिर आबाद नहीं हुए मगर बहुत कम और (आख़िर) हम ही उनके (माल व असबाब के) वारिस हुए
59وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ
और तुम्हारा परवरदिगार जब तक उन गाँव के सदर मक़ाम पर अपना पैग़म्बर न भेज ले और वह उनके सामने हमारी आयतें न पढ़ दे (उस वक्त तक) बस्तियों को बरबाद नहीं कर दिया करता-और हम तो बस्तियों को बरबाद करते ही नहीं जब तक वहाँ के लोग ज़ालिम न हों
60وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और तुम लोगों को जो कुछ अता हुआ है तो दुनिया की (ज़रा सी) ज़िन्दगी का फ़ायदा और उसकी आराइश है और जो कुछ ख़ुदा के पास है वह उससे कही बेहतर और पाएदार है तो क्या तुम इतना भी नहीं समझते
61أَفَمَن وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
तो क्या वह शख्स जिससे हमने (बेहश्त का) अच्छा वायदा किया है और वह उसे पाकर रहेगा उस शख्स के बराबर हो सकता है जिसे हमने दुनियावी ज़िन्दगी के (चन्द रोज़ा) फायदे अता किए हैं और फिर क़यामत के दिन (जवाब देही के वास्ते हमारे सामने) हाज़िर किए जाएँगें
62وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
और जिस दिन ख़ुदा उन कुफ्फ़ार को पुकारेगा और पूछेगा कि जिनको तुम हमारा शरीक ख्याल करते थे वह (आज) कहाँ हैं (ग़रज़ वह शरीक भी बुलाँए जाएँगे)
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Tuesday, August 18, 2026

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