अल-अंकबूत · 17/69
अनुवाद उच्चारण — अल-अंकबूत
إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا ۚ إِنَّ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَابْتَغُوا عِندَ اللَّهِ الرِّزْقَ وَاعْبُدُوهُ وَاشْكُرُوا لَهُ ۖ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ ۝١٧
Innamaa ta`ubdoona min doonil laahi awsaananw-wa takhluqoona ifkaa; innal lazeena ta`budoona min doonil laahi laa yamlikoona lakum rizqan fabtaghoo `indal laahir rizqa fabtaghoo `indal laahir rizqa wa`budoohu washkuroo lahooo ilaihi turja`oon
📖 हिंदी अर्थ
(मगर) तुम लोग तो ख़ुदा को छोड़कर सिर्फ बुतों की परसतिश करते हैं और झूठी बातें (अपने दिल से) गढ़ते हो इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा को छोड़कर जिन लोगों की तुम परसतिश करते हो वह तुम्हारी रोज़ी का एख्तेयार नही रखते-बस ख़ुदा ही से रोज़ी भी माँगों और उसकी इबादत भी करो उसका शुक्र करो (क्योंकि) तुम लोग (एक दिन) उसी की तरफ लौटाए जाओगे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • औसान (أوثانًا): मूर्तियाँ, बुत
  • तख़्लुक़ून (تَخْلُقُونَ): तुम गढ़ते हो, रचते हो
  • इफ़्क़ (إفكًا): झूठ, असत्य बात
  • यम्लिकून (يَمْلِكُونَ): वे अधिकार नहीं रखते
  • रिज़्क़ (رِزْقًا): आजीविका, रोज़ी
  • फ़ब्तग़ू (فَابْتَغُوا): तो तलाश करो, खोजो
  • तुरजऊन (تُرْجَعُونَ): तुम लौटाए जाओगे

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बड़े अफ़सोस की बात है कि तुम अल्लाह को छोड़कर सिर्फ़ उन मूर्तियों की पूजा करते हो जिन्हें तुमने खुद अपने हाथों से बनाया है। और साथ ही तुम झूठ गढ़ते हो कि ये मूर्तियाँ पूजा की हक़दार हैं और ये तुम्हारी मदद कर सकती हैं। यह सबसे बड़ा झूठ और असत्य है।

ज़रा सोचो — जिन मूर्तियों को तुम पूजते हो, क्या वे तुम्हें रोज़ी दे सकती हैं? क्या वे तुम्हारे लिए खाना, पानी, धन-दौलत या कोई भी चीज़ मुहैया कर सकती हैं? हरगिज़ नहीं! वे तो न तो किसी को नुक़सान पहुँचा सकती हैं और न ही किसी को फ़ायदा। वे तो बेजान हैं, उनमें कोई ताक़त ही नहीं।

तो फिर रोज़ी किससे माँगो? रोज़ी तो सिर्फ़ अल्लाह ही देता है। वही रिज़्क़ देने वाला है, वही पालने वाला है। उसी के पास सारे ख़ज़ाने हैं। इसलिए रोज़ी की तलाश अल्लाह ही से करो, उसी से माँगो, और उसी पर भरोसा रखो।

और साथ ही, उसी की इबादत करो — अकेले उसी की, बिना किसी साझी के। और उसका शुक्र अदा करो — उसकी नेमतों के लिए, उसकी रहमत के लिए, उसकी दी हुई हर चीज़ के लिए। क्योंकि शुक्र अदा करने से अल्लाह और नेमतें बढ़ाता है।

और याद रखो — आख़िरकार तुम सबको उसी की तरफ़ लौटकर जाना है। क़यामत के दिन तुम सब उसी के सामने हाज़िर होगे। वही तुम्हारा हिसाब लेगा। तुम्हारी मूर्तियाँ उस दिन तुम्हारे किसी काम न आएँगी। इसलिए आज ही अपनी ज़िंदगी को सही रास्ते पर लाओ, अल्लाह की इबादत करो, उसका शुक्र अदा करो, और उसी की राह में अपने कदम बढ़ाओ।

यही सच्ची कामयाबी है — कि तुम अल्लाह को पहचानो, उसी की इबादत करो, और उसी से रोज़ी माँगो। यही वह रास्ता है जो तुम्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी देगा। अल्लाह तआला बड़ा मेहरबान है, वह अपने बंदों की दुआएँ सुनता है और उन्हें रोज़ी देता है। बस ज़रूरत है सच्चे दिल से उसकी तरफ़ रुजू करने की।

🎧 सुनें

📜 आयत 15-19 — अल-अंकबूत

15فَأَنجَيْنَاهُ وَأَصْحَابَ السَّفِينَةِ وَجَعَلْنَاهَا آيَةً لِّلْعَالَمِينَ
फिर हमने नूह और कश्ती में रहने वालों को बचा लिया और हमने इस वाक़िये को सारी ख़ुदाई के वास्ते (अपनी क़ुदरत की) निशानी क़रार दी
16وَإِبْرَاهِيمَ إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ اعْبُدُوا اللَّهَ وَاتَّقُوهُ ۖ ذَٰلِكُمْ خَيْرٌ لَّكُمْ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
और इबराहीम को (याद करो) जब उन्होंने कहा कि (भाईयों) ख़ुदा की इबादत करो और उससे डरो अगर तुम समझते बूझते हो तो यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है
17إِنَّمَا تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ أَوْثَانًا وَتَخْلُقُونَ إِفْكًا ۚ إِنَّ الَّذِينَ تَعْبُدُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَا يَمْلِكُونَ لَكُمْ رِزْقًا فَابْتَغُوا عِندَ اللَّهِ الرِّزْقَ وَاعْبُدُوهُ وَاشْكُرُوا لَهُ ۖ إِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
(मगर) तुम लोग तो ख़ुदा को छोड़कर सिर्फ बुतों की परसतिश करते हैं और झूठी बातें (अपने दिल से) गढ़ते हो इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा को छोड़कर जिन लोगों की तुम परसतिश करते हो वह तुम्हारी रोज़ी का एख्तेयार नही रखते-बस ख़ुदा ही से रोज़ी भी माँगों और उसकी इबादत भी करो उसका शुक्र करो (क्योंकि) तुम लोग (एक दिन) उसी की तरफ लौटाए जाओगे
18وَإِن تُكَذِّبُوا فَقَدْ كَذَّبَ أُمَمٌ مِّن قَبْلِكُمْ ۖ وَمَا عَلَى الرَّسُولِ إِلَّا الْبَلَاغُ الْمُبِينُ
और (ऐ अहले मक्का) अगर तुमने (मेरे रसूल को) झुठलाया तो (कुछ परवाह नहीं) तुमसे पहले भी तो बहुतेरी उम्मते (अपने पैग़म्बरों को) झुठला चुकी हैं और रसूल के ज़िम्मे तो सिर्फ (एहक़ाम का) पहुँचा देना है
19أَوَلَمْ يَرَوْا كَيْفَ يُبْدِئُ اللَّهُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ
बस क्या उन लोगों ने इस पर ग़ौर नहीं किया कि ख़ुदा किस तरह मख़लूकात को पहले पहल पैदा करता है और फिर उसको दोबारा पैदा करेगा ये तो ख़ुदा के नज़दीक बहुत आसान बात है
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अनुवाद — अल-अंकबूत 17

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Tuesday, August 18, 2026

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